विचारों को परिशांत करना

किसी चीज़ के बारे में "सोचने" का मतलब उसके बारे में चिंतन करना होता है। लेकिन कोई अवधारणात्मक विचार केवल क्षणिक हो सकता है और उसका अर्थ होता है कि हम चीज़ों को अपने चित्त में वर्गीकृत करते हैं या अलग-अलग बक्सों में रखते हैं। दैनिक जीवन में अवधारणात्मक विचार अपरिहार्य है। उसके बिना हम स्टोर में उपलब्ध वस्तुओं को सेब और नाशपाती के रूप में अलग-अलग करके नहीं पहचान पाएंगे। यही भाषा का आधार है, जैसे कि हम कहते हैं, "कृपया मुझे शो के दो टिकट दें।" लेकिन कभी-कभी अवधारणात्मक विचार बाधक भी हो सकता है। उदाहरण के लिए ध्यान साधना में ध्यान लगाने के लिए हमें सभी प्रकार की मानसिक बकबक को बंद करने और संभावित अनुभवों के बारे में पूर्वधारणाओं को शांत करने की आवश्यकता होती है।

चित्त को स्थिर करना

ध्यान साधना की एक विधि यह है कि चित्त को स्थिर किया जाए ताकि चित्त की और अधिक सहज अवस्था में पहुँच सकें। यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु को समझना आवश्यक है: जब हम चित्त को स्थिर करने का प्रयास कर रहे होते हैं तो उद्देश्य यह नहीं होता है कि हम चित्त को भावशून्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जैसे कि कोई रेडियो बंद किए जाने के बाद भावशून्य हो जाता है। यह उद्देश्य कदापि नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह उद्देश्य तो निद्रा की अवस्था में जा कर भी हासिल किया जा सकता था। यहाँ तो उद्देश्य चित्त की सभी अशांत अवस्थाओं को शांत करने का है। अधीरता, चिंता और भय जैसे कुछ मनोभाव बहुत ही अशांत करने वाले हो सकते हैं। हमें परेशान करने वाले ऐसे सभी मनोभावों को शांत करना चाहिए।

अपने चित्त को स्थिर करके हमारा उद्देश्य एक ऐसी चित्तवृत्ति विकसित करना होता है जहाँ हमारा चित्त निर्मल और सचेत हो, एक ऐसी चित्तवृत्ति जिसमें हम प्रेम और उदारता का भाव विकसित कर सकें, या अपने अन्दर के उस मानवीय मित्रभाव को प्रकट कर सकें जो हमारे अन्दर सहज रूप से विद्यमान है। ऐसा करने के लिए व्यक्ति को पूर्णतः तनावमुक्त होना चाहिए ─ यह केवल शरीर के स्नायुओं की तनाव मुक्ति की बात नहीं है, यद्यपि वह भी आवश्यक है, बल्कि उस मानसिक और भावनात्मक तनाव तथा खिंचाव से मुक्ति का प्रश्न है जो हमें किसी भी प्रकार की संवेदना को ग्रहण करने से रोकता है ─ विशेषतः जो हमें सहज मित्रभाव और चित्त की निर्मलता का अनुभव करने से रोकता है। यह सिर्फ एक बटन बंद करके किसी भावशून्य रोबोट की भांति बन जाने की बात नहीं है।

कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि ध्यान साधना का अर्थ विचार करना बंद कर देना होता है। यह एक मिथ्या बोध है। सभी विचारों को रोकने के बजाए ध्यान साधना का उद्देशय ध्यान बाँटने वाले भविष्य संबंधी प्रश्नों (आज रात के भोजन में क्या खाऊँगा?), और नकारात्मक तथा अपरिपक्व चिन्तन (तुमने कल मेरे साथ बुरा व्यवहार किया। तुम बहुत बुरे व्यक्ति हो।) जैसे विषयेतर और अनावश्यक चिन्तन को रोकना होना चाहिए। ये सभी विचार मानसिक भटकन और परेशान करने वाले विचारों की श्रेणी में आते हैं।

किन्तु स्थिर चित्त तो एक साधन मात्र है; यह अन्तिम लक्ष्य नहीं है। किन्तु यदि हमारा चित्त अधिक स्थिर, शांत, निर्मल और उदार हो तो हम उसका उपयोग रचनात्मक ढंग से कर सकते हैं। ऐसा चित्त हमारे दैनिक जीवन में तो सहायक हो ही सकता है, साथ ही हम इसका उपयोग ध्यान की मुद्रा में बैठ कर अपने जीवन की परिस्थितियों को और बेहतर ढंग से समझने के लिए कर सकते हैं। व्यवधान उत्पन्न करने वाले मनोभावों और विषयेतर विचारों से मुक्त चित्त की सहायता से हम महत्वपूर्ण विषयों पर अधिक स्पष्टता से चिन्तन कर सकते हैं, यथा: मैंने अपने जीवन में क्या हासिल किया है? या: यह महत्वपूर्ण रिश्ता किस दिशा में जा रहा है? क्या यह रिश्ता हितकारी है? क्या यह नुकसानदेह है? इस प्रकार हम विश्लेषण कर सकते हैं। इसे आत्मविश्लेषण कहते हैं जिसकी सहायता से हम अपने अन्तर्मन में और अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं का गहराई से विश्लेषण कर सकते हैं। इस प्रकार के विषयों को समझने और सकारात्मक ढंग से आत्मविश्लेषण कर सकने के लिए हमारे विचारों में स्पष्टता होनी चाहिए। हमारा चित्त शांत और स्थिर होना चाहिए। ध्यान साधना वह साधन है जो हमें इस अवस्था तक पहुँचाने की क्षमता रखता है।

डा. ऐलन वॉलेस – व्यस्त लोगों के लिए ध्यान साधना
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वैचारिक और निर्वैचारिक मनोदशाएं

ध्यान साधना सम्बंधी बहुत से ग्रंथों में हमें यह निर्देश दिया जाता है कि हम वैचारिक चिन्तन से मुक्त होकर निर्वैचारिक अवस्था में स्थापित हों। पहली बात तो यह है कि यह निर्देश सभी प्रकार की ध्यान साधनाओं पर लागू नहीं होता है। इसका उल्लेख यथार्थ पर ध्यान केन्द्रित करने की एक उन्नत स्तर की ध्यान साधना के संदर्भ में विशेष तौर पर किया जाता है। तथापि, वैचारिकता का एक ऐसा स्वरूप है जिससे हर प्रकार की ध्यान साधना को मुक्त रखा जाना चाहिए। किन्तु ध्यान संबंधी ग्रंथों में वर्णित वैचारिकता के विभिन्न भेदों को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि “वैचारिक” से हमारा क्या आशय है।

कुछ लोग मानते हैं कि वैचारिक होने से हमारा अभिप्राय हमारे मन में विचरने वाले रोज़मर्रा के वाचिक विचारों ─ हमारे मस्तिष्क के भीतर के तथाकथित “स्वरों” से है ─ और निर्विचार होने के लिए केवल इन स्वरों को शांत करने की आवश्यकता होती है। लेकिन अपने मस्तिष्क के भीतर के स्वरों को शांत करना तो केवल एक शुरुआत है। हम अपने चित्त को निर्मल और शांत बनाने की दृष्टि से अपने चित्त को व्यवधान उत्पन्न करने वाले विषयेतर विचारों से मुक्त करके स्थिर करने के संदर्भ में पहले ही चर्चा कर चुके हैं। कुछ अन्य जानकार मानते हैं कि किसी विषय को यथार्थ रूप में समझने के लिए हमें निर्विचार होना चाहिए, और वैचारिक चिन्तन तथा सही बोध एक साथ सम्भव नहीं हैं। यह बात भी सही नहीं है।

वैचारिकता से सम्बंधित जटिलताओं को सुलझाने के लिए पहले हमें अपने विचारों में किसी बात को शब्दों में व्यक्त करने की क्रिया को उस बात को समझने की क्रिया से अलग करके देखना होगा। हम किसी विषय को समझ कर या उसे समझे बिना भी उसकी शाब्दिक अभिव्यक्ति कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम किसी विदेशी भाषा की प्रार्थना को समझकर या उसके अर्थ को समझे बिना भी उसका उच्चार कर सकते हैं। इसी प्रकार हम अपने मन में प्रेम की अनुभूति जैसे किसी विषय की शाब्दिक व्याख्या करके या शाब्दिक व्याख्या किए बिना भी उस विषय को समझ सकते हैं।

किन्तु ध्यान साधना में वैचारिक बनाम निर्विचार बोध का मुद्दा किसी विषय को समझने या न समझने का मुद्दा नहीं है। ध्यान साधना तथा रोज़मर्रा के जीवन में भले ही हम मानसिक रूप में उसे शब्दों में अभिव्यक्त करें या न करें, हमें सदैव वैचारिक या निर्वैचारिक बोध को बनाए रखना चाहिए। कभी-कभी शाब्दिक अभिव्यक्ति उपयोगी साबित होती है; कभी वह बिल्कुल भी उपयोगी नहीं होती या पूरी तरह अनावश्यक होती है। उदाहरण के लिए, अपने जूतों के फीते बाँधते समय हम जानते हैं कि फीते किस तरह बाँधने हैं। जब आप फीते को बाँध रहे होते हैं तो क्या आपको इस प्रक्रिया की शाब्दिक अभिव्यक्ति करने की आवश्यकता होती है कि आप क्या-क्या करें? नहीं। बल्कि, मुझे तो लगता है कि हममें से अधिकांश लोगों को जूतों के फीते बाँधने की प्रक्रिया का शब्दों में वर्णन करते समय बहुत कठिनाई होगी। फिर भी हमें उस प्रक्रिया का बोध तो होता है। बोध के बिना आप जीवन में कुछ भी नहीं कर सकते हैं। आप एक दरवाज़ा तक नहीं खोल सकते हैं।

कई परिप्रेक्ष्यों में शाब्दिक अभिव्यक्ति दरअसल उपयोगी होती है; अन्य लोगों तक अपने विचार पहुँचाने के लिए हमें शाब्दिक अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है। किन्तु हमारे चिन्तन की प्रक्रिया में शाब्दिक अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक नहीं है; शाब्दिक अभिव्यक्ति अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं है। कुछ ऐसी उपयोगी ध्यान साधनाएं हैं जिनमें शाब्दिक अभिव्यक्ति का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए मन में मंत्रों का उच्चार करना भी एक प्रकार की शाब्दिक अभिव्यक्ति है जो चित्त में एक निश्चित प्रकार की लय या स्पंदन उत्पन्न करती है। मंत्र की नियमित लय बहुत उपयोगी होती है; यह हमें एक निश्चित मनोदशा पर अपना ध्यान केन्द्रित रखने में सहायता करती है। उदाहरण के लिए, करुणा और प्रेम का संचार करने के लिए जब आप ऊँ मणिपद्मे हूं जैसे किसी मंत्र का उच्चार करते हैं तो उस प्रेममय अवस्था पर ध्यान को केन्द्रित रखना कहीं ज़्यादा सुविधाजनक होता है, हालांकि इसमें संदेह नहीं कि मन में कोई उच्चार किए बिना भी हम उस प्रेममय भाव पर अपना ध्यान केन्द्रित रख सकते हैं। इसलिए शाब्दिक अभिव्यक्ति अपने आप में कोई समस्या नहीं है। वहीं दूसरी ओर जब हमारा चित्त निरर्थक शब्दाडम्बर से भरा होता है तो निश्चित रूप से हमें अपने चित्त को शांत करने की आवश्यकता होती है।

तो फिर, जब वैचारिकता का मुद्दा शाब्दिक अभिव्यक्ति या बोध का मुद्दा नहीं है तो फिर असल मुद्दा क्या है? वैचारिक चित्त क्या है और ध्यान साधना के निर्देशों में जब वैचारिक चित्त से मुक्त होने की बात कही जाती है तो उसका क्या आशय है? क्या यह निर्देश ध्यान साधना के सभी चरणों और स्तरों के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन के व्यवहार पर भी लागू होता है? इन बिंदुओं को स्पष्ट करना आवश्यक है।

वैचारिक चित्त का अर्थ श्रेणियों के आधार पर विचार करना है। सामान्य शब्दों में इसका अर्थ होता है वस्तुओं को अलग-अलग “बक्सों” में रखकर उनके बारे में विचार करना है जैसे “अच्छा” या “बुरा”, “काला” या “सफेद”, “कुत्ता” या “बिल्ली”। 

खरीदारी करते समय हमें सेब और संतरे के बीच और कच्चे तथा पके हुए फलों के बीच फर्क करने की समझ होनी चाहिए। रोज़मर्रा के ऐसे मामलों में वस्तुओं को श्रेणियों में बाँटकर उनके बारे में विचार करना कोई समस्या नहीं है। लेकिन कुछ प्रकार की श्रेणियाँ समस्या का कारण होती हैं। “पूर्वधारणा” भी एक ऐसी ही श्रेणी है।

पूर्वधारणा का एक उदाहरण है: “मैं जानता हूँ कि तुम मेरे साथ हमेशा निकृष्टता का व्यवहार करोगे। तुम एक बुरे व्यक्ति हो क्योंकि विगत में तुमने अमुक-अमुक व्यवहार किया था, और इसलिए मेरी यह भविष्यवाणी है कि तुम बुरे व्यक्ति ही बने रहोगे।” हम पहले से ही धारणा बना चुके हैं कि यह व्यक्ति बुरा है और हमारे प्रति बुरा व्यवहार ही करेगा ─ इसी को पूर्वधारणा कहते हैं। अपने विचारों में हम उस व्यक्ति को “बुरा व्यक्ति” की श्रेणी या बक्से में रख देते हैं। और इसमें संदेह नहीं कि जब हम इस ढंग से सोचते हैं और जब हम किसी के मन में यह विचार बैठा देते हैं कि: “वह व्यक्ति निकृष्ट है; वह सदा मेरे साथ बुरा व्यवहार करता है”, तब हमारे और उस व्यक्ति के बीच एक अवरोध उत्पन्न हो जाता है। हमारी पूर्वधारणा उस व्यक्ति के साथ हमारे सम्बंध को प्रभावित करती है। इस प्रकार पूर्वधारणा एक ऐसी मनःस्थिति है जिसमें हम वस्तुओं का श्रेणीकरण करते हैं; उन्हें वैचारिक बक्सों में रखते हैं।

निर्वैचारिकता के अनेकानेक स्तर होते हैं, और एक स्तर यह है कि जब भी कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो हम उसके प्रति उदार दृष्टिकोण रखें। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार के वैचारिक बोध को खत्म कर दिया जाए। उदाहरण के लिए यदि किसी कुत्ते ने बहुत से लोगों को काट लिया हो तो चूँकि हम उस कुत्ते के बारे में “काटने वाले कुत्ते” की श्रेणी के रूप में विचार करते हैं, इसलिए हम उस कुत्ते के प्रति सावधान रहते हैं। उसके नज़दीक होने पर हम कुछ हद तक सावधानी बरतते हैं, लेकिन हम इस पूर्वधारणा को नहीं मानते कि: “वह कुत्ता मुझे निश्चित तौर पर काटेगा, इसलिए मैं उसके पास फटकने का प्रयास भी नहीं करूँगा।” यहाँ एक उभरती हुई परिस्थिति को स्वीकार करने के साथ-साथ उन पूर्वधारणाओं से मुक्त रहने की कोशिश के बीच एक नाज़ुक संतुलन है जो हमें किसी स्थिति को समग्रता में समझने से रोकती हैं।

अभिप्राय यह है कि सभी प्रकार की ध्यान साधनाओं में निर्वैचारिकता का स्तर ऐसा होना चाहिए जिसमें चित्त पूर्वधारणाओं से मुक्त हो। 

एक सबसे सामान्य निर्देश यह है कि ध्यान साधना करते समय हम हर प्रकार की अपेक्षाओं और चिंताओं से मुक्त हों। किसी ध्यान साधना सत्र के विषय में पूर्वधारणा इस अपेक्षा के रूप में हो सकती है कि हमारा अभ्यास सत्र बहुत अच्छा रहेगा, या इस चिंता के रूप में हो सकती है कि हमारे पैरों में दर्द होगा, या इस विचार के रूप में हो सकती है: “मैं सफल नहीं हो सकूँगा।” मानसिक रूप से हम इन विचारों की शब्दों में अभिव्यक्ति करें या न करें, अपेक्षा और चिंता के ये विचार हमारी पूर्वधारणाएं हैं। ऐसे विचार हमारे शीघ्र घटित होने वाले ध्यान साधना के सत्र को “एक शानदार अनुभव” या “एक तकलीफ़देह अनुभव” के मानसिक बक्से या श्रेणी में डाल देते हैं। ध्यान साधना के प्रति निर्वैचारिक दृष्टिकोण यह होगा कि जो भी घटित हो, उसे हम परिस्थिति का मूल्यांकन किए बिना स्वीकार करें और ध्यान साधना के निर्देशों के अनुसार स्थिति से निपटने का यत्न करें।

सारांश

अवधारणात्मक विचार के विभिन्न प्रकारों को समझे बिना हमारी यह गलत धारणा बन सकती है कि समस्त विचार ध्यान साधना के लिए हानिकारक है या दैनिक जीवन के लिए भी हानिकारक है। अधिकांश ध्यान साधनाओं में हमें अपने भीतर चल शोर कर रही आवाज़ों को शांत करने और सभी पूर्वधारणाओं को समाप्त करने की आवश्यकता होती है। किन्तु अत्यधिक कुशल साधकों को छोड़कर, अन्य सभी के मामले में किसी चीज़ को ध्यान साधना के भीतर और उससे बाहर समझने के लिए उसे किसी मानसिक श्रेणी में रखने की आवश्यकता होती है, फिर भले ही हम उसे शब्दों में व्यक्त करें या न करें।