अपने और दूसरों के बारे में दृष्टिकोण को समान करने और उसकी अदला-बदली करने

त्सेनझाब सरकाँग रिंपोशे ने अपनी मृत्यु से दो महीने पहले डा. बर्ज़िन को इस शिक्षा का उपदेश दिया और उन्हें यह निर्देश दिया कि वे इसे शब्दशः लिखें और इसे उनकी सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा के रूप में सहेज कर रखें। इस शिक्षा में दुख और समस्याओं के सबसे बड़े स्रोत – स्वयं को महत्वपूर्ण समझने के हमारे दृष्टिकोण – पर विजय पाने और उसके स्थान पर दूसरों को महत्वपूर्ण समझने का दृष्टिकोण, जो समस्त सुख का स्रोत है, को विकसित करने के बारे में विस्तार से बताया गया है।

बोधिचित्त विकसित करने के बारे में दो परम्पराएं हैं, दूसरों के लिए और उनकी अधिकाधिक भलाई करने की दृष्टि से ज्ञानोदय प्राप्त करने के लिए पूर्णतः समर्पित हृदय – 7 भागों वाली कारण और प्रभाव परम्परा और स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोण को समान करने और उसकी अदला-बदली करने की परम्परा। प्रत्येक परम्परा की पहले से ही प्रारम्भिक तैयारी के रूप में समवृत्ति विकसित करने की एक अलग विशिष्ट रीति है। हालाँकि इनमें से प्रत्येक का नाम समान है किन्तु समवृत्ति, विकसित की जाने वाली समवृत्ति का प्रकार भिन्न होता है।

  1. 7 भागों वाली कारण तथा प्रभाव सम्बंधी ध्यानसाधना में हर एक को पूर्वजन्मों में अपनी माताओं के रूप में पहचानने से पूर्व विकसित होने वाली समवृत्ति में हम किसी मित्र, किसी शत्रु, और किसी अजनबी व्यक्ति के बारे में कल्पना करते हैं और यह एक ऐसी समवृत्ति होती है जिसकी सहायता से हम अपने भीतर आसक्ति और विकर्षण के भावों को उत्पन्न होने से रोकते हैं। इसका एक नाम दरअसल “मित्रों, शत्रुओं, और अनजान लोगों के प्रति आसक्ति और विकर्षण को रोकने वाली केवलमात्र समवृत्ति” भी है। यहाँ केवलमात्र शब्द से आशय यह है कि इससे अधिक उन्नत स्तर वाली एक दूसरी विधि भी मौजूद है।

    पहले प्रकार की इस समवृत्ति का एक अन्य नाम “श्रावकों और प्रत्येकबुद्धों में समान रूप से समवृत्ति विकसित किए जाने की केवलमात्र समवृत्ति” है। श्रावक (श्रोताजन) और प्रत्येकबुद्ध (एकांत में रहकर केवल अपने कल्याण का उपाय करने वाले) बुद्ध की शिक्षाओं की हीनयान (लघुतर वाहन) शाखा के दो प्रकार के साधक होते हैं। यहाँ केवलमात्र का अर्थ यह है कि इस प्रकार की समवृत्ति को विकसित करके न तो हमारा हृदय बोधिचित्त विकसित करने के लिए समर्पित होता है और न ही हम उससे किसी प्रकार से सम्बंधित होते हैं।
  2. हम स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोण को समान करने और उसकी अदला-बदली के लिए प्रारम्भिक तैयारी के रूप में जिस प्रकार की समवृत्ति को विकसित करते हैं वह केवल ऊपर बताए गए प्रकार की समवृत्ति ही नहीं होती है। यह ऐसी समवृत्ति होती है जहाँ हमें सभी सीमित क्षमताओं वाले जीवों की भलाई करने और उनकी सहायता करने और उनकी समस्याओं को दूर करने सम्बंधी हमारे विचारों या कर्मों की दृष्टि से निकट या दूर होने का कोई भाव नहीं होता है। यह महायान (बृहत्तर वाहन) में समवृत्ति विकसित करने की विशिष्ट, असामान्य विधि है।

केवलमात्र समवृत्ति

यदि हम यह पूछें कि 7 भागों वाली कारण तथा प्रभाव सम्बंधी विधि में सभी को अपनी पूर्व की माताओं के रूप में पहचानने से पूर्व उत्पन्न होने वाली समवृत्ति को विकसित करने की विधि क्या है, तो उसे निम्नलिखित चरणों में विकसित किया जाता है।

तीन व्यक्तियों का मानसिक चित्रण

पहले हम तीन व्यक्तियों का मानसिक चित्रण करते हैं: कोई ऐसा बेहद अप्रिय और अरुचिकर व्यक्ति जो हमें नापसंद हो या जिसे हम अपना दुश्मन समझते हों, कोई ऐसा व्यक्ति जो हमें प्रिय हो जिसकी हम परवाह करते हों या जो हमारा मित्र हो, और कोई अजनबी व्यक्ति या कोई ऐसा व्यक्ति जिसके बारे में हमारी मिली-जुली भावना हो जिसके प्रति हम इन दोनों में से किसी भी प्रकार की भावना न रखते हों। हम एक साथ इन तीनों व्यक्तियों का मानसिक चित्रण करते हैं।

जब हम एक-एक करके इनमें से प्रत्येक पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो हमारे भीतर सामान्य तौर पर किस प्रकार का मनोभाव उत्पन्न होता है? हम जिस व्यक्ति को नापसंद करते हैं उसके बारे में अरुचि, असहजता, और विकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। अपने प्रिय मित्र के प्रति हमारे मन में आकर्षण और आसक्ति का भाव उत्पन्न होता है। जो व्यक्ति हमारा शत्रु या मित्र में से कुछ भी न हो, उसके प्रति तटस्थता का भाव उत्पन्न होता है, हम न तो उसकी सहायता करना चाहते हैं और न ही उसे नुकसान पहुँचाना चाहते हैं, क्योंकि वह अजनबी व्यक्ति न तो हमें आकर्षक लगता है और न ही हमारे मन में उसके प्रति विकर्षण होता है।

किसी नापसंद व्यक्ति के प्रति विकर्षण को रोकना

चर्चा की सुविधा के लिए हम कल्पना कर लेते हैं कि ये तीनों ही व्यक्ति महिलाएं हैं। पहले हम नापसंद व्यक्ति, वह व्यक्ति जिसे हम अपना शत्रु भी मान सकते हैं, पर प्रयोग करके देखते हैं।

  1. हम उसके प्रति नापसंदगी और विकर्षण के भाव को उत्पन्न होने देते हैं। जब वह भाव स्पष्ट तौर पर उत्पन्न हो जाए,
  2. हम पाते हैं कि एक अन्य भाव भी उत्पन्न हो रहा है, यानी अच्छा हो यदि उस महिला के साथ कुछ बुरा घटित हो जाए, या उसे किसी ऐसे अनुभव से होकर गुज़रना पड़े जिसे वह न चाहती हो।
  3. फिर हम उसका बुरा होने की भावना या कामनाओं के उत्पन्न होने के कारणों की जाँच करते हैं। सामान्यतया हम पाते हैं कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उस महिला ने हमें कोई चोट पहुँचाई थी, हमारा कोई नुकसान किया था, या हमारे साथ या हमारे किसी मित्र के साथ कोई बहुत बुरा व्यवहार किया था या बुरे शब्द कहे थे। यही कारण है कि हम कामना करते हैं कि उसका कुछ बुरा हो जाए या जो वह चाहती है वह उसे न मिले।
  4. अब, हम बेहद नापसंद इस महिला का कुछ बुरा होने की अपनी कामना के कारण के बारे में विचार करते हैं और यह जाँचते हैं कि क्या यह ऐसी कामना करने के लिए उपयुक्त कारण है। हम निम्नवत विचार करते हैं:


    • पिछले जन्मों में यह तथाकथित शत्रु महिला कई बार मेरी माता या मेरा पिता रह चुकी है, और मेरा रिश्तेदार और मित्र भी रह चुकी है। उसने अनगिनत बार मेरी बहुत मदद की है।
    • यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि इस जीवन में क्या होने वाला है। कालान्तर में इस जीवन में वह बहुत बड़ी सहायक और मित्र बन सकती है। ऐसी बातों का होना बहुत सम्भव है।
    • कुछ भी हो, इस महिला के और मेरे भविष्य में असंख्य जन्म होंगे और यह बिल्कुल निश्चित है कि वह कभी न कभी मेरी माता या मेरा पिता बनेगी। उस स्थिति में वह मेरी बहुत सहायता करेगी, और मुझे अपनी सारी आशाएं उसी पर टिकानी होंगी। इसलिए भूत, वर्तमान और भविष्य के दृष्टिगत उसने अनेकानेक प्रकार से मेरी सहायता की है, कर रही है और भविष्य में भी करेगी, इसलिए अन्ततोगत्वा वह एक अच्छी मित्र है। यह बात निश्चित है। इसलिए, क्योंकि उसने मुझे इस जीवन में थोड़ी चोट पहुँचाई है, इस कारण से यदि मैं उसे अपना शत्रु समझता हूँ और उसका बुरा होने की कामना करता हूँ तो यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
  5. अब हम कुछ उदाहरण देखें। मान लीजिए कि कोई बैंक का अधिकारी है या कोई धनी व्यक्ति है जो मुझे बहुत सा धन दे सकता है और ऐसा करने की जिसकी इच्छा या मंशा रही हो और जिसने विगत में थोड़ा-बहुत ऐसा किया भी हो, यदि वह अपना आपा खोकर क्रोध में किसी दिन मेरे मुँह पर थप्पड़ मार दे। यदि मैं इस बात से नाराज़ हो जाऊँ और उसके प्रति क्रोध बनाए रखूँ तो इसके कारण वह व्यक्ति मुझे आगे और अधिक धन देने के अपने निश्चय को बदल सकता है। इस बात का भी खतरा हो सकता है कि वह व्यक्ति अपना विचार बदल कर उस धन को किसी और को देने का भी निश्चय कर सकता है। इसके विपरीत, यदि मैं उस थप्पड़ को सहन कर लूँ, अपनी नज़रें झुकाए रखूँ, और अपना मुँह बंद रखूँ, तो वह व्यक्ति बाद में मुझसे और भी प्रसन्न हो जाएगा कि मैं नाराज़ नहीं हुआ। हो सकता है कि उसने मुझे पहले जितनी राशि देने का मन बनाया था, उससे भी अधिक राशि दे दे। लेकिन, यदि मैं नाराज़ होकर बखेड़ा खड़ा कर दूँ तो वही स्थिति होगी जैसी एक तिब्बती कहावत में बताई गई है, “आप भोजन मुँह में रखते हैं और आपकी जीभ उसे बाहर धकेल देती है।“
  6. इसलिए मुझे इस व्यक्ति, जो मुझे नापसंद है, के साथ अपने सम्बंध को लम्बी अवधि के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए और सभी सीमित क्षमता वाले जीवधारियों के मामले में भी यही बात लागू होती है। यह बात 100% निश्चित है कि लम्बी अवधि में मुझे उनकी सहायता की आवश्यकता होगी। इसलिए मेरे लिए ऐसा करना सर्वदा अनुचित है कि मैं किसी के द्वारा किए गए किसी छोटे-मोटे नुकसान के लिए अपने मन में क्रोध के भाव को बनाए रखूँ।
  7. आगे हम विचार करते हैं कि किस प्रकार कोई बिच्छू, जंगली पशु, या प्रेत ज़रा सा भी छेड़े या उकसाए जाने पर पलट कर हमला कर देता है। फिर अपने बारे में विचार करते हुए हम यह सोचते हैं कि इन जीवों की भांति व्यवहार करना कितना अनुचित है। इस प्रकार हम अपने क्रोध को शांत कर देते हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि यह व्यक्ति मुझे किसी भी प्रकार का नुकसान क्यों न पहुँचाए, मैं अपने ऊपर नियंत्रण खो कर क्रोधित नहीं होऊँगा, नहीं तो मेरे और किसी जंगली पशु या बिच्छू के बीच कोई अन्तर नहीं रह जाएगा।
  8. निष्कर्षतः, हम इस पूरी चर्चा को तर्क के एक न्यायवाक्य में प्रस्तुत कर सकते हैं। मैं दूसरों से इस बात के लिए क्रोधित होना बंद कर दूँगा कि उन्होंने मुझे कोई नुकसान पहुँचाया है, क्योंकि
    • पिछले जन्मों में वे मेरे माता-पिता रहे हैं;
    • यह निश्चियपूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि बाद में इस जीवनकाल में वे मेरे प्रियतम मित्र नहीं बन जाएंगे;
    • भविष्य में किसी न किसी समय उनका पुनर्जन्म मेरे माता-पिता के रूप में होगा और वे मेरी बहुत सहायता करेंगे;
    • और यदि मैं पलट कर उन पर क्रोधित हो जाऊँ तो फिर मैं किसी भी दृष्टि से किसी जंगली पशु से बेहतर नहीं हूँ। इसलिए मैं इस जीवन में दूसरों द्वारा किए गए किसी छोटे-मोटे नुकसान के लिए उन पर क्रोधित होना बंद कर दूँगा।

हमें प्रिय लगने वाले किसी व्यक्ति के प्रति आसक्ति से मुक्त होना

  1. हम शत्रु, मित्र और अजनबी व्यक्ति के जिस समूह की हमने शुरू में कल्पना की थी, उसमें से अपने मित्र या प्रिय व्यक्ति पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं।
  2. हम उस महिला के प्रति आकर्षण और आसक्ति की अपनी भावनाओं को उत्पन्न होने देते हैं।
  3. उस व्यक्ति के सान्निध्य में रहने की अपनी भावना को और अधिक प्रबल होने देकर हम
  4. उस व्यक्ति के प्रति अपनी इतनी मुग्धता या आसक्ति के कारणों की जाँच करते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसने इस जीवनकाल में मेरी थोड़ी सहायता की थी, मेरे लिए कोई अच्छाई का काम किया था, कुछ ऐसा किया था जिससे मुझे अच्छा लगा, या इसी तरह का कुछ और किया था, और इसलिए मैं स्वयं को उसकी ओर आकर्षित महसूस करता हूँ और मुग्ध हो जाता हूँ।
  5. अब हम यह जाँच करते हैं कि क्या यह ऐसी भावना अनुभव करने के लिए समुचित कारण है। यह कारण भी समुचित नहीं है, क्योंकि
    • निःसंदेह पूर्व के जन्मों में वह मेरी शत्रु रह चुकी है, मुझे नुकसान पहुँचा चुकी है, और मेरा मांस तक खा चुकी है और मेरा लहू पी चुकी है।
    • यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि बाद में इस जीवनकाल में वह मेरी सबसे बड़ी शत्रु नहीं बन जाएगी।
    • यह निश्चित है कि भविष्य के जन्मों में वह मुझे नुकसान पहुँचाएगी या कभी न कभी मेरा साथ कुछ बहुत बुरा करेगी।
  6. यदि उसके द्वारा इस जन्म में मेरे लिए कोई मामूली सा अच्छा कार्य कर दिए जाने के कारण यदि मैं उसके प्रति मुग्ध और आसक्त हो जाता हूँ तो मैं उन पुरुषों से किसी भी दृष्टि से बेहतर नहीं हूँ जो नरभक्षी मोहिनी स्त्रियों के गीतों के प्रलोभन में आ जाते हैं। ये मोहिनी स्त्रियाँ सुंदर रूप धारण करके पुरुषों को फुसला लेती हैं और फिर बाद में उन्हें निगल जाती हैं।
  7. इस प्रकार हम निश्चय करते हैं कि हम किसी व्यक्ति द्वारा इस जीवनकाल में हमारे लिए किए गए किसी मामूली अच्छे कार्य के कारण उसके प्रति कभी आसक्त नहीं होंगे।

किसी तटस्थ व्यक्ति के प्रति उदासीनता से मुक्त होना

तीसरे, हम किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति जो बीच की स्थिति में हो – वह अजनबी जो न हमारा मित्र हो और न ही शत्रु हो – वही प्रक्रिया अपनाते हैं।

  1. हम अपने मानसिक चित्रण वाले उस व्यक्ति पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं,
  2. हम उसके प्रति निर्विकार भाव उत्पन्न करते हैं, न तो हमें उसे नुकसान पहुँचाने की इच्छा होती है और न ही उसकी सहायता करने की, न तो हम उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं और न ही हम उसके साथ रहना चाहते हैं,
  3. और फिर आगे चलकर उसे अनदेखा करने की मंशा को अनुभव करते हैं।
  4. हम जाँच करते हैं कि हमें ऐसा क्यों महसूस हो रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसने न तो मेरी सहायता करने के लिए कुछ किया है और न ही मुझे नुकसान पहुँचाने के लिए, और इसलिए उसके साथ मेरा कोई सम्बंध नहीं है।
  5. जब हम आगे और जाँच करते हैं कि क्या ऐसा अनुभव करने के लिए यह एक मान्य कारण है तो हम पाते हैं कि वह पूरी तरह से हमारे लिए अजनबी नहीं है, क्योंकि पिछले अनगिनत जन्मों में, बाद में इस जन्म में भी, और भविष्य के जन्मों में भी वह हमारे निकट रहने वाली है, वह हमारी मित्र आदि बनेगी।

इस प्रकार हम शत्रुओं, मित्रों और अजनबियों के प्रति क्रोध, आसक्ति, या तटस्थता के सभी भावों से मुक्त हो सकेंगे। केवलमात्र समवृत्ति, जो श्रावकों और प्रत्येकबुद्धों के लिए एक समान होती है और जिसे समर्पित बोधिचित्त हृदय को विकसित करने के लिए 7 भागों वाली कारण तथा प्रभाव विधि में प्रत्येक जीव को पूर्व में रही हमारी माता के रूप में स्वीकार करने की दृष्टि से प्रारम्भिक तैयारी के रूप में विकसित किया जाता है, को विकसित करने की यही विधि है।

अपने दृष्टिकोणों को समान करने और उनकी अदला-बदली के लिए प्रारम्भिक तैयारी के रूप में समवृत्ति को विकसित करना

स्वयं अपने और दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोणों को एक समान करने और उनकी अदला-बदली करने की प्रारम्भिक तैयारी के रूप में समवृत्ति को विकसित करने की विधि को दो भागों में बांटा जाता है:

  • सापेक्ष दृष्टिकोण पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि
  • गूढ़तम दृष्टिकोण पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि

सापेक्ष दृष्टिकोण पर निर्भर करने वाली विधि को आगे दो भागों में बांटा जाता है:

  • हमारे अपने दृष्टिकोणों पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि,
  • दूसरों के दृष्टिकोणों पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि।

हमारे अपने दृष्टिकोणों पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि

इसके तीन बिन्दु हैं।

  1. चूँकि सभी सीमित क्षमता वाले जीव अनगिनत जन्मों में हमारे माता-पिता, सम्बंधी, और मित्र रह चुके हैं, इसलिए उनके बारे में यह अनुभव करना अनुचित है कि उनमें से कुछ हमारे निकट हैं तो कुछ हमसे दूर हैं, कि यह हमारा मित्र है और वह हमारा शत्रु है, कि हम कुछ का स्वागत करें और कुछ को अस्वीकार कर दें। हमें यह सोचना चाहिए कि कुछ भी हो, यदि मैंने अपनी माता को पिछले 10 मिनटों से नहीं देखा हो, 10 वर्षों से नहीं देखा हो, या 10 जन्मों से नहीं देखा हो, फिर भी वह मेरी माता ही है।
  2. लेकिन यह भी सम्भव है कि जैसे इन जीवों ने मेरी सहायता की है, उसी तरह कभी-कभी उन्होंने मुझे नुकसान भी पहुँचाया है। जितनी बार उन्होंने मेरी सहायता की है और जिस मात्रा में सहायता की है, यदि उसकी तुलना की जाए तो उनके द्वारा पहुँचाया गया नुकसान तुच्छ है। इसलिए किसी एक को घनिष्ठ मानते हुए उसका स्वागत करना और किसी दूसरे को अपने से दूर समझते हुए उसे अस्वीकार कर देना अनुचित है।
  3. हमारी मृत्यु होना तो निश्चित है, किन्तु हमारी मृत्यु का समय पूरी तरह से अनिश्चित है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि हमें कल मृत्युदंड दिए जाने की सजा सुनाई गई हो। ऐसी स्थिति में अपने आखिरी दिन को किसी पर क्रोधित होने और किसी को नुकसान पहुँचाने में लगाना विवेकहीनता होगी। किसी तुच्छ कार्य को करने का चुनाव करके हम अपने जीवन के अन्तिम दिन में कुछ सकारात्मक और सार्थक करने का अपना अवसर गंवा देंगे। उदाहरण के लिए, एक उच्च अधिकारी था जो किसी व्यक्ति से नाराज़ हो गया था और इसलिए उसने उस व्यक्ति को अगले दिन कड़ी सज़ा देने का निश्चय किया। वह पूरे दिन इसके लिए अपनी योजना बनाता रहा और अगली सुबह, इससे पहले कि वह कुछ कर पाता, अचानक स्वयं उसी की मृत्यु हो गई। उसकी नाराज़गी एकदम बेतुकी थी। यदि वह उस दूसरे व्यक्ति को अगले दिन मौत की सज़ा दी जानी होती तब भी यही बात लागू होती है। उसे आज दुख पहुँचाने की कोई तुक नहीं है।

दूसरों के दृष्टिकोणों पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि

इसे भी तीन बिन्दुओं में बांटा जाता है।

  • हमें विचार करना चाहिए, जहाँ तक मेरी अपनी बात है, मैं दुख नहीं भोगना चाहता हूँ, स्वप्न में भी नहीं, और मुझे कितना भी सुख मिल जाए, मैं कभी उससे संतुष्ट नहीं होता हूँ। यही बात दूसरे सभी लोगों के मामले में भी पूरी तरह से लागू होती है। छोटे से छोटे कीड़े से लेकर सभी सचेतन जीव सुख चाहते हैं और कभी दुख भोगना या समस्याओं का सामना नहीं करना चाहते हैं। इसलिए कुछ को इच्छित मानकर स्वीकार करना और दूसरों को अस्वीकार करना अनुचित है।
  • मान लीजिए कि दस भिखारी मेरे द्वारा पर मांगने के लिए आते हैं। यह पूरी तरह अनुचित है कि केवल कुछ को भोजन दिया जाए और बाकियों को न दिया जाए। अपनी भूख और भोजन की आवश्यकता की दृष्टि से वे सभी समान हैं। इसी प्रकार, जहाँ तक भ्रम से मुक्त सुख की दृष्टि से – खैर, वह होता किसके पास है? लेकिन भ्रमयुक्त सुख की दृष्टि से भी – समस्त सचेतन जीवों को उसका अभाव रहता है। इसकी खोज करने में सबकी गहरी रुचि होती है। इसलिए कुछ को स्वयं से दूर मानते हुए उन्हें अस्वीकार करना और बाकियों को घनिष्ट और निकट समझते हुए उनका सत्कार करना अनुचित है।
  • एक अन्य उदाहरण के रूप में मान लीजिए कि दस लोग हैं जो रोगी हैं। अपने अत्यंत दुख और दयनीय दशा की दृष्टि से वे सभी बराबर हैं। इसलिए केवल कुछ का पक्ष लेते हुए उनका उपचार करना और दूसरों को भुला देना अन्यायपूर्ण और अनुचित है। इसी प्रकार सभी सचेतन जीव अपनी-अपनी कठिनाइयों और अनियंत्रित ढंग से बार-बार होने वाले जन्म-मरण या संसार की सामान्य समस्याओं की दृष्टि से समान रूप से दुखी हैं। यही कारण है कि कुछ को स्वयं से दूर मानते हुए उन्हें अस्वीकार करना और दूसरों को घनिष्ठ या निकट समझकर उनका सत्कार करना अन्यायपूर्ण और अनुचित है।

गूढ़तम दृष्टिकोण पर निर्भर करने वाली समवृत्ति को यथार्थ बनाने की विधि

इसमें भी विचार की तीन परिधियाँ होती हैं:

  1. हम विचार करते हैं कि किस प्रकार हम किसी ऐसे व्यक्ति को जो हमारी सहायता करता है या हमारे साथ अच्छा व्यवहार करता है, को सच्चे मित्र के रूप में और हमें नुकसान पहुँचाने वाले को असली शत्रु के रूप में वर्गीकृत कर लेते हैं। लेकिन यदि वे हमारे द्वारा किए गए वर्गीकरण के अनुसार यथार्थ अस्तित्वमान रहे होते तो तथागत बुद्ध ने भी उन्हें उसी दृष्टि से देखा होता। लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। जैसाकि धर्मकीर्ति ने प्रमाणवार्तिक में कहा है, “बुद्ध अपने शरीर के एक ओर सुवासित जल का लेप करने वाले व्यक्ति को और दूसरी ओर उनके शरीर को तलवार से चीरने वाले व्यक्ति को एक ही दृष्टि से देखते हैं।“

    निष्पक्षता का एक और उदाहरण हम इस बात से देख सकते हैं कि बुद्ध ने अपने चचेरे भाई देवदत्त, जो ईर्ष्यावश हमेशा बुद्ध को क्षति पहुँचाने का प्रयास करता था, के साथ कैसा व्यवहार किया। इसलिए हमें भी भ्रमवश यह सोचकर कि लोगों का अस्तित्व वास्तव में उन्हीं श्रेणियों के अनुसार है जिनमें हम उन्हें वर्गीकृत करते हैं, पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए लोगों का पक्ष लेने से बचना चाहिए। किसी भी जीव का अस्तित्व इस प्रकार से नहीं होता है। चीज़ों के यथार्थ अस्तित्व को समझने के लिए हमें अपने मिथ्या बोध को जकड़ने की प्रवृत्ति को रोकना होगा। हम अपने चित्त के मिथ्याबोध के कारण मिथ्या बोध से चिपके रहना चाहते हैं जिसके कारण हमें चीज़ें उन रूपों में दिखाई देती हैं जो सत्य नहीं या यथार्थ नहीं होते हैं।
  2. इसके अलावा, यदि सचेतन जीव मित्र और शत्रु की श्रेणियों में यथार्थ रूप में अस्तित्वमान होते, जैसाकि हम उनके अस्तित्व के बारे में मानते रहते हैं, तो वे हमेशा के लिए वैसे ही बने रहते। उदाहरण के लिए, किसी घड़ी के बारे में विचार करें जिसके बारे में हम मानते हैं कि वह हमेशा सही समय दिखाती है। जिस प्रकार यह सम्भव है कि कभी किसी समय उस घड़ी की स्थिति बदल सकती है और वह धीमी पड़ सकती है, इसी प्रकार दूसरों की दशा भी हमेशा अपरिवर्तित नहीं रहती है, वह भी बदल सकती है।

    यदि हम इस तथ्य सम्बंधी शिक्षाओं के बारे में विचार करें कि संसार की अनियंत्रित ढंग से बार-बार घटित होने वाली स्थितियों के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है, तो यहाँ ऐसा करना उपयोगी होता है, जैसा कि उस उदाहरण से स्पष्ट है जहाँ पुत्र अपने पिता को खाता है, माता को पीटता है, और अपने शत्रु को पालने में झुलाता है। ज्ञानोदय प्राप्ति के क्रमिक स्तरों के मार्ग (लाम-रिम) में मध्यम स्तर की प्रेरणा विकसित करने सम्बंधी निर्देशों में इस उदाहरण का उल्लेख आता है। उच्च सिद्धि को प्राप्त आर्य कात्यायन एक बार एक ऐसे घर पहुँचे जहाँ के पिता का पुनर्जन्म तालाब में एक मछली के रूप में हुआ था और उसका पुत्र उसे खा रहा था। उसके बाद पुत्र ने कुत्ते को, जो उसकी माँ रह चुका था, पिता रह चुकी मछली की हड्डियों से पीटा और फिर अपने बच्चे को, जो उसका शत्रु रह चुका था, उठा कर झूला झुलाया। कात्यायन संसार में भटक रहे जीवों की स्थितियों में होने वाले इन बदलावों की असंगति को देख कर हँस दिए। इसलिए, हमें लोगों के अस्तित्व को मित्र या शत्रु की श्रेणियों की निश्चित और अपरिवर्तनीय श्रेणियों में बांट कर देखने की अपनी धारणा से चिपके रहना, और उस आधार पर किसी एक का सत्कार करना और दूसरे को अस्वीकार करना बंद कर देना चाहिए।
  3. शांतिदेव ने शिक्षासमुच्चय में बताया है कि किस प्रकार आत्म और दूसरे जीव परस्पर निर्भर होते हैं। दूरस्थ और निकटस्थ पहाड़ों के उदाहरण की भांति वे परस्पर निर्भर होते हैं या उनके बीच की दूरी परस्पर सापेक्ष होती है। जब हम नज़दीक वाले पहाड़ पर होते हैं तो हमें दूसरा पहाड़ दूरस्थ दिखाई देता है और यह पहाड़ निकट दिखाई देता है। जब हम दूसरी ओर चले जाते हैं तो यह पहाड़ दूर वाला बन जाता है वह पहाड़ निकट हो जाता है। इसी प्रकार, हमारा अस्तित्व स्वयं हमारी ओर से ही “आत्म” के अस्तित्व के रूप में स्थापित नहीं है, क्योंकि जब हम स्वयं को किसी अन्य के दृष्टिकोण से देखते हैं तो हम स्वयं “अन्य” हो जाते हैं। इसी प्रकार मित्र या शत्रु होना किसी व्यक्ति को देखने के अलग-अलग नज़रिए मात्र हैं। कोई व्यक्ति एक ही समय में किसी एक व्यक्ति का मित्र होने के साथ-साथ किसी अन्य व्यक्ति का शत्रु भी हो सकता है। निकटस्थ और दूरस्थ पहाड़ों की ही भांति यह बात भी हमारे दृष्टिकोणों के सापेक्ष होती है।

5 निर्णय

ऊपर बताई गई बातों के अनुसार विचार करने के बाद हमें 5 निर्णय करने चाहिए।

मैं पक्षपाती नहीं बनूँगा

इसे हम चाहे सापेक्ष दृष्टिकोण से देखें या गूढ़तम दृष्टि से देखें, कुछ व्यक्तियों या जीवों को निकट या घनिष्ठ और दूसरों को दूर समझने का कोई कारण नहीं है। इसलिए हमें दृढ़ निश्चय करना चाहिए: मैं पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण नहीं रखूँगा। मैं स्वयं को पक्षपात करने की उस भावना से मुक्त करूँगा जिसके कारण मैं कुछ लोगों को अस्वीकार करता हूँ और दूसरों का सत्कार करता हूँ। चूँकि द्वेष और आसक्ति दोनों ही इस जीवनकाल में और भविष्य के जन्मों में, अस्थायी तौर पर और अन्ततः, अल्प अवधि में और दीर्घावधि में नुकसान पहुँचाने वाले हैं, इसलिए इनसे कोई लाभ नहीं है। ये दोनों ही सैकड़ों प्रकार के दुखों का मूल हैं। ये दोनों ऐसे प्रहरियों के समान हैं जो मुझे अनियंत्रित ढंग से बार-बार घटित होने वाली संसार की समस्याओं के कारागार के चक्र में चलाते रहते हैं।

उन लोगों के उदाहरण के बारे में सोचें जो 1959 के विद्रोह के बाद तिब्बत में ही रुके रह गए। जिन्हें अपने मठों, सम्पत्ति, जायदाद, मकानों, सम्बंधियों, मित्रों आदि से लगाव था, वे उन्हें पीछे छोड़कर नहीं जा सके। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें उनकी आसक्ति के कारण 20 वर्षों तक या उससे भी अधिक समय बंदीगृहों या यातना शिविरों में बंदी बनकर रहना पड़ा। इस प्रकार की पक्षपातपूर्ण भावनाएं वे घातक हत्यारे हैं जो हमें दुखों के नरक की ओर धकेलते हैं। ये हमारे भीतर छिपे हुए ऐसे शैतान हैं जो रात को चैन की नींद सोने नहीं देते। हमें इन्हें हर कीमत पर जड़ से खत्म कर देना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर सभी के प्रति समदृष्टि रखना, जिसके कारण हम सभी सचेतन जीवों के सुखी होने और समस्याओं और दुखों से मुक्त होने की कामना करते हैं, हमारे लिए अस्थायी और स्थायी दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यही वह मुख्य मार्ग है जिससे होकर सभी बुद्धजन और बोधिसत्व गुज़रे हैं और उन्होंने अपनी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। 3 बार के सभी बुद्धों की यही मंशा और गहनतम कामना रही है। इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि कोई भी सचेतन जीव अपनी ओर से मुझे कितना ही नुकसान क्यों न पहुँचाए या मेरी कितनी ही सहायता क्यों न करें, मेरी ओर से मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। मैं उसके प्रति क्रोधित या आसक्त नहीं होऊँगा। मैं कुछ जीवों को अपना घनिष्ठ और दूसरों को अपने से दूर नहीं समझूँगा। स्थितियों से निपटने का इसके अलावा कोई और तरीका या साधन नहीं हो सकता है। मैंने पक्का निश्चय कर लिया है। मैं दूसरों के बारे में विचार और कर्म करने की दृष्टि से समदृष्टि रखूँगा क्योंकि हर कोई चाहता है कि वह सुखी हो और उसे कभी दुख न उठाना पड़े। मैं ऐसा करने के लिए यथासंभव प्रयास करूँगा। हे आध्यात्मिक गुरु, मुझे प्रेरित करें कि मैं जितना अधिक हो सके ऐसा कर सकूँ। गुरु पूजा में इस साधना से जुड़े 5 छंदों में से पहले छंद का पाठ करते समय हमारे चित्त में यही भाव होने चाहिए:

हमें यह विचार करते हुए दूसरों के सुख और आनन्द को बढ़ाने के लिए प्रेरित कीजिए कि हम लोग एक-दूसरे से किसी प्रकार भिन्न नहीं हैं: कोई भी लेशमात्र भी दुख नहीं चाहता है, न ही कोई भी अपने आपको मिलने वाले सुख से कभी संतुष्ट होता है।

इस प्रकार हम इस पहले छंद से ही प्रार्थना करते हैं कि हम ऐसी समवृत्ति विकसित करें जिसमें दूसरे सभी लोगों को समान रूप से सुखी बनाने और उनके दुखों को दूर करने दृष्टि से विचार या कर्म के स्तर पर हमारे चित्त में किसी के अपने निकट या दूर होने का भाव न हो। इस प्रकार की समानता का दृष्टिकोण उस समवृत्ति या समभाव वाले दृष्टिकोण के अर्थ को परिभाषित करता है जिसे हम यहाँ अपने भीतर विकसित करना चाहते हैं। हम उस दृष्टिकोण को विकसित और हासिल करने के लिए उसी प्रकार से दृढ़ निश्चय करते हैं जैसे हम किसी दुकान में किसी अच्छी चीज़ को देखते हैं और उसे खरीदने का पक्का मन बना लेते हैं।

मैं स्वयं को महत्वपूर्ण समझने की अपनी प्रवृत्ति से मुक्त रखूँगा

इसके बाद हम स्वयं को महत्वपूर्ण समझने के दृष्टिकोण के दोषों के बारे में विचार करते हैं। स्वयं को महत्वपूर्ण समझने की स्वार्थ प्रेरित फिक्र के कारण हम विनाशकारी ढंग से व्यवहार करते हैं, 10 विनाशकारी कृत्यों को करते हैं और उसके परिणामस्वरूप अपने आप को नारकीय पुनर्जन्मों का भागी बना लेते हैं। वहाँ से लेकर किसी अर्हत (जो मुक्त हो चुका है) के ज्ञानोदय प्राप्त न कर पाने तक – यह स्वार्थपरायणता समस्त सुख और शांति को नष्ट कर देती है। हालाँकि बोधिसत्व ज्ञानोदय प्राप्ति के निकट होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ और अधिक निकट होते हैं। उनके बीच की दूरी का अन्तर उनमें अभी भी शेष बचे स्वयं को महत्वपूर्ण समझने के भाव पर निर्भर करता है। देशों के बीच विवादों से लेकर आध्यात्मिक आचार्यों और शिष्यों के बीच के मतभेदों तक, परिवारों, या मित्रों के बीच के मतभेदों तक – ये सभी स्वयं को महत्वपूर्ण समझने के दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न होते हैं। इसलिए हमें सोचना चाहिए कि यदि मैं स्वयं को कटुता उत्पन्न करने वाली स्वार्थपरायणता और स्वयं को महत्वपूर्ण समझने की इस प्रवृत्ति से मुक्त नहीं करूँगा तो फिर मैं कभी भी सुख का आनन्द नहीं भोग सकूँगा। इसलिए मैं कभी भी अपने आपको स्वयं की महत्वपूर्ण समझने की प्रवृत्ति के प्रभाव में नहीं आने दूँगा। हे आध्यात्मिक गुरु मुझे प्रेरणा दें कि मैं स्वयं को महत्वपूर्ण समझने की इस प्रवृत्ति से मुक्त हो सकूँ। दूसरे छंद में यही विचार व्यक्त किए गए हैं:

हमें प्रेरणा दें कि हम जान सकें कि स्वयं को महत्वपूर्ण समझने का यह दीर्घकालिक रोग ही हमारे अवांछित दुख का कारण है, और इसे दोषी मानते हुए हम स्वार्थपरायणता के इस विकट दानव का नाश कर सकें।

इस प्रकार दूसरे छंद में हम स्वयं को स्वार्थवश अपने आप को महत्वपूर्ण समझने की भावना से मुक्त करने का दृढ़ निश्चय करते हैं।

मैं दूसरों को महत्वपूर्ण मानने की आदत को अपनी प्रमुख साधना बनाऊँगा

इसके बाद हम दूसरों को महत्वपूर्ण मानने से उत्पन्न होने वाले लाभों और सद्गुणों के बारे में विचार करते हैं। इस जीवनकाल में, समस्त सुख और सब कुछ अच्छा होना; भविष्य के जन्मों में, हमें मनुष्यों के रूप में पुनर्जन्म मिले या देवों के रूप में; और सामान्यतया, ज्ञानोदय की प्राप्ति तक के सभी सुख दूसरों को महत्वपूर्ण समझने से प्राप्त होते हैं। हम अनेक उदाहरणों के माध्यम से इसके बारे में विचार कर सकते हैं। जैसे, किसी सर्वप्रिय अधिकारी की लोकप्रियता इस कारण से होती है कि वह दूसरों को महत्वपूर्ण समझता है और उनके प्रति फिक्रमंद रहता है। हमारा दूसरों की जान लेने या चोरी करने से बचने का नैतिक आत्मानुशासन दूसरों को महत्वपूर्ण समझने से ही उद्भूत होता है, और यही मनुष्यों के रूप में हमें पुनर्जन्म दिला सकता है।

उदाहरण के लिए, परम पावन दलाई लामा हमेशा हर जगह सभी के कल्याण के बारे में सोचते हैं, और उनके सभी सद्गुण दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के कारण से हैं। कामदेव जब बोधिसत्व टोग्मे-ज़ांग्पो की साधना में विघ्न डालने के लिए आए तो वे उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। तिब्बत के ये महान साधक एक ऐसे व्यक्ति थे जो किसी कीट-पतंगे के आग की लौ में झुलस जाने पर भी रो पड़ते थे। वे सच्चे मन से दूसरे सभी की फिक्र करते थे और इसीलिए प्रेत और दूसरे प्रकार के विघ्नकर्ता उनको कोई क्षति नहीं पहुँचा सके। ऐसा इसलिए हुआ, जैसाकि उन प्रेतों ने स्वयं भी कहा, उनके मन में उन प्रेतों की भी भलाई करने और उनको महत्वपूर्ण मानने का ही भाव था।

अपने पिछले एक जन्म में जब बुद्ध ने देवताओं के राजा इंद्र के रूप में जन्म लिया तब देवताओं और गंधर्वों के बीच एक युद्ध हुआ। युद्ध में जब गंधर्वों की जीत होने लगी तो इंद्र अपने रथ में सवार होकर भाग निकले। वे मार्ग में एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ मार्ग में बहुत से कबूतर जमा हुए थे, और इस चिंता के कारण कि वे उनमें से कुछ कबूतरों को कुचल देंगे, उन्होंने अपना रथ रोक दिया। इसे देखकर गंधर्वों ने समझा कि इंद्र ने अपना रथ वापस मोड़कर उन पर आक्रमण करने के लिए रोका है, और इसलिए वे भाग खड़े हुए। यदि हम इसका विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि इंद्र ने अपना रथ दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के अपने दृष्टिकोण के कारण से रोका था। इस प्रकार से हमें विभिन्न दृष्टियों से दूसरों को महत्वपूर्ण समझने की प्रवृत्ति से होने वाले फायदों के बारे में विचार करना चाहिए।

जब कोई मजिस्ट्रेट या दूसरा कोई अधिकारी जब ठाठपूर्वक अपने दफ्तर में बैठता है, तो उसका पद और उससे जुड़ी सभी बातें दूसरों के अस्तित्व के कारण होती हैं। इस उदाहरण में दूसरों की दयालुता इसी बात में निहित है कि वे हैं। यदि उस अधिकारी के अलावा और किसी का अस्तित्व ही न होता तो वह मजिस्ट्रेट न हो पाता। उसके पास करने के लिए कोई काम न होता। इसके अलावा, यदि लोग होते तब भी यदि कोई उसके पास जाता ही नहीं तो खाली बैठा रहता और कुछ न कर पाता। वहीं दूसरी ओर, यदि बहुत से लोग उसके पास जाते और उससे अपने मामलों को निपटाने के लिए कहते तो उन लोगों पर निर्भर रहते हुए वह अपने दफ्तर में बैठ कर उन लोगों की सेवा करता। किसी लामा के बारे में भी यही बात लागू होती है। दूसरों पर निर्भर रहते हुए वह दूसरों को शिक्षा देता है। उसका रुतबा पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि ऐसे दूसरे लोग मौजूद हैं जिनकी वह सहायता कर सकता है। वह लोगों की भलाई के लिए उन्हें धर्म की शिक्षा देता है और इस प्रकार वह दूसरों पर निर्भर रहते हुए, जैसे उनकी दयालुता को याद करते हुए, उनकी सहायता करता है।

इसी प्रकार, प्रेम और करुणा, दूसरों को महत्वपूर्ण मानते हुए हम कम समय में ही ज्ञानोदय को प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई शत्रु हमें क्षति पहुँचाता है और हम धैर्य का भाव विकसित कर लेते हैं, और इसके परिणामस्वरूप ज्ञानोदय प्राप्ति के निकट पहुँचते हैं, तो यह दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के हमारे दृष्टिकोण के कारण हो पाता है। इसलिए, चूँकि सचेतन जीव सभी प्रकार के सुख और कल्याण का आधार और मूल हैं, हमें यह निश्चय करना चाहिए कि वे कुछ भी करें या मुझे किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाएं, मैं हमेशा दूसरों को महत्वपूर्ण मानूँगा। दूसरे सभी जीव मेरे आध्यात्मिक गुरुओं, बुद्धजन, या मूल्यवान रत्नों के समान हैं और इसी रूप में मैं उन्हें महत्वपूर्ण मानूँगा, यदि उन्हें कोई नुकसान पहुँचे तो उसे अपनी क्षति समझूँगा और कुछ भी हो जाए, कभी उनका त्याग नहीं करूँगा। मैं हमेशा अपने हृदय में उनके प्रति उदारता और स्नेह का भाव रखूँगा। हे मेरे आध्यात्मिक गुरु, मुझे प्रेरित करें कि मैं अपने हृदय में दूसरों के प्रति ऐसे भावों से कभी क्षण भर के लिए भी दूर न होऊँ। तीसरे छंद का यही अर्थ है:

हमें प्रेरित करें कि हम जान सकें कि जो चित्त हमारी माताओं के प्रति प्रेमभाव रखता है और उन्हें परम सुख के साथ निरापद रखता है, वही अपरिमित पुण्य की प्राप्ति का सिंहद्वार है, और इसलिए हम इन भटकते जीवों को स्वयं अपने जीवन से भी अधिक महत्व दे सकें, फिर भले ही वे हमारे शत्रुओं के रूप में ही क्यों न मंडराते हों।

इस प्रकार हम दूसरों को महत्व देने की साधना को अपनी ध्यान साधना का केंद्र बिंदु बना लेने का निश्चय कर लेते हैं।

मैं स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोणों की अदला-बदली करने में निश्चित रूप से सक्षम हूँ

स्वयं को महत्वपूर्ण समझने की प्रवृत्ति के अनेकानेक दोषों और दूसरों को महत्वपूर्ण मानने के अनेक गुणों के बारे में विचार करते हुए जब हमें महसूस होता है कि हमें अपनी मान्यताओं को बदलना चाहिए कि हमें किसे महत्वपूर्ण समझना चाहिए, और तब हम सोचते हैं कि क्या हम सचमुच इन मान्यताओं को बदल सकते हैं, हम निश्चित तौर पर इन्हें बदल सकते हैं। हम अपने दृष्टिकोणों को इसलिए बदल सकते हैं क्योंकि ज्ञानोदय प्राप्त करने से पहले बुद्ध भी बिल्कुल हमारे जैसे ही थे। वे भी हमारी ही तरह संसार की अनियंत्रित ढंग से बार-बार घटित होने वाली स्थितियों और समस्याओं के बीच एक जन्म से दूसरे जन्मों के बीच भटक रहे थे। किन्तु गुणवान बुद्ध ने इस दृष्टि से अपने दृष्टिकोणों में बदलाव कर लिया कि उन्हें किसे महत्वपूर्ण समझना चाहिए। दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ रहते हुए वे उस शिखर पर पहुँचे जहाँ उन्होंने स्वयं अपने और दूसरों के लक्ष्यों को भी हासिल किया।

इसके विपरीत, हम केवल अपने आप को ही महत्वपूर्ण समझते रहे हैं और बाकी सभी को अनदेखा करते रहे हैं। दूसरों की भलाई के लिए कुछ हासिल करने की बात को छोड़ भी दिया जाए, तो हमने स्वयं अपनी भलाई के लिए भी कुछ भी हासिल नहीं किया है। स्वयं को महत्वपूर्ण समझने और दूसरों को अनदेखा करने की प्रवृत्ति ने हमें किसी भी तरह की वास्तविक महत्व की उपलब्धि हासिल करने की दृष्टि से पूरी तरह असहाय और अक्षम बना दिया है। हम अपनी समस्याओं से मुक्त होने के लिए वास्तविक वैराग्य या निश्चय विकसित कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। हम इस स्थिति में भी नहीं हैं कि अपने आप को निकृष्टतम प्रकार के पुनर्जन्म से बचा सकें। इस प्रकार हम अपने आप को महत्वपूर्ण समझने की प्रवृत्ति के दोषों और दूसरों को महत्वपूर्ण मानने से होने वाले लाभों के बारे में विचार करते हैं। यदि बुद्ध अपने दृष्टिकोण को बदल पाने में सफल हो सके, और उन्होंने भी हमारी ही तरह शुरुआत की थी, तो हम भी अपने दृष्टिकोण को बदल सकते हैं।

इतना ही नहीं, पर्याप्त अभ्यास कर लेने के बाद हमारे लिए यह भी सम्भव हो जाता है कि हम दूसरों की देह को भी उसी प्रकार महत्वपूर्ण समझ सकें जैसे हम अपने शरीर की देखभाल करते हैं। आखिर, हम दूसरों के शरीरों, यानी अपने माता-पिता के शरीरों से ली गई शुक्राणु और अंडाणु की बूंदों से ही तो बने हैं, और अब हम उसे ही अपने शरीर के रूप में महत्वपूर्ण मानते हैं। मूलतः तो वे बूंदें हमारी नहीं थीं। इसलिए हमें समझना चाहिए कि अपने दृष्टिकोण को बदलना असम्भव नहीं है। मैं स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोणों को आपस में बदल सकता हूँ। ऐसा मैं कर सकता हूँ, यह ऐसा कुछ नहीं है जिसे मैं न कर सकूँ। इसलिए, हे मेरे आध्यात्मिक गुरु, मुझे प्रेरित कीजिए कि मैं ऐसा कर सकूँ। चौथे छंद में इसी बात पर बल दिया गया है।

संक्षेप में, हमें प्रेरित कीजिए कि हम ऐसा चित्त विकसित कर सकें जो केवल अपने स्वार्थपूर्ण ध्येयों की प्राप्ति के लिए परिश्रमरत अपरिपक्व जीवों के दोषों और पूरी तरह दूसरों की भलाई में लगे हुए महान ऋषियों के गुणों के बीच के भेद को समझ सकें, और इस प्रकार स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोणों को एक समान कर सकें और उनकी अदला-बदली कर सकें।

अतः यहाँ हम यह निर्णय लेते हैं कि हम स्वयं अपने आप को और दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के बारे में अपने दृष्टिकोणों को निश्चित तौर पर अदल-बदल कर सकते हैं।

मैं स्वयं अपने बारे में और दूसरों के बारे में अपने दृष्टिकोणों की निश्चित तौर पर अदला-बदली करूँगा

यहाँ भी हम स्वयं को महत्वपूर्ण समझने के दोषों और दूसरों को महत्वपूर्ण मानने के लाभों के बारे में विचार करते हैं, लेकिन इस बार हम इन दोनों को मिलाकर बारी-बारी से इनके बारे में विचार करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम 10 विनाशकारी कृत्यों और 10 सकारात्मक कृत्यों की सूचियों में से बारी-बारी से एक-एक कृत्य को लेते हैं और स्वयं को महत्वपूर्ण समझने और दूसरों को महत्वपूर्ण मानने की दृष्टि से उनके परिणामों के बारे में विचार करते हैं। उदाहरण के लिए यदि मैं स्वयं को महत्वपूर्ण समझता हूँ तो मैं दूसरों के प्राण लेने से नहीं हिचकूँगा। इसका परिणाम यह होगा कि मेरा पुनर्जन्म किसी निरानन्द नरक में होगा, और यदि बाद में मेरा जन्म मनुष्य के रूप में भी हो गया तब भी मैं अल्पायु होऊँगा और मेरा जीवन रोगों से भरा होगा। वहीं दूसरी ओर, यदि मैं दूसरों को महत्वपूर्ण समझता हूँ तो मैं दूसरों के प्राण लेना बंद कर दूँगा और इसके परिणामस्वरूप मेरा पुनर्जन्म किसी बेहतर अवस्था में होगा, मेरा जीवन लम्बा होगा, आदि। उसके बाद हम चोरी करने और चोरी करने से बचने, अनुचित यौन व्यवहार करने और ऐसे व्यवहार से बचने आदि के साथ इसी प्रक्रिया को दोहराते हैं। संक्षेप में, पाँचवें छंद में कहा गया है:

चूँकि स्वयं को महत्वपूर्ण समझना ही सभी प्रकार के सन्तापों का द्वार है, जबकि अपनी माताओं को महत्वपूर्ण समझना हर अच्छाई का आधार है, इसलिए हमें प्रेरित करें कि हम अपने स्थान पर दूसरों को महत्वपूर्ण समझने के योग को अपना मूलभूत अभ्यास बना सकें।

इसलिए, पाँचवाँ निर्णय यह होता है कि मैं स्वयं अपने प्रति और दूसरों के प्रति अपने दृष्टिकोणों को निश्चित तौर पर आपस में बदलूँगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम यह निर्णय कर लें कि अब से मैं आप बन गया और आप मैं बन चुके हैं। बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम जिन्हें महत्वपूर्ण समझते हैं उसके बारे में अपने दृष्टिकोणों को आपस में बदल लें। स्वयं को महत्वपूर्म समझने और दूसरों को अनदेखा करने के बजाए अब हम अपनी स्वार्थपूर्ण चिंताओं को अनदेखा करते हुए बाकी सभी को महत्वपूर्ण समझेंगे। यदि हम ऐसा न कर पाएं तो फिर कुछ भी हासिल कर पाने का और कोई माध्यम नहीं है। लेकिन यदि हम अपने दृष्टिकोणों को इस प्रकार से अदल-बदल कर लेते हैं तो फिर उसके आधार पर हम अपने सुख को दूसरों को समर्पित करते हुए और उनके दुखों को अपने ऊपर लेते हुए निष्कपट और दूसरों की परवाह करने वाले प्रेम और करुणामयी समवेदना के भाव को विकसित करने के साधन के रूप में मानसिक चित्रण के अपने अभ्यास को जारी रख सकते हैं। इसके आधार पर हम हर किसी के दुखों और समस्याओं को दूर करने और उन्हें सुख देने, तथा समर्पित बोधिचित्त हृदय को विकसित करने के असाधारण संकल्प को विकसित कर सकेंगे जिसकी सहायता से हम अधिक से अधिक भलाई करने का सामर्थ्य प्राप्त करने की दृष्टि से ज्ञानोदय प्राप्ति हेतु परिश्रमरत हो सकेंगे।

वीडियो: त्सेनझाब सरकांग रिंपोशे द्वितीय — जीवन का अर्थ
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सारांश

शांतिदेव कृत बोधिचर्यावतार, कदम्प आचार्यों की शिक्षाएं और निःसंदेह प्रथम पांचेन लामा कृत आध्यात्मिक आचार्यजन के प्रति अर्पण अनुष्ठान इन शिक्षाओं का स्रोत हैं। इस रूप में ये शिक्षाएं संख्यांकित खंडों में परम पावन दलाई लामा के स्वर्गीय कनिष्ठ निजी शिक्षक क्याब्जे त्रिजांग दोर्जेचांग की संकलित कृतियों में प्रस्तुत की गई हैं। लेकिन, इनकी रूपरेखा और उनकी संख्या में बहुत अधिक रुचि दिखाने का वैसा ही होगा जैसे हमारे सामने एक प्लेट में 7 मोमो रखे हुए हों और उन्हें खाने के बजाए हम किसी से यह प्रमाण चाहते हों कि उनकी संख्या कितनी है, उनका स्रोत और आकार क्या है, आदि। छोड़िए, बैठिए और खाइए!

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