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बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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संवाद का महत्व

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
यूरोप में तिब्बती बौद्ध धर्म का पहला सम्मेलन
ज़्यूरिख, स्विट्ज़रलैंड, 13 अगस्त 2005
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा अल्पतः सम्पादित

अहिंसा और संवाद

इस समय इक्कीसवीं शताब्दी चल रही है और इसमें संदेह नहीं कि इस समय भौतिक प्रगति बहुत ऊँचे और उन्नत स्तर पर पहुँच चुकी है। लेकिन अभी भी मानव समाज में बड़ी संख्या में ऐसे हैं जो धार्मिक आस्था में ईमानदारी से रुचि रखते हैं। कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुई हैं, तथाकथित आतंकवाद और ऐसी ही अन्य घटनाएं, लेकिन ज़ाहिर है कि ये विपत्तियाँ दूरदृष्टि के अभाव के कारण उत्पन्न हुई हैं।

और इसलिए इन हानिकारक प्रवृत्तियों के खिलाफ प्रत्युपाय करने के लिए हमें दो स्तरों पर विचार करना होगा। पहले स्तर के उपाय एक अस्थायी स्तर के उपाय हैं जिन्हें विभिन्न सरकारें कर रही हैं। लेकिन दूसरे स्तर के उपाय दूरगामी प्रभाव के लिए हैं और उनका उद्देश्य एक अधिक स्वस्थ और करुणासम्पन्न समाज का निर्माण करना है। अब विभिन्न शैक्षिक संस्थान अहिंसा और संवाद को अधिक महत्व देने लगे हैं। ये ऐसी महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं जिनका प्रचार-प्रसार किए जाने की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी इनके बारे में चिंतन करे ताकि ये संवाद और अहिंसा के विचार उनके जीवन में रच-बस जाएं।

बुद्धधर्म का संरक्षण

तिब्बती बुद्धधर्म के संरक्षण और तिब्बतियों की स्वतंत्रता के मुद्दों के बीच घनिष्ठ आपसी सम्बंध है। तिब्बत सदा ही एक विस्तृत क्षेत्र रहा है और वहाँ आपस में सम्पर्क बनाए रखना बहुत कठिन हुआ करता था। प्रत्येक लामा और प्रत्येक मठ अपने-अपने इलाके तक सीमित रहा करता था और एक समुदाय के रूप में मेल-जोल बनाए रखने के विचार में ज़्यादा रुचि नहीं दिखाई गई। मुझे लगता है कि सहयोग और संचार के अभाव के कारण, और साझी ज़िम्मेदारी की भावना के अभाव के कारण आज की त्रासद स्थिति उत्पन्न हुई। इसलिए अपने पिछले अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि एक समुदाय होने की भावना और आपस में निकट सम्पर्क बनाए रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है। विभिन्न देशों में यहाँ वहाँ फैले हुए तिब्बती बौद्ध धर्म के पालनकर्ताओं के छोटे-छोटे समूहों के लिए यह आवश्यक है कि वे किसी केन्द्रीय सत्ता से स्वतंत्र रहते हुए अपनी बैठकें करते रहें और इस विषय पर चर्चा करें कि वे एकदूसरे के और निकट रह कर किस प्रकार कार्य कर सकते हैं।

हम बुद्ध और नालन्दा के सभी आचार्यों के अनुयायी हैं। बुद्ध की शिक्षाएं सत्य पर आधारित थीं, और नालंदा के आचार्यों की सभी कृतियाँ हमें सत्य को समझने में सहायता करने के लिए हैं। क्यों? बहुत सी विपत्तियाँ और अवांछित घटनाएं अव्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए जाने के कारण घटित होती हैं। कोई भी अन्याय या भूल दरअसल सत्य का बोध न होने के कारण होती है, इस प्रकार एक गलत तरीका और भी हानिकर बातों का कारण बनता है। इस अज्ञान को दूर करने के लिए हमें स्पष्टवादी ढंग से चर्चा करनी चाहिए, जो केवल संवाद के आधार पर, हमारे बीच और अधिक घनिष्ठ सम्प्रेषण और बेहतर सहयोग के माध्यम से ही सम्भव है।

भिक्षुणियों की प्रतिज्ञाओं को पुनःप्रचलित किया जाना

थाइलैंड, बर्मा और श्रीलंका जैसे बौद्ध देशों में जहाँ विनय परम्परा अभी प्रचलित है, वहाँ अब भिक्षुणियाँ बाकी नहीं हैं। जहाँ तक चीन का सम्बंध है, ताइवान के कुछ मठों में भिक्षुणियों को दीक्षा दी जाती है, और मेरे दूसरे ताइवान दौरे के समय एक बैठक में एक चीनी भिक्षु ने दूसरी परम्पराओं में भिक्षुणी प्रतिज्ञा को पुनःप्रचलित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया था।

अब हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं जहाँ हर कोई बराबरी और समानता की बात करता है। हाल ही में मैंने भी इस बात का ज़िक्र किया था कि तिब्बतियों, चीनियों और यूरोपवासियों के बीच ऐसी महिलाओं की एक बड़ी संख्या होगी जो किसी भी धर्म में, विशेषतः बुद्धधर्म में वास्तविक रुचि दिखाती हैं। हिमालयी क्षेत्रों में मैं जब भी उपदेश देता हूँ, तो वहाँ श्रोताओं में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक होती है।

इसलिए हमें वरिष्ठ भिक्षुओं का मार्गदर्शन लेना चाहिए और उनके साथ चर्चा करनी चाहिए, और मैं चाहूँगा कि तिब्बती भिक्षुणियों के बजाए पश्चिमी देशों की बौद्ध भिक्षुणियाँ इस कार्य को करें, तो सम्भवतः यह अधिक प्रभावकारी होगा। ज़ाहिर है कि हमारी भिक्षुणियाँ तो अमीर नहीं हैं, और पैसे की तो आवश्यकता होगी, इसलिए मैं अपनी रॉयल्टी में से कुछ राशि भेंट करना चाहूँगा। मैंने कभी पैसा कमाने के उद्देश्य से पुस्तकें नहीं लिखीं, लेकिन पैसा तो स्वतः ही आ जाता है! इसलिए मैं इस कार्य के लिए एक निधि स्थापित करना चाहूँगा।