निःसरण: परिभाषा और निहितार्थ
निःसरण केवल कुछ प्रकार के दुःख ही नहीं, बल्कि उनके कारणों से भी मुक्त होने का संकल्प है। इसके लिए आवश्यक है उस दुःख और उसके कारणों से मुक्त होने की स्वेच्छा। अतः, इसके लिए अपार साहस होना चाहिए। इसका लक्ष्य केवल बिना भुगतान किए कुछ अच्छा पा लेना नहीं है।
निःसरण में यह तथ्य भी अन्तर्निहित है कि उस दुःख और उसके कारणों से मुक्त हो पाना संभव है। यह केवल मनोकामना नहीं है। यह इस तथ्य में विश्वास है कि तीनों रूप से खरा होना चाहिए।
- सुबुद्धि से इसमें विश्वास करने से मस्तिष्क किसी आलम्बन सम्बन्धी क्लेशों (अशांतकारी मनोभावों) और उपादानों से मुक्त हो जाता है। अतः, उचित निःसरण से चित्त हिचकिचाहट, आत्मदया, और कोई इच्छित वस्तु त्यागने से उत्पन्न आक्रोश जैसे भावों से मुक्त हो जाता है।
- तर्क के आधार पर किसी तथ्य को सत्य मान लेना। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि दुःख और उसके कारणों से मुक्ति किस प्रकार संभव है।
- किसी तथ्य पर उसकी लालसा सहित विश्वास करना। जैसा बोधिचित्त के दो चरणों में देखा जाता है (कामनाग्रस्त और लिप्त चरण), इस मत पर विश्वास करते हुए कि हम ऐसा कर सकते हैं, आवश्यक नहीं है कि हम दुःख और उसके कारणों को त्यागने की इच्छा रखें या ऐसा करने के लिए तत्पर हों। जितना वर्तमान में संभव है, हमें उस हद तक उन दोनों को त्याग देना चाहिए, और उन कार्यों में जुट जाना चाहिए जो उनसे हमें स्थायी रूप से मुक्ति दिलाने में हमारी सहायता करेंगे।
इसके अतिरिक्त, उचित त्याग और अल्पकालिक उन्मादी त्याग एक बात नहीं हैं: वह उत्साही और धर्मांध सर्वत्याग, इस अन्धविश्वास पर आधारित कि कोई बाह्य स्रोत हमें बचा लेगा। इसके लिए आवश्यक कठिन परिश्रम में एक यथार्थवादी रवैया अन्तर्निहित है। हम दूसरों से प्रेरित हो सकते हैं, परन्तु कठिन परिश्रम तो हमें स्वयं ही करना पड़ेगा।
इसके आलावा, प्रगति कैसे होती है इसके प्रति हमारा रवैया यथार्थवादी होना चाहिए। संसार से मुक्ति का मार्ग कभी भी सीधा नहीं हो सकता, जिसमें प्रतिदिन उन्नति ही होती जाए। जब तक हम सदा के लिए मुक्त नहीं हो जाते, संसार में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। एक लम्बी अवधि के दृष्टिकोण से देखने पर हमें प्रगति दिखाई देगी, परन्तु प्रतिदिन हमारी मनःस्थिति में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे।
अतः, बौद्ध-धर्मी मार्ग का अनुसरण करने में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए हमें अनुशासन और धैर्य की आवश्यकता होती है, और उतार-चढ़ाव के बावजूद पथ पर डटे रहने के लिए कवच समान उत्साही अटल भाव की भी। यदि हमारे भीतर मुक्ति के दृढ़ संकल्प को अविचल आस्था का आधार प्राप्त होगा, तो हम कुंठित या निराश नहीं होंगे।