वे चार अवधारणाएँ जो चित्त को धर्म की ओर प्रेरित करती हैं

आरम्भिक तैयारी

मैं अपना अध्यापन आरम्भिक तैयारियों के एक समूह से करना उचित मानता हूँ। ये विभिन्न विधियाँ हैं जो हमें स्वयं को शांत करने तथा ध्यान लगाने या उपदेशों को सुनने के लिए उचित मनःस्थिति बनाए रखने में सहायता करती हैं। किसी भी विषय में सम्पूर्ण रूप से प्रवेश करने में सक्षम होने के लिए हमें उसमें धीरे-धीरे और समुचित रीति से प्रविष्ट होना चाहिए। यह आरम्भिक तैयारी का एक उद्देश्य है।

ध्यान साधने या उपदेश को सुनने हेतु अनुकूल मन:स्थिति से युक्त होने के लिए कई अलग-अलग विधियाँ हैं। मैं प्रायः इनमें से केवल एक का पालन करता हूँ। यह विधि श्वासों की गिनती से प्रारम्भ होती है। जब हम अपने काम, यात्रा, इत्यादि से भावात्मक या मानसिक रूप से बहुत भटक जाते हैं, तब सबसे पहले चित्त को एक तटस्थ अवस्था में लाना अत्यावश्यक हो जाता है। यह हमें तनाव-मुक्त होने में सहायता करता है। इसका तरीका यह है कि हम नाक से सामान्य रूप से श्वसन करें, अर्थात न अति तीव्र गति से, न अति मंद गति से, न बहुत गहरी और न ही बहुत हल्की। उसका क्रम है पहले श्वास को छोड़ना, फिर थोड़ा ठहरना, और फिर, क्योंकि हमने श्वास को रोका है, हमस्वाभाविक रूप से अधिक गहरा श्वास ले ही लेते हैं। सचेतन रूप से गहरा श्वास लेने की तुलना में इस प्रकार श्वास लेना अधिक आरामदेह होता है। जैसे ही हम श्वास को वापस अंदर खींचते हैं उसे एक आवर्तन के रूप में मानते हैं। फिर बिना श्वास को रोके ही हम उसे छोड़ते हैं। हम इस क्रम को ग्यारह बार दोहराते हैं और फिर अपनी गति के अनुरूप ग्यारह की गिनती दो या तीन बार दोहराते हैं। इस गिनती की संख्या वास्तव में कोई मायने नहीं रखती है। हम किसी भी संख्या तक गिन सकते हैं। इस विषय में अंधविश्वासी होने की आवश्यकता नहीं है। बात यह है कि हम अपने चित्त की वाचिक ऊर्जा को किसी आलम्बन पर केंद्रित करें ताकि हम श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हुए कुछ और न सोचें। चलिए, अब हम ऐसा करते हैं।

एक बार जब हम शांत हो जाते हैं, तो हम अपनी ऊर्जा, अपने चित्त, एवं अपनी भावनाओं को सकारात्मक दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। ऐसा हम अपनी प्रेरणा की पुष्टि से करते हैं। हम यहाँ क्यों हैं? हम यहाँ रहकर या ध्यान-साधना के द्वारा क्या प्राप्त या निष्पादित करना चाहते हैं? हम यहाँ अधिकाधिक विधियाँ सीखने आए हैं जिनका हम स्वयं पर प्रयोग कर सकते हैं ताकि अपना जीवन जीने में सहायता मिल सके। हम यहाँ केवल मनोरंजन या मनोविनोद या बौद्धिक ज्ञान-अर्जन के लिए नहीं आते हैं। हम यहाँ कुछ व्यावहारिक बातें सीखने के लिए आते हैं। यह कारण ध्यान-साधना के लिए भी वैध है। यह केवल विश्राम या शौक या खेल के लिए नहीं है। हम अपने जीवन में काम आने वाले हितकारी अभ्यास को विकसित करने के लिए साधना करने का प्रयास करते हैं और इस प्रकार हम स्वयं अपनी ही सहायता करते हैं। हम अपने गुरु को प्रसन्न करने के लिए ऐसा नहीं करते हैं। हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि हम आश्वस्त हैं कि यह हमारे लिए हितकारी है। हम कुछ व्यावहारिक बातें सुनना चाहते हैं ताकि हम अपने जीवन की कठिनाइयों से अधिक कुशलतापूर्वक निपटने में सक्षम हो जाएँ, और केवल यह नहीं कि हमारे जीवन में कुछ हल्का-फुल्का सुधार आजाए, अपितु यह कि अंततः अपनी सारी कठिनाइयों से पूर्ण रूप से मुक्ति प्राप्त कर लें। हम ऐसी विधियाँ सीखना चाहते हैं जो हमें बुद्धजन बनने में सहायता कर सकें, ताकि हम दूसरों की सर्वोत्तम सेवा कर सकें।  

जब हम अपनी प्रेरणा की पुनःपुष्टि करते हैं, तो हम केवल यही नहीं देखते हैं कि हम यहाँ उपदेश देते या सुनते समय क्या कर रहे हैं, अपितु अंतिम उद्देश्य को भी ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण  है। यद्यपि हम मुक्ति और ज्ञानोदय का लक्ष्य रख सकते हैं, यह रातोंरात नहीं होने वाला है और चमत्कार तो सामान्य रूप से होते ही नहीं। धर्म कोई इंद्रजाल नहीं है। हम जादू सीखने नहीं जा रहे हैं जो यकायक हमें अपने सभी दुखों से मुक्त कर देगा। ऐसा नहीं है कि हम कुछ विधियाँ सीखते हैं जिनसे दिन-प्रतिदिन हमारा जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता जाएगा। हमें यथार्थवादी होना चाहिए। वास्तव में देखा जाए तो, और जैसा हमने अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों से जाना है, जीवन में मनोदशाओं एवं घटनाओं में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और यह बराबर ऐसे ही चलता रहेगा। हम यह आशा कर सकते हैं कि दीर्घकाल में स्थितियाँ बेहतर होंगी; परन्तु हमारे दैनिक जीवन में मुश्किल घड़ियाँ आएँगी ही। ऐसा नहीं है कि सहसा एक दिन हमारे दुःख समाप्त हो जाएँगे। यदि हम धार्मिक विधियों को सीखने और उनका अपनी साधना तथा अपने दैनिक जीवन में अभ्यास करने के विषय में व्यावहारिक मनोदृष्टि रखते हैं, तो हम कभी हताश नहीं होंगे। यहाँ तक कि जब जीवन में अत्यंत कठिन परिस्थितियाँ आती हैं और हम परेशान भी हो जाते हैं, तब भी हम अपने रास्ते से नहीं भटकेंगे। यह हमारी प्रेरणा है। यह हमारा उद्देश्य है। यह हमारी समझ है कि प्रवचन-सभाओं में आने तथा ध्यान-साधना एवं अभ्यास से हम क्या प्राप्त कर सकते हैं।

यह अत्यंत आवश्यक है कि हम पुनरीक्षण एवं विचार के द्वारा इसका स्मरण करते रहें। मान लीजिए कि हम ध्यान-साधना सत्र के प्रारम्भ होने से पहले अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। इस व्याकुलता से उबरने के लिए भोजन, मित्रों, विषय-भोग, टेलीविजन, या मदिरा की शरण लेने के बजाय हम धर्म की शरण लेते हैं और ध्यान-साधना करते हैं। ऐसी स्थिति में भी हमें बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है कि हम यह अपेक्षा न कर बैठें कि यह किसी मादक पदार्थ का सेवन करने जैसा होगा, मानो हम बैठकर ध्यान-साधना करते ही उसकी धुन में अनायास ही उत्तेजित एवं उल्लसित अनुभव कर लगेंगे और हमारी सारी समस्याएँ अंतर्धान हो जाएँगी। यदि ऐसा होता भी है तो तुरंत शंकित हो जाएँ। यदि हम ध्यान-साधना ठीक-ठीक करते हैं तो निस्संदेह हम अच्छा अनुभव कर सकते हैं। परन्तु यह हमें शत प्रतिशत दुःख से छुटकारा नहीं दिला सकता है। जब तक हम साधना की उन्नत श्रेणियों तक नहीं पहुँच जाते, तब तक इस अप्रिय मनोदशा के पलटकर आने की संभावना बनी रहती है। जैसा मैं प्रायः कहता हूँ, "आप संसार से और क्या उम्मीद कर सकते हैं?"

जब हम अपनी प्रेरणा की पुनःपुष्टि करते हैं तो हम यह कहते हैं कि, "ठीक है, मैं ऐसा करने वाला हूँ क्योंकि इससे मुझे लाभ मिलेगा। मैं इनका ठीक से प्रयोग करने का प्रयास करूँगा ताकि मैं जिस कठिनाई का अनुभव कर रहा हूँ उससे मुक्त हो जाऊँ और अंततः दूसरों के लिए सहायक बन पाऊँ।” बात यह नहीं है कि हम आधे घंटे बाद अच्छा अनुभव करते हैं या नहीं। यह हमारा मुख्य विषय नहीं है। हम जीवन में एक निश्चित दिशा में जा रहे हैं और हम ये सब उसी दिशा में और आगे बढ़ने के लिए कर रहे हैं। वह दिशा ही आश्रय है। हर बार जब हम उपदेश सुनते हैं या ध्यान-साधना करते हैं, तो हम उस दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाते हैं। उतार-चढ़ावों के होने पर भी हम आगे बढ़ते ही रहते हैं। यह यथार्थवादिता है। आइए हम क्षणभर के लिए इसकी पुनःपुष्टि करतेहैं।

तबहमएकाग्रचित्तहोकरध्यानकरनेकासचेतनिर्णयलेतेहैं।अर्थातयदिहमाराध्यानभटकजाताहै, तोहमउसेवापसलाएँगे; यदिहमउनींदेहोजातेहैं, तोहमस्वयंकोजागृतरखनेकाप्रयासकरेंगे।अपनेचित्तकोनिर्मल करने केलिएहमसीधेबैठतेहैंऔरऐसा करने के लिए कैमरासमकेंद्रितहोनेका रूपध्यान करसकतेहैं।

फिरहमएकसूक्ष्मसमन्वयकरसकतेहैं।सबसेपहले, यदिहमेंकिसीप्रकारके शारीरिकभारीपनकाअनुभवहोरहाहोऔरऐसालगरहाहोकिहमारी ऊर्जाबहुतकमहैतोहमअपनेशरीरमेंऊर्जाउन्नयनकाप्रयासकरतेहैं।इसकेलिएहमअपनेसिरकोसीधा रखतेहुएअपनीआँखोंकोऊपरउठाकरअपनीभौहोंकेबीचकेबिंदुपरकेंद्रितकरतेहैं।

फिरयदिहमारी ऊर्जाका अनियंत्रितसंचार हो रहाहोएवंहमकुछतनावग्रस्तभीहोगएहों, तोहमअपनेसिरकोसीधेरखतेहुएअपनीआँखोंकोअपनीनाभिपरसंकेंद्रितकरतेहैं।हमसामान्यरूपसेश्वास लेतेहैं,औरतबतकरोकेरखतेहैंजबतकहमेंउसेमुक्तकरनेकीआवश्यकताकाअनुभवनहींहोता।

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