शिक्षा हेतु विनती के लिए मंडल अर्पण

किसी शिक्षा को ग्रहण करने से पहले, उसके लिए मंडल अर्पण द्वारा विनती करना आवश्यक है | जब हम ऐसा करते हैं, तब इस अर्पण के साथ हम जो छंद उच्चरित करते हैं उसका महत्त्व समझना महत्त्वपूर्ण है |

बुद्ध-क्षेत्रों की ओर केंद्रित, सुगन्धित जल से अभिषिक्त, फूलों से लदा, और मेरु पर्वत, चतुर्द्वीपों, सूर्य, चन्द्रमा से सजा यह पत्तर भेंट करके, वे सभी जो भटक रहे हैं पवित्र क्षेत्रों की ओर अग्रसर हों | इदम गुरु रत्न मंडल- काम नीर-यतयामी | अमूल्य गुरुओं मैं आपको यह मंडल भेंट करता हूँ |

यह छंद, जिसमें हम बुद्ध-क्षेत्र, पवित्र भूमि के विषय में सोच रहे हैं, और प्रार्थना कर रहे हैं कि सभी इसमें भाग ले सकें, यह समझने में कुछ कठिन है, नहीं क्या? पहले, हमें समझना होगा कि बुद्ध-क्षेत्र या पवित्र भूमि क्या है | यह वह स्थान है जो प्रतिदिन चौबीसों घंटे धर्म की साधना करने और उसके विषय में पढ़ने के लिए अनुकूल है | आपको कोई नौकरी नहीं करनी पड़ती; आपको भोजन की आवश्यकता नहीं होती; आपको सोने की आवश्यकता नहीं होती; आपको घर का किराया नहीं देना पड़ता; आपको शौच के लिए नहीं जाना पड़ता - आपको अध्ययन और साधना के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना पड़ता | यह वह स्थान नहीं है जहाँ आप पूरे दिन स्विमिंग पूल के पास पड़े-पड़े ताश खेलते रहें |

बुद्ध-क्षेत्र आर्य बोधिसत्त्वों से परिपूर्ण हैं, वे बोधिसत्त्व जिन्हें शून्यता का निर्वैचारिक बोध प्राप्त हो चुका है, और उन्हें बुद्धजनों के सम्भोगकाय रूपाकार शिक्षा प्रदान करते हैं, बुद्धजनों के वे भौतिक रूप जिन्हें वे महायान शिक्षाओं का पूर्ण प्रयोग करते हुए उद्घाटित करते हैं | पवित्र भूमि बुद्ध-क्षेत्रों में ऐसा होता है | परन्तु गहनतम स्तर पर, एक पवित्र भूमि बुद्ध-क्षेत्र से अभिप्राय है चित्त का निर्मल-स्फूर्तिमय स्तर, जो चित्त का सूक्ष्तम स्तर होता है, जिसे आर्य बोधिसत्त्व ने यथार्थ रूप दे दिया हो | और सच में, वह कितना अद्भुत होता यदि हमें और अधिक ज्ञान प्राप्त करने तथा साधना करने के अतिरिक्त और कुछ न करना पड़ता, और इसके लिए हमारे पास वह अनुकूल चित्तावस्था तथा परिस्थितियाँ होतीं |

इसलिए जब हम मंडल अर्पण करते हैं तब हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि हम ऐसी स्थिति में हैं, और हमारे चित्त अत्यंत अनुकूल दशा में हैं, तथा सभी अध्ययन कर पाने के लिए इस प्रकार की स्थिति में सहभागी बन पाएँ | हम ऐसे सन्दर्भ में शिक्षा की याचना करते हैं, यह कल्पना करते हुए कि सबकुछ दोष-रहित है, सबकुछ अनुकूल है | वास्तव में, इस छंद के द्वारा हम कह रहे हैं, "मैं शिक्षा ग्रहण करने के लिए पूर्णतः तैयार हूँ, और अन्य सभी भी ऐसे हों |" विनती के लिए मंडल अर्पण का यही सार है |

यदि बहुत गर्मी हो या हम भूखे इत्यादि हों, तो हम उसे भुलाने के लिए उससे अपना ध्यान हटाते हैं, ताकि हम ध्यान से सुन पाएँ और ऐसी बातों से विचलित न हों | मंडल अर्पण छंद में हम मेरु पर्वत, चतुर्द्वीप इत्यादि भेंट करते हैं, जो तीव्र ठण्ड या गर्मी की भाँति हमारे वर्तमान सामान्य जीवन और सामान्य स्थिति का प्रतीक हैं | इस अर्पण द्वारा हम शिक्षा ग्रहण करने के लिए न केवल इस संसार में सबकुछ भेंट करने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं, बल्कि गहनतम स्तर पर, हम बुद्धजनों को सम्पूर्ण साधारण संसार भेंट करके उसे पवित्र भूमि में रूपांतरित करने की विनती कर रहे हैं | इसलिए, वास्तव में, मंडल अर्पण एक प्रकार की मनोदृष्टि शुद्धिकरण साधना है - नकारात्मक परिस्थितियों को सकारात्मक परिस्थितियों में रूपांतरित करना | हमारे धर्म केंद्र अथवा शिक्षण कक्ष अथवा सामान्य तौर पर हमारे जीवन में जो भी कठिन परिस्थिति हो, उसे हम अपने चित्त में रूपांतरित करते हैं | हम कल्पना करते हैं कि अब हम बुद्ध-क्षेत्र में हैं, एक पवित्र भूमि, और हम शिक्षाएँ ग्रहण करने वाले हैं | इसलिए, इस सन्दर्भ में, पवित्र भूमि बुद्ध-क्षेत्र, वास्तव में एक मनोदशा है | हम उसके विषय में यह नहीं सोचते कि वह किसी अन्य सुदूर तारक-पुंज में कोई अन्य स्वर्गलोक है |

इसलिए शिक्षा हेतु विनती के लिए मंडल अर्पण एक अत्यंत गहन साधना है, जिसे महत्त्वहीन नहीं बनाना चाहिए | यद्यपि यह अर्पण औपचारिक मंडल पत्तर, छल्लों इत्यादि से बनाया जा सकता है जैसा छंद में बताया गया है, हम इसे उपयुक्त हस्त मुद्रा से बना सकते हैं, या इसे मेरु पर्वत और चतुर्द्वीप संसार की प्रस्तुति के बिना भी बनाया जा सकता है |

परन्तु हम जिस भी प्रकार अर्पण करें, इससे पहले कुछ क्षणों के लिए अपने चित्त को हर विचार से मुक्त करना और पवित्र भूमि बुद्ध-क्षेत्र में विद्यमान होने की कल्पना करना आवश्यक है | फिर उस चित्तावस्था में, मंडल अर्पण कीजिए | और याद रखिए कि बुद्ध-क्षेत्र में अथवा निर्मल स्फूर्तिमय चित्तावस्था में केवल हम ही होने की कामना नहीं कर रहे हैं, या केवल हमें ही वैयक्तिक शिक्षाएँ नहीं मिल रहीं हैं क्योंकि हम इतने महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट हैं, अपितु इस उत्कट इच्छा के साथ अर्पण कीजिए कि सभी वहाँ उपस्थित हों और यह शिक्षा ग्रहण करें | 

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