संसार दुख का कारण है; धर्म सुख का मार्ग है

सभी जीव खुशी चाहते हैं, कोई भी दुख नहीं चाहता। धर्म हमें दुख से मुक्ति पाने और सुख को प्राप्त करने के तरीके सिखाता है। हम जिस धर्म का अनुशीलन करते हैं, दरअसल वही हमें थामे रहता है। इस बात को कई तरीकों से स्पष्ट किया जा सकता है। धर्म दुख से हमारी रक्षा करता है और सच्चे सुख के सभी स्रोतों का अवलंब प्रदान करता है।

खुशी का स्वरूप भौतिक या मानसिक हो सकता है। दुख के भी दो स्वरूप होते हैं: भौतिक और मानसिक। हालाँकि हम सभी खुशी को प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन हममें से बहुत से ऐसे हैं जो इसे पाने के तरीकों से अनजान होते हैं। और जो तरीके हम अपनाते हैं, वे हमें दुख की ओर ले जाते हैं।

कुछ लोग आजीविका चलाने के लिए चोरी और हत्या का मार्ग अपनाते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उन्हें खुशी मिल जाएगी। लेकिन ऐसा है नहीं। बहुत से लोग व्यापारी, किसान, आदि के रूप में कार्य करके कानून के दायरे में रहते हुए खुशी को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत होते हैं। बहुत से लोग इन तरीकों को अपना कर बहुत धनवान और प्रसिद्ध हो जाते हैं। इस प्रकार की खुशी चिरस्थायी नहीं होती है; यह खुशी परम सुख नहीं है। हमें कितनी ही खुशी या भौतिक सुख-साधन क्यों न मिल जाएं, हम उतने से कभी संतुष्ट नहीं होते। हम एक पूरे देश के स्वामी भी क्यों न बन जाएं, हमारी और अधिक पाने की भूख नहीं मिटेगी।

खुशी पाने के लिए हमारे प्रयास कभी खत्म नहीं होते। हम एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने के लिए कार आदि जैसे सबसे तेज़ साधनों का प्रयोग करते हैं ─ यह कोशिश कभी खत्म नहीं होती। इसीलिए कहा जाता है कि सांसारिक आपाधापी कभी खत्म नहीं होती, बस चलती रहती है। हम सभी इस बात को समझ सकते हैं: सांसारिक सुखों की खोज कभी पूरी नहीं होती।

नया खिला हुआ फूल ताज़गी भरा होता है, और पुराना होने पर मुरझा जाता है। इस जीवन में आप कुछ भी हासिल कर लें, उसका अन्त होना निश्चित है। समय बीतने के साथ ही उसका अन्त निकट पहुँचता जाता है, हमारे जीवन का अन्त समय आने पर जहाँ हमें सबसे अधिक दुख भोगने पड़ते हैं। हम मोटर वाहनों का उदाहरण ले सकते हैं। आप कबाड़ हुई कारों के किसी यार्ड के पास से होकर गुज़रते हैं जहाँ बेकार हुई कारों को पटक दिया जाता है। यही अन्तिम पड़ाव है, एक ऐसी अवस्था जहाँ सब कुछ कबाड़ में तब्दील हो जाता है। कार जब अच्छी हालत में होती है तब भी हम उसे लेकर चिन्तित रहते हैं। हमें चिन्ता होती है कि उसके पुर्ज़े खराब तो नहीं हो जाएंगे, हमें उसके टैक्स, बीमा आदि के भुगतानों की चिन्ता बनी रहती है। इसी उदाहरण को हम अपने दूसरे भौतिक सुख-साधनों पर भी लागू कर सकते हैं। हमारे पास जितना अधिक होता है, हमें उसे लेकर उतनी ही अधिक चिन्ताएं होती हैं।

धर्म हमें मानसिक खुशी को प्राप्त करने के साधनों के बारे में शिक्षा देता है। किसी प्रकार की मानसिक खुशी पाने के लिए हमें कोई शारीरिक श्रम करने की आवश्यकता नहीं होती है: इसके लिए हमें अपने मन के स्तर पर श्रम करने की आवश्यकता होती है। लेकिन हमारे मन के सातत्य का एक लम्बा प्रवाह होता है, जो हमारे भविष्य के जन्मों तक भी जाता है, और जो हमारे पिछले जन्मों से भी जुड़ा होता है। प्रत्येक जन्म में हम एक शरीर धारण करते हैं और उस शरीर के लिए सुख-सुविधाएं जुटाने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन हमारा चित्त मृत्यु के बाद भी कायम रहता है। इसलिए हमें अपने लिए ऐसी खुशी की कामना करनी चाहिए जो न केवल उत्कृष्ट और स्थायी हो, बल्कि हमारे भविष्य के सभी जन्मों में भी कायम रहे और जिसकी निरन्तरता में कोई व्यवधान न हो।

हम जो भी कार्यकलाप करते हैं, चाहे वे सकारात्मक हों या न हों, केवल यही धर्म नहीं है, बल्कि हमारे भविष्य के जन्मों को ध्यान में रखकर सकारात्मक कर्म करना ही धर्म है।

खुशी या दुख हमारे कर्मों का परिणाम होते हैं। इन कार्मिक कृत्यों की दृष्टि से नकारात्मक कर्म नकारात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं और सकारात्मक कर्म सकारात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं। इस जीवन में हम जो कुछ भी अच्छा कर पा रहे हैं, खेतों की बुवाई करना आदि, यह सब हमारे पिछले जन्मों के सकारात्मक कर्मों का सुपरिणाम है। यदि हम बहुत बीमार रहते हैं, या यदि हम दुखी रहते हैं या यदि हमारी आयु कम रहती है, तो यह सब हमारे विगत के नकारात्मक कर्मों का परिणाम है।

उदाहरण के लिए, दो व्यापारी हैं, उनमें से एक बहुत सफल रहता है और दूसरा व्यापार में सफल नहीं होता। ऐसा पिछले कर्मों के कारण होता है। दो व्यापारी हैं, एक बहुत मेहनत करता है और फिर भी सफल नहीं हो पाता जबकि दूसरे को कड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ती फिर भी वह सफल रहता है। एक अन्य उदाहरण, यदि आप जीव हत्या करते हैं, तो आप अधिक समय तक नहीं जिएंगे और आप रोगों से घिर जाएंगे। आप यहाँ उपस्थित गेशे-ला से इन सब चीज़ों के बारे में पूछ सकते हैं।

यदि आप इन नकारात्मक कर्मों से परहेज़ करें तो आपको किसी निम्नतर योनि में जन्म नहीं लेना पड़ेगा, बल्कि आपका जन्म मनुष्य योनि में या फिर देव योनि में होगा। किन्तु मनुष्य या देवता के रूप में जन्म ले लेने भर से आपको परम सुख की प्राप्ति नहीं होगी। यह सब तो दुख की ही प्रकृति है। ऐसा क्यों होता है? यदि आप कोई ऊँचा पद पा लेते हैं, तो फिर निम्नतर पद पर आपकी अवनति होती है; यदि आप निम्न पद पर होते हैं तो फिर ऊँचे पद पर आपकी उन्नति हो जाती है। इस उतार-चढ़ाव से बहुत दुख उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए, यदि आप भूखे हों तो आप भोजन करते हैं; लेकिन यदि आप बहुत अधिक खा लें, तो फिर आप बीमार हो जाते हैं। यदि आपको सर्दी लग रही हो, तो आप गर्मी के साधन चला लेते हैं और बहुत अधिक गर्मी उत्पन्न कर लेते हैं; और फिर आपको ठंडक के लिए उपाय करना पड़ता है। तो इस प्रकार के अनेक दुख हैं।

संसार (बार बार होने वाला जन्म जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं है) इस प्रकार के दुखों से भरा पड़ा है। ऐसा कर्म और अशांतकारी मनोभावों और दृष्टिकोण के कारण होता है। हमें शून्यता या अस्मिताहीनता के विवेक (विवेकी सचेतनता) विकसित करने की आवश्यकता है।

हम सोलह अर्हतों और दूसरे विभिन्न आर्यों को ऐसे लोगों के उदाहरणों के रूप में देख सकते हैं जो अपने भवचक्र के अन्त तक पहुँच चुके हैं। हालाँकि हम अपने भवचक्र को खत्म कर सकते हैं, लेकिन इतना भर कर लेना काफी नहीं है, क्योंकि किसी ने भी सभी सीमित क्षमता वाले जीवों (सचेतन जीवों) से हमारे प्रति अधिक सदयता प्रदर्शित नहीं की है। हमें डेयरी उत्पाद पशुओं की सदयता के कारण प्राप्त होते हैं। यदि हमें भोजन के रूप में मांस प्राप्त होता है, तो वह हमें स्वस्थ पशुओं के वध के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है। सर्दियों में हम लोमचर्म और ऊन से बने कोट पहनते हैं तो वे भी हमें पशुओं से ही प्राप्त होते हैं। यह उनकी दयालुता है कि वे हमें यह सब उपलब्ध कराते हैं। हमें स्वयं बुद्धत्व प्राप्त करके सभी जीवधारियों की दयालुता का ऋण चुकाना चाहिए ─ तब हम सभी सीमित क्षमता वाले जीवों के लक्ष्यों को पूरा कर सकेंगे।

श्रावक और अर्हत सभी सीमित क्षमता वाले जीवों के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकते हैं। इस कार्य को केवल कोई बुद्ध ही कर सकता है, इसलिए हमें सच्चे अर्थ में उनकी सहायता करने के लिए यह कार्य करना चाहिए। इसके लिए हमें स्वयं बुद्ध बनना होगा।

ऐसा हम कैसे कर सकते हैं? धर्म का पालन करके। भारत में बहुत पहुँचे हुए महासिद्ध हुए, उनमें से अस्सी का जीवन चरित हमें ज्ञात है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे असंख्य लोग हुए हैं। ये लोग अपने जीवन काल में ही ज्ञानोदय को प्राप्त कर लेते हैं। तिब्बत में मिलारेपा और काग्यू, निंग्मा, शाक्य, और गेलुग निकायों के अनेक महान आचार्यों के उदाहरण उपलब्ध हैं।

एक बार बुद्धत्व को प्राप्त कर लेने के बाद हमारे धर्म सम्बंधी उद्यम अन्तिम चरण पर पहुँच जाते हैं। शुरुआत में धर्म के अनुशीलन का कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता है, लेकिन फिर वह सरल होता चला जाता है, और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं, इसको करने से मिलने वाला सुख भी बढ़ता चला जाता है। धर्म की परिणति पूर्ण सुख की अवस्था में होती है। सांसारिक कार्यकलाप हमें केवल दुख ही देते हैं।

उदाहरण के लिए, जब लोगों की मृत्यु होती है, तो जीवन के मृत्यु के रूप में परिणत या समाप्त होने से केवल दुख और तकलीफ ही उत्पन्न होती है, जो न केवल स्वयं उन्हें दुख पहुँचाती है, बल्कि उनके पीछे छूट जाने वाले स्वजनों को भी तकलीफ देती है, जैसा कि उनके अन्तिम संस्कार के समय होता है। हमें इसके बारे में विचार करना चाहिए और कुछ धर्म का कार्य करना चाहिए। ज्ञानोदय की प्राप्ति के साथ धर्म की परिणति या अन्तिम बिन्दु पर पहुँचने पर न केवल हमें, बल्कि दूसरों को भी केवल सुख ही मिलता है।

हमें दस नकारात्मक कृत्यों को करने से बचना चाहिए। यदि हम सकारात्मक कर्म करते हैं तो हमें खुशी की प्राप्ति होती है, लेकिन यदि हम नकारात्मक कर्म करते हैं तो हमें दुख मिलता है। हमें अपने कर्मों के परिणामों के बारे में विचार करना चाहिए और अपने कर्मों के कारण के रूप में अपने चित्त का विवेचन करना चाहिए। जब हम यह विवेचन करते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे चित्त में तीन विद्वेषपूर्ण मनोभाव और प्रवृत्तियाँ मौजूद होती हैं: इच्छा या वासना, द्वेषभाव, और संकीर्णमनस्क अज्ञानता (भोलापन)।

इन तीनों से 84,000 किस्म के अशांतकारी मनोभाव और प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। यही 84,000 भ्रांतियाँ हमारी प्रमुख शत्रु हैं, इस प्रकार हम अपने शत्रुओं को अपने आस-पास नहीं, बल्कि अपने भीतर तलाश करते हैं। इन 84,000 में से ये तीन विद्वेषपूर्ण मनोभाव हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं, और इनमें से भी सबसे खतरनाक शत्रु संकीर्णमनस्क अज्ञानता या भोलापन है जो हमारे चित्त के प्रवाह में मौजूद रहता है।

कुल मिलाकर, हमें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और अपने अन्दर के इन शत्रुओं को मार भगाने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी वजह से बौद्ध धर्म के अनुयायियों को “अंतरंगी” (नांग-पा) कहा जाता है, क्योंकि वे हमेशा आत्मनिरीक्षण करते हैं। यदि हम अपने मानसिक सातत्यों में इन अशांतकारी मनोभावों और प्रवृत्तियों का शमन कर देते हैं तो हम अपने सभी दुखों को भी समाप्त कर देते हैं। ऐसा करने के लिए प्रयासरत रहने वाले व्यक्ति को ही धर्म का अनुयायी कहा जाता है।

केवल अपने अन्दर के अशांतकारी मनोभावों और प्रवृत्तियों का शमन करने के लिए धर्म का अनुशीलन करने वाले व्यक्ति का अनुशीलन हीनयान का अनुशीलन है। लेकिन जब हम न केवल अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए अपने भ्रमों को दूर करने के लिए कार्य करते हैं, बल्कि दूसरों के कल्याण को अधिक महत्व देते हुए इस उद्देश्य के साथ अपने मिथ्याबोध को मिटाने का प्रयत्न करते हैं कि हम दूसरों के चित्त के अशांतकारी मनोभावों और प्रवृत्तियों को भी दूर करने में उनकी सहायता कर सकें, तब हम महायान के साधक अनुयायी हुए। इस देह की भौतिक चेष्टाओं के आधार पर हमें महायानी बनने के लिए प्रयत्नरत होना चाहिए, और ऐसा करने का परिणाम यह होता है कि हम किसी बुद्ध की भांति ज्ञानोदय को प्राप्त करने के लिए योग्य बन जाते हैं।

मुख्य बात यह है कि हमें सदैव सभी का हित करने का प्रयत्न करना चाहिए और कभी भी किसी को भी हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। “ऊँ मणि पद्मे हुं” का उच्चार करते समय हमारे मन में यह विचार होना चाहिए कि “इस जाप से उद्भूत सकारात्मक ऊर्जा से सीमित क्षमता वाले सभी जीवधारी लाभान्वित हों।“

भौतिक स्तर पर हमें जो यह काया मिली है इसे प्राप्त करना बहुत कठिन होता है: मनुष्य योनि में जन्म आसानी से नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, आप इस पृथ्वी को देखें। इसका अधिकांश भाग समुद्र है, और आप विचार करें कि इन समुद्रों में कितनी मछलियाँ होंगी। पृथ्वी पर अधिकांश जीवधारी पशुओं और कीड़े-मकोड़ों के रूप में हैं। यदि हम इस पूरे ग्रह और इसमें रहने वाले पशुओं और कीटों की संख्या की दृष्टि से देखें तो हमें मनुष्य के रूप में जन्म मिलने की विरलता का बोध होगा।

धर्म के मार्ग में बोध और ज्ञान की प्राप्ति बहुत धीमी गति से होती है। ऐसा कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों या महीनों की साधना से नहीं हो जाता है। वस्तुतः धर्म का ज्ञान प्राप्त करना तो दूर, विरले ही कुछ मनुष्य धर्म के बारे में विचार करते हैं। इसके लिए लम्बे समय तक सतत साधना करने की आवश्यकता होती है। यहाँ एक विद्वान गेशे उपस्थित हैं जो इस सम्बंध में आपकी सभी शंकाओं का समाधान कर सकते हैं। कालांतर में बुद्ध के धर्म का प्रसार होता रहेगा और यह दूर-दूर तक फैलेगा। आज भी इसका प्रसार हो रहा है और यह एक जीवंत धर्म है। जब बुद्ध ने पहले-पहल उपदेश दिया, उस समय उनके केवल पाँच शिष्य थे। इन्हीं लोगों से वह फैला और आज उसका कितना विस्तार हो चुका है।

अब हमारे पास परम पावन दलाई लामा हैं जो शाक्यमुनि के समतुल्य हैं, और वे अक्तूबर में यहाँ पधारने वाले हैं। परम पावन आपको जो भी उपदेश दें, उसे हृदयंगम कर लें और निष्ठापूर्वक उसका अनुशीलन करें। शिक्षाओं का सार यह है कि हम कभी किसी जीव को हानि न पहुँचाएं और हमारे मन में कोई दुर्भाव न हो ─ केवल सभी का कल्याण करने का प्रयत्न करें। यही मुख्य बात है। यदि आप ऐसा आचरण करेंगे, तो भविष्य में इसके बड़े लाभ होंगे।

मैथ्यू रिकार्ड – सुख क्या है, दुख क्या है?
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