सामूहिक कर्म एवं प्राकृतिक आपदाएँ

जॉनथन लैंडौ और डॉ. बर्ज़िन के बीच चर्चा

लैंडौ : आजकल बहुत से लोग पूछते हैं, "क्या सामूहिक कर्म भूकंप जैसा कुछ पैदा कर सकता है, वैसा जिसने हाल ही में हेटी को नष्ट किया? 
इसके उत्तर में, प्रायः यह समझाया जाता है कि इस ग्रह के सभी प्राणियों के सामूहिक कर्म ही इस ग्रह की सामान्य विशेषताओं और इसके संघटक तत्त्वों के लिए ज़िम्मेदार हैं। जब ये तत्त्व यथास्थान होते हैं, तो भौतिकशास्त्र के निर्वैयक्तिक नियम का प्रभुत्व हो जाता है। उदाहरण के लिए, तापमान का बढ़ना अनेक गतिविधियों को जन्म देता है, जैसे कि विवर्तनिक प्लेटों का स्थानांतरण, इत्यादि। इन गतिविधियों का एक रूप है भूकंप। इस दृष्टिकोण से, भूकंप हमारे ग्रह की वर्तमान स्थिति का अपरिहार्य परिणाम है; और यह वर्तमान स्थिति इस ग्रह पर रहने वाले और पूर्वकाल में रह चुके सभी जीवों के अति व्यापक सामूहिक कर्मों का परिणाम है। क्या आप इस पर टिप्पणी करेंगे?

डॉ. बर्ज़िन: कर्म, या अधिक विशेष रूप से, सकारात्मक या नकारात्मक कार्मिक शक्तियाँ तथा कार्मिक रुझान चाहे व्यक्तिपरक हों या फिर सामूहिक, विभिन्न प्रकार के परिणामों में विपाक होता है। इनमें से एक अधिपतिफल (सर्वाधिक प्रबल परिणाम) होता है। एक अधिपतिफल है हमारा उस पर्यावरण या समाज का अनुभव जिसमें हमने जन्म लिया है या प्रवेश किया है तथा जिस प्रकार से वह हमारे साथ व्यवहार करता है, या हमारी संपत्ति जैसे आलम्बन, और उनके साथ क्या होता है।

सीमित सत्त्वों के सामूहिक कर्म - इसकी सांकेतिक शब्दावली है "साँझा कर्म" - के अधिपतिफल के विषय में यह मुख्य रूप से उन परिवेशी या सामाजिक स्थितियों या घटनाओं के साँझा अनुभव का उल्लेख करता है जब यह समूह उन्हें अनुभव करता है। हम यह भी कह सकते हैं कि सामूहिक कर्म का अधिपतिफल उन परिवेशगत या सामाजिक स्थितियों या घटनाओं का भी उल्लेख करता है जो इस समूह को उन्हें अनुभव करने के हालात प्रदान करते हैं।

इस अंतिम कथन का अर्थ यह नहीं है कि, उदाहरण के लिए, जिस पर्यावरण का वे अनुभव करते हैं, जब भी वे करते हैं, उसका एकमात्र कारण इस समूह का सामूहिक कर्म है। पृथ्वी या ब्रह्माण्ड की बनावट जैसे परिवेश का वे जो अनुभव कर रहे हैं, यह असंख्य अन्य कारणों और प्रतिबंधों का परिणाम है। ब्रह्मांड के विषय में, इसका उपादानहेतु (वस्तु की तृष्णा के वशीभूत होकर उसे प्राप्त करने की प्रवृत्ति) - अर्थात् वह जिसके उत्तराधिकारी के रूप में हमने इस ब्रह्मांड को प्राप्त किया है और जो अपने उत्तराधिकारी के अस्तित्व में आने के बाद स्वयं अस्तित्वहीन हो जाता है - वह है महाविस्फोट सिद्धांत। हम उपादानहेतु को उन हेतुओं में विभाजित कर सकते हैं जो बहुत समय पहले हुए थे, जैसे कि महाविस्फोट, और वे जो वर्तमान क्षण से ठीक पहले हुए थे, जैसे कि विवर्तनिक प्लेट के स्थानांतरण का एक परिणामी भूकंप का उपादानहेतु बनना। तथापि पर्यावरण में क्षण-प्रति-क्षण हो रहे गौण परिवर्तन, जो एक बार हो चुके हों, जैसे किसी पेड़ से एक पत्ते का झड़कर गिरना, इस ब्रह्माण्ड के भौतिक शास्त्र के नियमों इत्यादि के परिणाम हैं। फिर भी, पर्यावरण से संबंधित पुरुषकारफल (मानव-निर्मित परिणाम) भी होते हैं, जैसे मनुष्यों की भूलों के परिणामस्वरूप हुआ वायु प्रदूषण। इसके अतिरिक्त एक क्षण विशिष्ट के संघटक तत्व, जैसे कि उस क्षण के ब्रह्मांड के द्रव्य और ऊर्जा ब्रह्माण्ड के लिए तत्क्षण सहभूहेतु (एक साथ उत्पन्न होने वाले कारण) हैं।

पृथ्वी की उत्पत्ति में सकारण योगदान देने वाले सामूहिक कर्म एवं उसके सम्बद्ध भौतिक नियम न केवल उन सत्त्वों के साँझा कर्म हैं जो इस धरती पर पहले रह चुके हैं, अपितु उन सत्त्वों के भी जो वर्तमान काल में रह रहे हैं तथा जो भविष्य में यहाँ रहेंगे। परन्तु, चूँकि पृथ्वी हमारे पूरे ब्रह्मांड का अंश है और भौतिक शास्त्र के नियम न केवल पृथ्वी पर, अपितु पूरे ब्रह्मांड पर लागू होते हैं, हमें सामूहिक कर्म की व्यापकता को देखना होगा - उन सभी लोगों के सामूहिक कर्म जो हमारे ब्रह्माण्ड में रह चुके हैं, आज रह रहे हैं, और जो भविष्य में रहेंगे। अंततः, ब्रह्मांड की भौतिक प्रकृति ऐसी है कि ठोस पदार्थ से बने यदि सब नहीं तो कम-से-कम एक विशाल संख्या में ग्रह किसी न किसी समय पर अस्थिर और भूकंप के अधीन तो होंगे ही।

चूँकि अब हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति की बात कर रहे हैं, इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति तथा इसे अनुभव कर रहे एक बड़ी संख्या के सत्त्वों के प्रति अपना योगदान देनेवाले सामूहिक कर्म उन सत्त्वों द्वारा महाविस्फोट से पहले ही संचित कर लिए गए होंगे जो इस ब्रह्माण्ड में जन्म लेने के कर्म से युक्त हैं।

परन्तु उन लोगों के बारे में आपका क्या विचार है जो ठीक उसी स्थान पर रहते हैं जहाँ घनघोर भूकंप आता है, जैसे पिछले सप्ताह हेटी में हुआ था? इसे समझने के लिए, यह स्मरण करना महत्त्वपूर्ण है कि (1) इस ग्रह के हर सत्त्व ने इस भूकंप के विनाशकारी प्रभावों का अनुभव नहीं किया और (2) यहाँ तक कि हेटी में भी, ऐसा नहीं है कि उस भूकंप में सबकी मृत्यु हुई या सब घायल हो गए। भले ही इससे दूरव्यापी विनाश हुआ हो परन्तु ऐसा नहीं है कि विनष्ट क्षेत्र का हर व्यक्ति घायल हुआ या मारा गया। यह इस बात को इंगित करता है कि जिन लोगों को गंभीर रूप से हानि पहुँची है, उन्होंने उस समय हानि का अनुभव करने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही रूप के कर्म संचित किए थे, जबकि अपेक्षया अप्रभावित लोगों ने ऐसे कर्म संचित नहीं किए थे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि जो लोग मारे गए वे किसी-न-किसी प्रकार से उन लोगों से "निकृष्टतर" थे जो बच गए। हम सभी के पास अपने समतान (चित्त धारा) में संचित सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह के कर्म हैं, और यह निर्धारित करने की स्थितियाँ अनेक एवं विविध परिस्थितियाँ होती हैं कि कौन-से कर्म का कब विपाक होगा। हो सकता है कि कोई व्यक्ति " चामत्कारिक रूप से" उस बड़े भूकंप से बच गया हो, केवल अगले दिन, अगले वर्ष, या अगले जीवनकाल में किसी अन्य बड़ी आपदा में मारे जाने के लिए। तो, क्या हम "व्यापक" सामूहिक कर्म, जिसे हम इस ग्रह पर सभी प्राणियों के साथ साँझा करते हैं, और अपेक्षाकृत "संकीर्ण" सामूहिक कर्म के बीच विभेद कर सकते हैं, जिसे हम इन सभी प्राणियों में से केवल एक निश्चित गुट के साथ साँझा करते हैं?

हाँ, हम वह विभेद कर सकते हैं। एक व्यापकतम सामूहिक कर्म है जिसने ब्रह्मांड के निर्माण में योगदान दिया है। इसे उस ब्रह्मांड में रहने वाले सभी सत्त्वों द्वारा साँझा किया गया है। उस समूह के भीतर, इस पृथ्वी पर रहने के लिए विशेष सामूहिक कर्म युक्त लोगों का एक उपसमूह है। इस उपसमूह के भीतर उन लोगों का एक उप-उपसमूह है जो हेटी के भूकंप का अनुभव करने के कर्मों से युक्त हैं, जिन लोगों ने, एक तरह से देखा जाए तो, उस भूकंप के होने में अपना योगदान दिया है।

यद्यपि उस उप-उपसमूह के प्रत्येक व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत कर्म (वह कर्म जिसे साँझा न किया गया हो) के परिणामस्वरूप भूकंप का अलग-अलग प्रकार से अनुभव किया; फिर भी, उनके बीच हम सामूहिक कर्मों के और अधिक उपसमूह पा सकते हैं जिसे व्यक्तियों के और अधिक गौण समूहों द्वारा साँझा किया गया हो। उदाहरण के लिए, कुछ लोग मारे गए और कुछ बच गए। जिन लोगों की मृत्यु हुई, उनके सामूहिक कर्म भूकंप में मारे जाने वाले थे, न कि केवल भूकंप का अनुभव करने वाले। मरने वालों में, कुछ लोगों के ऐसे सामूहिक कर्म रहे होंगे जो अन्य लोगों के साथ साँझा किए गए होंगे कि वे उन लोगों के साथ एक ही भवन के ढह जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त होंगे। इसलिए जब हम व्यक्तिगत कर्म की बात करते हैं, तो इससे अभिप्राय है कुछ ऐसा अनोखा अनुभव जिसे किसी और के साथ साँझा न किया गया हो, जैसे कि किसी डंडे से सिर पर प्रहार किए जाने के पंद्रह मिनट बाद मर जाना।

यदि हम एक क्षण के लिए वैश्विक स्तर पर देखें तो, जो सत्त्व अपने कर्म को पर्याप्त रूप से शुद्ध कर लेते हैं और दृढ़ विश्वास पैदा कर लेते हैं, उनका पुनर्जन्म तथाकथित "शुद्ध भूमि" या "बुद्ध-क्षेत्र" में हो सकता है, जैसे कि अमिताभ बुद्ध का क्षेत्र। फिर वे अपनेआप को एक ऐसे संसार में पाते हैं जिसमें इस तरह की हिंसक उथल-पुथल नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि इस तरह के शुद्ध-भूमि पुनर्जन्म में सभी पदार्थ, जैसे कि वृक्षों के बीच से निकलती हुई हवा की ध्वनि, धर्म की शिक्षा प्रदान करते हैं जिससे शुद्ध-भूमि के सत्त्व ज्ञानोदय प्राप्ति के और निकट आ जाते हैं। मैं इसे केवल इस बात को रेखांकित करने के लिए उद्धृत कर रहा हूँ कि किसी भी स्थान के गुणों और उस स्थान में बसने वाले सत्त्वों के चित्त की विशेषताओं के बीच सहसम्बन्ध होता है। संक्षेप में, जिन सत्त्वों का चित्त त्रिविषों - अज्ञान, लोभ, घृणा - के प्रभाव के अधीन रहता है, वे अपनेआप को हर प्रकार की क्षति से भरे संसार में पाते हैं, जबकि जिन लोगों ने इन विषाक्त भ्रांतियों से कुछ हद तक मुक्ति प्राप्त कर ली है, वे ऐसे वातावरण का अनुभव करते हैं जहाँ इस तरह की क्षति सामान्य रूप से कम पाई जाती है, या फिर शुद्ध-भूमि पुनर्जन्म में जैसा होता है, पूर्णतया अनुपस्थित है।

किसी भी शुद्ध क्षेत्र के मामले में, उदाहरण स्वरुप अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र को ही ले लें, अमिताभ द्वारा ज्ञानोदय प्राप्ति पूर्व संचित सकारात्मक शक्ति और अर्पित प्रार्थना ही उसका उपादानहेतु है। ये प्रार्थनाएँ उनके द्वारा निर्मित पुण्यसम्भार (सकारात्मक शक्तियों के संजाल) को, अपने निर्माणकाय रूप में उन अनार्यों को शिक्षा प्रदान करने हेतु, समर्पित की थीं, जो अनार्य निर्माणकाय बुद्ध से शिक्षा ग्रहण करने लायक कर्मों से युक्त थे, विशेष रूप से उन कर्मों से जिनसे वे निर्माणकाय शुद्ध क्षेत्र में जन्म लेकर शिक्षा ग्रहण करने के अधिकारी बने थे। उनकी प्रार्थना का एक और अतिरिक्त उद्देश्य संभोगकाय रूपों में उन आर्यों को शिक्षा देना भी था, जो आर्य सम्भोगकाय बुद्ध से शिक्षा ग्रहण करने योग्य कर्म से युक्त थे और, विशेष रूप से उस कर्म से युक्त थे जिससे वे सम्भोगकाय शुद्ध क्षेत्र में जन्म लेकर उन शिक्षाओं को ग्रहण करने के अधिकारी बने थे। चूँकि अमिताभ ने बुद्ध बनने से बहुत पहले ही बोधिसत्व के रूप में उन प्रार्थनाओं को अर्पित किया होगा, उनके शुद्ध क्षेत्र को उनका ज्ञानोदयकारी पुण्यसम्भार भी माना जा सकता है।

अमिताभ की शुद्ध क्षेत्र की उत्पत्ति के लिए सहकारीप्रत्यय (समानांतर सक्रिय अवस्था) सकल सीमित सत्त्वों का वह दुःख होगा जिसने अमिताभ द्वारा ज्ञानोदय प्राप्ति से पहले उन्हें करुणा तथा ऐसी प्रार्थना करने के लिए प्रेरित किया होगा। सहकारीप्रत्यय वह तत्त्व है जो किसी भी आलम्बन की उत्पत्ति से पहले अस्तित्वमान रहता है तथा जो उसकी उत्पत्ति में सहायता करता है, परन्तु जो स्वयं उस आलम्बन में रूपांतरित नहीं होता जिसकी उत्पत्ति हो रही है।

अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र में पुनर्जन्म लेने वाले व्यक्ति की शुद्धिकरण प्रक्रियाओं को, जो उस शुद्ध भूमि में उस व्यक्ति के जन्म से ठीक पहले के जीवनकाल में की गई हों, अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र की उत्पत्ति का कारण नहीं माना जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमिताभ का शुद्ध क्षेत्र उस समय अस्तित्वमान रहा ही होगा जब वह व्यक्ति अपनी शुद्धिकरण प्रक्रियाओं में लगा हुआ था। शुद्ध क्षेत्र के पुनर्जन्म से ठीक पहले के जीवनकाल में किसी व्यक्ति द्वारा की गई शुद्धिकरण प्रक्रियाएँ, तथा उस जीवनकाल में अमिताभ की शुद्ध क्षेत्र में पुनर्जन्म लेने के लिए की गई प्रार्थनाएँ, उस व्यक्ति के पुण्यसम्भार में एक अंतिम बूँद की तरह होंगी जिस पुण्यसम्भार को उसने अपने असंख्य जीवनकालों के दौरान संचित किया होगा जिसके परिणामस्वरूप उसे उस शुद्ध क्षेत्र में पुनर्जन्म मिलेगा। वे सत्त्व, जो अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र में जन्म लेने योग्य कर्म से युक्त हैं, यदि उन्होंने अपने जीवनकाल में शुद्ध क्षेत्र में जन्म लेने के लिए उस समय प्रार्थनाएँ की थीं जब अमिताभ अपने बोधिसत्त्व के रूप में ही थे, वे प्रार्थनाएँ ही अपना अधिपतिफल होकर अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र की उत्पत्ति में विपाक होने के कारण के रूप में कार्य कर सकती हैं। हालाँकि, यह केवल तभी हो सकता है जब इसे अमिताभ द्वारा उनके बुद्ध बनने से पहले की गई प्रार्थनाओं के साथ-साथ किया गया हो। अमिताभ के शुद्ध क्षेत्र में अपनी प्रार्थनाओं के सर्वसमावेशी परिणाम के रूप में विपाक होना केवल उस स्थिति में ही संभव होता यदि ये लोग अमिताभ को उनके बोधिसत्त्व काल में ही जानते होते और उनके बुद्धजन बनने के बाद उनके शुद्ध क्षेत्र में जन्म लेने के लिए उन्होंने विशिष्ट रूप से प्रार्थना की होती।

मैंने कुछ धर्म ग्रंथों में पढ़ा है कि सचेतन सत्त्वों में पृथ्वी अंश के असंतुलन के कारण भूकंप आते हैं। यह रोचक बात है, परन्तु मुझे नहीं पता मैं इस कथन का क्या अर्थ निकालूँ । क्या आप इसमें कोई सहायता कर सकते हैं?

मैंने इस उक्ति को कभी नहीं सुना, पर मुझे लगता है कि हम कर्म की कालचक्र प्रस्तुति के सन्दर्भ में इसे समझ सकते हैं। इस प्रस्तुति के अनुसार, असंख्य ब्रह्मांड हैं, जिनमें से प्रत्येक उत्पत्ति, स्थायित्व, और विघटन के कल्पों के कालचक्रों और रिक्त कल्पों से गुज़र रहा होता है। जब एक ब्रह्मांड अपने उत्पत्ति कल्प के चरण में होता है, तो हो सकता है दूसरा इसके विघटन कल्प के चरण में हो। ऐसा नहीं है कि ब्रह्मांड जिन चक्रों से गुज़रते हैं वे एक दूसरे के समकालिक हों।

ब्रह्मांडों की उपस्थिति के बीच के रिक्त कल्पों के दौरान प्रत्येक ब्रह्मांड के पाँच तत्व एक आकाशीय परमाणु में संकुचित हो जाते हैं। यह आकाशीय परमाणु किसी "कृष्ण विवर" (ब्लैक होल) की याद दिलाता है, यद्यपि दोनों में भिन्नताएँ हैं। ये पाँच तत्व हैं अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी; या फिर हम इन पाँचों की अंतरिक्ष, वायु या ऊर्जा, ऊष्मा, तरल और ठोस के रूप में कल्पना कर सकते हैं। विशेष रूप से, आकाशीय परमाणु में ब्रह्मांड के उन स्थूल मूलतत्व कणों के अवशिष्ट अंश होते हैं जो अब एक साथ नहीं जुड़े होते। इस अवस्था में, उस संकुचित ब्रह्मांड के सामान्य भौतिक नियम उन अवशिष्ट अंशों में प्रभावशाली नहीं होंगे। जो ब्रह्माण्ड अब तक अस्तित्व में नहीं आया, उसका आकाशीय परमाणु कालान्तर में प्रकट होने वाले ब्रह्माण्ड के पाँच तत्त्वों के स्थूल कणों का आधार बन जाएगा।

कालचक्र उन कर्म पवन की भी बात करता है, जिसका अभिप्राय है वे सूक्ष्म ऊर्जाएँ जिनमें व्यक्तियों की कर्म शक्तियाँ और प्रवृत्तियाँ निहित होती हैं। उदाहरण के लिए, रिक्त कल्प के अंत में हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाले महाविस्फोट से पहले, हमारे ब्रह्मांड में जन्म लेने के कर्मों के युक्त सत्त्वों के सामूहिक कर्म पवन ने हमारे ब्रह्मांड के आकाशीय परमाणु को प्रभावित किया। वे पवन उस आकाशीय परमाणु के महाविस्फोट तथा अपनी विशिष्ट विशेषताओं और भौतिक शास्त्र के नियमों से युक्त हमारे ब्रह्मांड के विकास का कारण बनें।

महाविस्फोट के समय जो सत्त्व हमारे ब्रह्मांड में पैदा होने के कर्म से युक्त थे तथा जिनके सामूहिक कर्म हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति को प्रभावित कर रहे थे, वे अन्य ब्रह्मांडों में स्थित होंगे। सांसारिक सत्त्वों के रूप में उनके शरीर के पाँचों तत्व असंतुलित रहे होंगे। परिणामस्वरूप, उनके सामूहिक कर्मों की पवन ने हमारे ब्रह्मांड के आकाशीय परमाणु को इस तरह प्रभावित किया होगा कि हमारे ब्रह्मांड के पाँच स्थूल तत्व जो उनसे विकसित होने थे, वे भी असंतुलित हो गए होंगे। इसे हम इस तरह व्याख्यायित कर सकते हैं कि हमारे ब्रह्मांड में पैदा होने के कर्मों से युक्त सत्त्वों के पृथ्वी तत्त्व के असंतुलन ने इस ग्रह के पृथ्वी तत्व के असंतुलन में योगदान दिया जिसके परिणामस्वरूप भूकंप आया।

कालचक्र शिक्षण सामूहिक कर्म तथा हमारे ब्रह्माण्ड के चट्टानी ग्रहों की अस्थिरता एवं भूकंप के अधीन होने के तथ्य के बीच के संबंध की व्याख्या करता है। परन्तु एक विशेष भूकंप को किसी एक समूह के लोगों का एक साथ अनुभव करने वाले सामूहिक कर्म का उदाहरण क्या हो सकता है? क्या यह इन सत्त्वों के किसी वास्तविक कर्म-विशेष का परिणाम हो सकता है, जैसे उस कथानक में वर्णित किया जाता है जहाँ किसी गाँव के कुछ लोगों द्वारा कुछ भिक्षुओं पर रेत फेंकने के कारण वे लोग स्वयं रेतीली आंधी में समा गए? या फिर यह इससे कहीं अधिक सूक्ष्म और व्यापक है?

निस्संदेह इस प्रश्न का उत्तर जटिल है। यदि किसी समूह विशेष के सत्त्व इस ग्रह के पृथ्वी तत्व के एक विशिष्ट असंतुलन का एक साथ अनुभव कर रहे हैं, तो हो सकता है ऐसा हुआ हो कि उन सब ने उसके लिए किसी विशिष्ट कृत्य में सम्मिलित होने का सामूहिक कर्म संचित कर लिया हो। यह ऐसा कार्य होगा जो किसी क्षेत्र के पृथ्वी तत्व के असंतुलन का कारण बना हो, जिस असंतुलन का दूसरों ने अनुभव किया और जिसके कारण उन्हें हानि पहुँची। उदाहरण के लिए, वह विनाशकारी कृत्य किसी परियोजना पर एक साथ काम कर रहे लोगों के एक समूह का हो सकता है जिसके कारण पर्यावरण को हानि पहुँची हो और पहाड़ गिरने या मिट्टी धँसने का कारण बना हो। या फिर हो सकता है वह समूह खनन सम्बन्धी स्फोटन संक्रिया में शामिल रहा हो।

हालाँकि, यह याद रहे कि सांसारिक सत्त्व असंख्य ब्रह्माण्डों के असंख्य ग्रहों पर रह चुके हैं। तो इसलिए यह अनिवार्य नहीं है कि किसी विशिष्ट ग्रह के किसी विशिष्ट भूकंप का अनुभव करने वाले सत्त्वों का सामूहिक कर्म उनके उस सांझा विनाशकारी कृत्य से संचित हुआ हो जिसे उन लोगों ने उस ग्रह में मिलकर किया हो। हो सकता है कि अतीत में किसी समय किसी अन्य ग्रह पर उन्होंने वह कृत्य किया हो। मुझे विश्वास है कि लोभ और मूढ़ता के कारण संसारी सत्त्वों ने अनंत ग्रहों पर अनंत बार पर्यावरण को नष्ट किया है। परन्तु केवल एक बुद्ध को ही इस बात का ज्ञान हो सकता है कि कौन-से विशिष्ट कर्म का किस विशिष्ट कर्मफल में विपाक हुआ है। निस्संदेह, कर्म का सर्वसमावेशी बोध होना सबसे अधिक जटिल विषय है।

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