चित्त साधना के माध्यम से आत्म-रूपांतरण

जब हम कठिन स्थितियों का सामना करते हैं और हमारे जीवन में कोई बात बनती नज़र नहीं आती, तो यदि हम उनके प्रति अपनी मनोदृष्टि बदलने में समर्थ हो सकें तो हम इन अनुभवों को इस प्रकार रूपांतरित कर सकेंगे जिससे हमारी आध्यात्मिक प्रगति में वृद्धि होगी। तिब्बती परम्परा में “लोजोंग” चित्त साधना में ऐसी हितकारी मनोदृष्टियों का उल्लेख है जिनको विकसित करने का अभ्यास करके हम जीवन की चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकते हैं।

“चित्त साधना” का अभिप्राय ऐसी पद्धतियाँ हैं जिनसे हम किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को देखने की शैली बदल सकते हैं। यद्यपि, हमें “चित्त साधना” शब्दावली के विषय में सचेत रहना होगा क्योंकि इससे ऐसी ध्वनि निकलती है मानो इसमें एकाग्रता एवं स्मृति का अभ्यास भी सम्मिलित है। वास्तव में यहाँ उनकी चर्चा नहीं हो रही। तिब्बती भाषा में चित्त साधना के लिए  स्ब-ब्लोयोंग पदावली का प्रयोग होता है। ब्लो शब्द का अर्थ केवल “चित्त” नहीं है। इस शब्द में “मनोदृष्टि” का ध्वन्यर्थ अधिक है। तिब्बती भाषा में “साधना, स्ब-ब्लोयोंग ” शब्द के दो अर्थ हैं :“शुद्ध करना”, तो आप नकारात्मक मनोदृष्टि का प्रक्षालन करते हैं और “प्रशिक्षण देना” जिसका अर्थ है अधिक सकारात्मक रूप से अभ्यास करवाना। इसलिए संभवत: चित्त साधना को “मनोदृष्टि साधना” के रूप में समझना इस अवधारणा को अधिक स्पष्ट करता है। 

सर्वाधिक नकारात्मक मनोदृष्टि है आत्म-पोषण जिसका प्रक्षालन करना होता है जिसमें आत्म-केन्द्रित और स्वार्थी मनोदृष्टि सम्मिलित होती है जिसमें हम केवल अपने विषय में सोचते हैं। हमें अभ्यास करना होता है सकारात्मक मनोदृष्टि विकसित करने का जिसमें हम दूसरों को ह्रदय में पोषित करते हैं, मुख्यत: दूसरों के प्रति प्रेम तथा करुणा सहित उनके कल्याण के विषय में सोचते हैं। चित्त साधना तकनीकों में अपनायी गयी पद्धति, जिसे “चार आर्यसत्य” कहते हैं बुद्ध के सामान्य दृष्टिकोण से मेल खाती हैं।

चार आर्यसत्य

बुद्ध ने अत्यंत व्यावहारिक स्तर पर हमें अपने जीवन की समस्याओं पर विजय पाने का उपदेश दिया था। वस्तुत: उन्होंने जो भी उपदेश दिए वे इसी उद्देश्य पर केन्द्रित थे। हम सबके जीवन में विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रकार की समस्याएँ होती हैं। कुछ अत्यंत घनघोर होती हैं और बहुत व्यथित करती हैं, वे अत्यंत पीड़ादायक होती हैं, शारीरिक अथवा मानसिक अथवा दोनों। अन्य किंचित सूक्ष्म होती है किन्तु अत्यंत पीड़ादायक होती है, उदाहरण के लिए हम जीवन में बहुत सी चीज़ों का आनंद उठाते हैं परन्तु हम हताश रहते हैं क्योंकि वे हमें पूर्ण संतुष्टि नहीं दे पाती। वे चिरस्थायी नहीं होती, वे बदल जाती हैं, हमारे जीवन में स्थितियां स्थिर नहीं होती; उनमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कभी-कभी सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहता है कभी ऐसा नहीं हो पाता; और स्थितियों की स्थिरता हमारी अनुभूति पर निर्भर है। कभी हम सुखी होते हैं, कभी दुखी हो जाते हैं; कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि हम अनुभवशून्य हो रहे हैं और हम नहीं समझ पाते कि अगले ही पल हमें कैसी अनुभूति होने वाली है और यह उन लोगों पर निर्भर नहीं करता हम जिनके साथ हैं अथवा हम जो कर रहे हैं – सहसा हमारी मनोदशा एकदम बदल जाती है।

हम सबके साथ भावात्मक समस्याएँ जुड़ी रहती हैं और वे जीवन में विभिन्न समस्याओं को जन्म देती हैं। सबसे अधिक हताश करने वाली बात यह है कि ऐसा बार-बार होता है। हम अपने लिए अधिक से अधिक समस्याएँ खड़ी करते जाते हैं। यद्यपि कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि इसका कारण अन्य लोग हैं परन्तु यदि हम ध्यान से देखें और अधिक ईमानदारी से सोचें तो हम पायेंगें कि हमारी बहुत सी समस्याओं की जड़ हम स्वयं हैं, विशेषतया जीवन की घटनाओं के प्रति हमारी आत्म-केन्द्रित मनोदृष्टि।  

बुद्ध स्वयं इसके द्रष्टा थे। उन्होंने इसका स्वयं अपने जीवन में अनुभव किया तथा दूसरों के जीवन में भी देखा। उन्होंने पाया कि प्रत्येक व्यक्ति की यही दुर्दशा है। स्थूल स्तर पर हम सबके साथ जीवन की सामान्य घटनाओं में बड़ी कठिनाइयाँ हैं। जन्म लेना, बड़े होना, रोगग्रस्त होना, वृद्ध होना और मृत्यु को प्राप्त होना तथा हमारी भावनाओं में अनियंत्रित रूप से निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहना। उन्होंने कहा कि ये समस्याएँ कुछ कारणों से उत्पन्न होती हैं। ऐसा नहीं है कि उनका कोई स्त्रोत न हो। कोई बाहरी महाशक्ति हमारे लिए ये समस्याएँ उत्पन्न नहीं कर रही - चाहे हम उस बाहरी शक्ति को “ईश्वर” कहें अथवा उसे व्यक्ति निरपेक्ष बनाकर नियति या भाग्य कहें। वास्तव में वे हमारी समस्याओं का स्त्रोत नहीं हैं।

हमारी समस्याओं का वास्तविक स्त्रोत हमारे भीतर है और जब हम कहते हैं कि वह भीतर है तो इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम अन्तर्जात रूप से बुरे अथवा अपराधी हैं। बुद्ध यह नहीं कह रहे थे कि हमने पापी के रूप में जन्म लिया है; अपितु बुद्ध ने कहा कि हमारी समस्याओं का स्त्रोत यथार्थ के विषय में हमारा भ्रम है। ऐसा नहीं है कि हम मूढ़ हैं अपितु केवल इतना है कि अपने दैनिक जीवन के अनुभव में हमें चीज़ें असंभव रूप में अस्तित्वमान दिखाई देती हैं जो बात यथार्थ से मेल नहीं खाती। यह बात इस रूप में भी है कि हम स्वयं अपने को तथा दूसरों को किस रूप में देखते हैं जो निश्चित रूप से उनके प्रति हमारी मनोदृष्टि का निर्माण करता है। आत्मकेन्द्रित दृष्टिकोण एवं आत्म-पोषण के कारण हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं और सब कुछ हमारी पसंद के अनुसार होना चाहिए तथा दूसरों को कैसा लग रहा है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। कुछ ऐसी स्थिति रहती है कि जो दूसरों को अनुभव हो रहा है उसका कोई महत्व नहीं और उसका कोई अस्तित्व भी नहीं। मेरे विचार में इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि हमारा अनुभव हमारे प्रक्षेपण तथा अवास्तविक अपेक्षाओं पर आधारित होता है। हमारे सामने आने वाली वास्तविक स्थितियों से वह अलग होता है।

परन्तु बुद्ध ने कहा कि इस स्थिति को समाप्त करना संभव है तथा इन समस्याओं को इस रूप में अवरुद्ध करना कि वे फिर कभी उत्पन्न न हो। ऐसा नहीं है कि हम इन कष्टों को सदा भुगतने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसा भी नहीं है कि इसका एकमात्र समाधान नशीली दवाओं का सेवन अथवा नशा करना है ताकि इस पीड़ा की हमें अनुभूति न हो और हम ऐसा सोचें कि कुछ पल के लिए ही सही हमें अपनी समस्याओं से मुक्ति मिल गयी है। और ऐसा भी नहीं है कि हम अपने को गहन ध्यान साधना की स्थिति में ले जायें और इस प्रकार विचारों को अवरुद्ध करके अपनी समस्याओं का समाधान खोजें। इस प्रकार के समाधान केवल अस्थायी होते हैं। इनसे हमें अपनी समस्याओं से छुटकारा बिल्कुल नहीं मिल पाता। यदि हमें अपनी समस्याओं से छुटकारा पाना है तो हमें इन समस्याओं के कारण से स्वयं को मुक्त करना होगा। हमें अपनी भ्रान्ति से मुक्ति पानी होगी। हमें भ्रम के स्थान पर सही बोध विकसित करना होगा। हम सबकी समान दशा है। सब सुखी होना चाहते हैं और कोई भी दुखी नहीं होना चाहता और ऐसा कोई भी नहीं है जिसका सुख पर औरों से अधिक अधिकार हो। इसके अतिरिक्त, हम केवल एक व्यक्ति हैं और अन्य सभी असंख्य हैं। यदि हम इस वास्तविकता को समझ लें और तदनुसार अपना रवैया बदल लें तो फिर हमारा बोध धीमे-धीमे विकसित होता जाएगा तथा हमारी भावात्मक दशा में भी परिवर्तन आएगा।

चित्त साधना

चूँकि हम अपने जीवन का अधिकांश भाग प्रक्षेपण के काल्पनिक संसार में जीते हैं इसलिए अपने अनुभव के आलंबनों के प्रति यह भ्रम हमारी मनोदृष्टि को आकार देता है। आत्म-पोषक मनोदृष्टि के साथ, आत्मकेन्द्रित रूप में जो कुछ हमारे साथ घटित होता है वह और अधिक दुःख और समस्याओं को, स्वयं हमारे लिए तथा दूसरों के लिए उत्पन्न करता है। परन्तु मनोदृष्टि के परिवर्तन के साथ जीवन की घटनाओं के प्रति हमारा रवैया नाटकीय रूप से बदल जाता है।

उदाहरण के लिए हवाई अड्डे पर हमारी उड़ान में विलम्ब होने पर हम उसे एक विपदा न मानकर उसे इस प्रकार से सोचें कि बस इतनी सी बात है कि हमें इस उड़ान में जाने के लिए कुछ समय प्रतीक्षालय में बिताना होगा। फिर हम इस स्थिति के प्रति अपनी दृष्टि को बदल सकते हैं यह सोचते हुए कि अन्य लोग इस स्थिति का किस प्रकार सामना कर रहे हैं। हम इसे साथी यात्रियों के साथ बातचीत का सिलसिला बढ़ाने का एक अवसर मान सकते हैं और इस प्रकार अशान्त होने के स्थान पर प्रसन्नचित्त होकर दूसरे व्यक्ति को शांत करने, उसको उद्विग्न न होने देने में सहायक हो सकते हैं। ठीक जिस प्रकार शारीरिक व्यायाम से हम अपने शरीर को अधिक सुदृढ़ बनाने का और अधिक सहन शक्ति विकसित करने का अभ्यास कर सकते हैं; उसी प्रकार ध्यान-साधना के माध्यम से हम अपनी मनोदृष्टि को भी अधिक दृढ़ एवं अधिक सकारात्मक और भावात्मक रूप से शांत बना सकते हैं ताकि अशांतकारी स्थितियों को सहन कर सकें।

भावात्मक दृढ़ता अर्जित करना

वीडियो: खांद्रो रिंपोशे – बौद्ध धर्म में चित्त की साधना
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कभी-कभी हम समझ भी पाते हैं कि हमारी समस्याएँ क्या हैं। हम समझ जाते हैं कि हम एक विशेष प्रकार की भावात्मक अशांति का अनुभव कर रहे हैं क्योंकि हमारा चित्त अनुदार एवं संकीर्ण है जो केवल अपने विषय में सोच रहा है। परन्तु हमारी मनोभावनाएं बदलती नहीं हैं। हमारा बोध हमारी अनुभूतियों को वास्तव में प्रभावित नहीं कर पाता। कठिनाई यह है कि हमारा बोध वास्तव में पर्याप्त रूप से गहरा नहीं है। न केवल यह पर्याप्त रूप से गहरा नहीं है अपितु एक लम्बी अवधि में इसने यथार्थ को “आत्मसात” नहीं किया है ताकि हमारे रवैये में बदलाव ला सके।

आइये पुन: शारिरिक स्वास्थ्य का उदाहरण लेकर इस बात को प्रमाणित करें। मान लीजिये हम शारीरिक रूप से हर समय स्वयं को दुर्बल, थका हुआ और भारीपन से ग्रस्त महसूस करते हैं। अत: हम व्यायामशाला या फिटनेस क्लब में जाने लगते हैं और नियमित रूप से व्यायाम करना आरम्भ कर देते हैं। एक बार जब हम कोई व्यायाम कार्यक्रम आरम्भ करते हैं तो तत्काल हमें अपनी शारीरिक स्थिति में परिवर्तन दिखाई नहीं देता। काफी समय बाद, प्राय: अनेक महीनों बाद हमें अपने स्वास्थ्य में परिवर्तन अनुभव होता है। जितनी लम्बी अवधि तक हम व्यायाम करते हैं और जब यह दिनचर्या का नियमित अंग हो जाता है, उसके बाद ही हमें परिवर्तन अनुभव होता है : हमें बहुत अच्छी अनुभूति होने लगती है। हमें अपना आप बेहतर लगने लगता है जो दूसरों से हमारे व्यवहार में सुधार लाने में सहायक होता है।

कभी-कभी ऐसी ही अनुभूति होती है जब हमें यह बोध होता है कि हमारे चित्त, हमारे मनोभावों में क्या कुछ घटित हो रहा है। जितने दीर्घकाल तक यह बोध बना रहता है उतनी ही देर तक हम स्वयं को उस विषय में स्मरण कराते रहते हैं और हमारा बोध गहन होता जाता है। इस प्रकार यद्यपि मनोभावों में तत्काल परिवर्तन नहीं होगा परन्तु जैसे-जैसे हम अपनी मनोदृष्टि को अंतरित करेंगे हम अधिक भावात्मक संतुलन तथा दृढ़ता अर्जित करने लगेंगे।

आत्म-सुधार के लिए प्रेरणा के स्तर 

फिटनेस क्लब में जाना न केवल आत्म-अनुशासन बल्कि सचेतनता की भी मांग करता है जिसका तात्पर्य है वहां जाना याद रखना और भूलना नहीं। इसकी तह में वही है जिसे हम “अप्रमाद मनोदृष्टि” कहते हैं – हम अपनी फ़िक्र करते हैं, हम ध्यान रखते हैं हम देखने में कैसे लग रहे हैं, हम किस प्रकार अनुभव कर रहे हैं इत्यादि। हम अपने लिए गंभीर होते हैं और अपना सम्मान करते हैं। एक प्रकार से लगभग हम यह समझते हैं कि हमें सुखी होने और स्वस्ति का अनुभव करने का लगभग “अधिकार” है। यही बात आत्म-बोध पर भी लागू होती है। यह समझना कि हमारा भावात्मक जीवन किस प्रकार संचालित होता है। यह भी निर्भर है इस बात पर कि हम अपनी परवाह करें कि हाँ, हमें भी बेहतर भावात्मक स्वास्थ्य से लाभान्वित होने का अधिकार है।

अपने प्रति यह अप्रमाद आत्म-पोषणकारी मनोदृष्टि से बहुत भिन्न है। आत्म-पोषण के अधीन हम केवल अपने विषय में सोचते हैं और दूसरों के कल्याण की उपेक्षा करते हैं। हम इस बात की चिंता नहीं करते कि हमारे रवैये और व्यवहार का उन लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है जिनसे हम सम्बन्ध रखते हैं अथवा मात्र परिचय में आते हैं। दूसरी ओर, अप्रमाद जनित दृष्टिकोण में हमें यह बोध हो जाता है कि हमारे आत्म-केन्द्रित और स्वार्थी रवैये के कारण हमारे जीवन में दुःख एवं समस्याएं उत्पन्न होती हैं, और चूँकि हम सुखी होना चाहते हैं इसलिए हम अपने विषय में उस सीमा तक सोचते हैं जहाँ हम उस स्थिति को सुधारने के लिए इच्छुक हो जाते हैं। हम अपनी मनोदृष्टि और व्यवहार में परिवर्तन करने के लिए आत्म-सुधार करते हैं और सचेत रहते हैं कि हमने अभ्यास द्वारा जो अर्जित किया है उसे भविष्य में कार्यान्वित करें।

इस प्रकार आत्म-सुधार करने के लिए प्रेरणा के अनेक स्तर होते हैं। प्रेरणा का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि आत्म-सुधार करने का हमारा क्या लक्ष्य है और वह कौन सी शक्ति है जो हमें उस ओर प्रेरित कर रही है। बौद्ध धर्म की शिक्षाओं में इस पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरणा के अनेक स्तरों की रूप-रेखा दी गयी है। यह भी संभव है कि हम केवल अपने जीवन की गुणवत्ता सुधारने का प्रयास कर रहे हों क्योंकि वह फिलहाल संतोषप्रद नहीं है। न केवल हम यह चाहते हैं कि वह इस प्रकार असंतोषकारी न बनी रहे बल्कि बहुत अच्छा हो कि वह इससे भी निकृष्ट न हो जाए। वस्तुत: अत्यंत उत्तम हो कि वह बेहतर हो जाए! हम वास्तव में असंतुष्ट हैं और उस सीमा तक पहुँच गए हैं कि हमें लगता है कि अब तो हद हो गयी और उस विषय में कुछ करना चाहते हैं।

यह भी संभव है कि हम अधिक उन्नत स्तर पर, केवल इस जीवनकाल के विषय में न सोचें, अपितु भावी जीवनकालों के विषय में भी सोचें। हम नहीं चाहते कि भावी जीवनकालों में  स्थितियां बदतर हो जाएँ। हम उसी भावात्मक शक्ति से प्रेरित होते हैं जो हमें इस जीवनकाल में सुधार करने के लिए प्रेरित करती है। अंतर केवल इतना है कि हम अधिक लम्बे समय के विषय में सोच रहे होते हैं। इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ती स्तर हो सकता है जिसमें हम चाहते हैं कि जो विभिन्न समस्याएँ हमारे परिवार को झेलनी पड़ रही हैं वे भावी पीढ़ियों तक न पहुंचे।

भावी जीवनकालों के बारे में सोचने से हमारी यह भी प्रेरणा हो सकती है कि हम इस असंतोषकारी, कुंठा उत्पन्न करने वाले आवर्ती पुनर्जन्म के चक्र से पूर्णत: मुक्ति पा लें। अथवा करुणा से द्रवित होकर हम सबकी सहायता करने के विषय में सोचें कि वे इन सभी समस्याओं पर विजय पा सकें। यदि हम वैसा करते हैं तो हम बुद्ध बनने की दिशा में अभ्यास कर रहे होते हैं।

वास्तव में इस प्रकार का व्यक्ति बनने में जिसमें इतनी उन्नत स्तर की प्रेरणा के गुण निहित हों, अत्यधिक अभ्यास अपेक्षित है। इसके बावजूद हम चाहे किसी भी स्तर पर क्यों न हों, बौद्ध धर्म की शिक्षाओं में हमें ऐसी बहुत सी पद्धतियाँ मिलती हैं जो सहायक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए हम केवल इसी जीवन के विषय में सोच रहे हों तो भी हम द्रवित होकर केवल अपने विषय में और अपनी समस्याओं को सुलझाने के बारे में नहीं सोचेंगे अपितु करुणाभाव से द्रवित होकर औरों के विषय में भी सोचेंगे। दूसरे शब्दों में, हम अपनी समस्याएँ सुलझाने का लक्ष्य इसलिए नहीं बनाते कि उनसे हमें कष्ट और पीड़ा होती है बल्कि इसलिए भी कि वे हमें दूसरों की सर्वोत्तम सहायता करने में बाधित करती हैं। चित्त साधना की शैली में आत्म-सुधार यही है।

उदाहरण के लिए मान लीजिये कि हमें मदिरा के नशे की लत है। एक दृष्टिकोण से हम प्रेरित अनुभव कर सकते हैं कि नशे की आदत पर हमारी निर्भरता इसलिए समाप्त हो कि इससे सामान्यतया हमारे स्वास्थ्य का और हमारे पूरे परिवेश का नुकसान हो रहा है। अगले दिन सुबह जब नशे का प्रभाव बना रहता है तो हमें अच्छी अनुभूति नहीं होती। परन्तु यदि हम अधिक दृढ़ता से अपने परिवार के विषय में सोचेंगे तो हम सोच पायेंगे कि यह पीने की आदत किस प्रकार मुझे अच्छा अभिवावक बनने से रोक रही है। उदाहरण के लिए नशे में धुत्त होने के कारण मैं प्राय: कितना असंतुलित व्यवहार करता हूँ और इससे परिवार तथा मित्रों से मेरे सम्बन्ध वास्तव में बिगड़ रहे हैं। जब हम समझ लेते हैं कि मेरे परिवार को मेरी कितनी आवश्यकता है और यह नशे की लत किस प्रकार उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने में मुझे रोक रही है, तब हमें नशे की निर्भरता से पीछा छुड़ाने की अधिक हिम्मत मिलती है।

इस प्रकार तथापि चाहे हम बौद्धधर्मी पद्धतियों का केवल इस जीवनकाल को सुधारने में प्रयोग क्यों न कर रहे हों, अपने लोगों के प्रति प्रेम और करुणा की प्रेरणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन चित्त साधना शिक्षाओं में पर-पोषण पर बहुत बल दिया गया है तथापि हम इनमें से अनेक पद्धतियों का प्रयोग स्वयं अपनी बेहतरी के लिए कर सकते हैं। निश्चित रूप से कहीं अच्छा होगा यदि हम इन पद्धतियों का प्रयोग इस रूप में करें कि हम दूसरों के अधिक काम आ सकें।

जीवन की आठ अल्पकालिक बातें (आठ सांसारिक सरोकार)

हम अपने जीवन में बहुत ही कठिन स्थितियों का सामना करते हैं। वे इस रूप में कठिन होती हैं कि वे पीड़ादायक होती हैं। ऐसा नहीं है कि वे आवश्यक रूप से शारीरिक रूप से पीड़ादायक हों; वे मानसिक रूप से भी ऐसी हो सकती हैं। इन कठिन स्थितियों को इस रूप में समझ सकते हैं, उदाहरण के लिए, ऐसी स्थितियों का सामना करना जो अशांतकारी मनोभावों को जन्म देती हैं। ये अशांतकारी मनोभाव, एक ओर, क्रोध जैसे भी हो सकते हैं परन्तु दूसरी ओर वे प्रबल आसक्ति जैसे भी हो सकते हैं। हम सब जानते हैं कि हम कितना असहज हो उठते हैं जब हमारा चित्त क्रोध अथवा शत्रु भाव से भर जाता है अथवा जब वह गहन आसक्ति एवं तीव्र लालसा से ओत-प्रोत होता है।

कुछ स्थितियां विशिष्ट रूप से कठिन होती हैं जिनका उल्लेख बौद्धधर्मी सूची में परिगणित है, तथाकथित “जीवन की आठ अल्पकालिक बातें”। कभी-कभी इनका अनुवाद “आठ सांसारिक सरोकारों” अथवा “आठ सांसारिक धर्मों” के रूप में किया जाता है। परन्तु यहाँ अभिप्राय उन स्थितियों से है जो हमारे जीवन में अल्पकाल के लिए आती हैं; वे स्थायी नहीं होती, गुज़र जाती हैं। ये चार युग्मों में घटित होती हैं :

  • प्रशंसा अथवा आलोचना मिलना – यदि हमें प्रशंसा मिलती है तो हम फूलकर कुप्पा हो जाते हैं और उससे जुड़ जाते हैं; और जब हमारी आलोचना होती है तो हम परेशान और क्रोधित हो जाते हैं।
  • अच्छा समाचार या बुरा समाचार मिलना – जब हमें अच्छा समाचार मिलता है तो हम बहुत उत्साहित हो जाते हैं और जाहिर है हम उससे जुड़ना चाहते हैं, हम चाहते हैं कि वह बना रहे, जो कभी हो नहीं पाता। जब हम बुरा समाचार पाते हैं तो हम बहुत परेशान हो जाते हैं और प्राय: खिन्न और क्रोधित हो उठते हैं।
  • लाभ या हानि उठाना – जब हमें लाभ होता है, उदाहरण के लिए जब कोई हमें कोई चीज़ देता है, तो हम बहुत प्रसन्न और उत्साहित होकर सोचते हैं, “वाह, क्या बात है।” जब हम किसी चीज़ को खो देते हैं या लोग उसे हमसे छीन लेते हैं या वह टूट जाती है तो हम बहुत अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। लाभ और हानि व्यक्तियों के रूप में हो सकती है जो हमारे जीवन में आते हैं। हमें किसी की मित्रता प्राप्त होती है अथवा कोई प्रियजन हमसे बिछुड़ जाता है अथवा यह वित्तीय स्तर पर भी हो सकता है।
  • बात बनना या बिगड़ जाना – हम पूरी तरह उत्साहित होकर जुड़ जाते हैं अथवा हम निराश एवं क्रोधित हो जाते हैं

इन आठ अल्पकालिक घटनाओं के कारण हम अपनी आत्म-केन्द्रित मनोदृष्टि के कारण परेशान हो जाते हैं। हम केवल अपने विषय में और जो कुछ हमारे साथ घटित हो रहा है उसके विषय में सोचते हैं और या तो हमें लगता है कि मैं कितने कमाल का हूँ अथवा “बेचारा मैं”।

अस्थायी विरोधी बलों को लागू करना

जीवन की इन आठ अल्पकालिक बातों के परिणामस्वरुप उत्पन्न होने वाले अशांतकारी मनोभावों पर नियंत्रण पाने के लिए विभिन्न पद्धतियों की शिक्षा दी गई थी। इनमें से प्रत्येक हमें ऐसा अभ्यास करने की शिक्षा देती है जिसकी  सहायता से हम पर-पोषण का हितकारी रवैया अपनाएं। एक पद्धति यह है कि हम किसी स्थिति को अस्थायी विरोधी बल की दृष्टि से देखें। यह हमें अशांतकारी मनोभाव से चिरस्थायी रूप से मुक्त नहीं कर पायेगी। यह पद्धति बहुत गहरे नहीं उतर पाती परन्तु यह अत्यंत सहायक है।

क्रोध के विरोधी के रूप में प्रेम

उदाहरण के लिए, हमारे साथ कुछ भी ठीक नहीं चल रहा। हमारे जीवन में कोई है जो हमारे साथ बहुत ही बुरा और अप्रिय व्यवहार कर रहा है, जिस कारण हम उस व्यक्ति से बहुत क्रोधित हैं। केवल अपने विषय में सोचते हुए हमें एक ही बात की धुन सवार है, “उसका यह व्यवहार मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है।” यहाँ हम क्रोध के एक स्थायी विरोधी, प्रेम को लागू करेंगे। अब यहाँ हम नितान्त एकांगी भाव से यह नहीं कहेंगे, “चलो, क्रोध मत करो, उस व्यक्ति से प्रेम करो।” स्पष्ट है कि हममें से अधिकाँश के लिए ऐसा परिवर्तन कर पाना संभव नहीं है परन्तु एक अच्छा उदाहरण है कि किस प्रकार अपने बोध का उपयोग करते हुए पर-पोषण भाव से अपनी मनोदशा और मनोदृष्टि को बदला जा सकता है।

यह व्यक्ति मेरे प्रति बहुत दुष्टतापूर्ण व्यवहार कर रहा है और यह ऐसा क्यों कर रहा है? उसे कुछ परेशान कर रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके जीवन में भी ऐसे लोग होंगे जो हमेशा शिकायत करते रहते हैं। वे जब भी आपके साथ होते हैं वे अपनी बातचीत में बराबर किसी न किसी बात की शिकायत करते रहते हैं। वे बराबर अपने बारे में बात करते रहते हैं और उनके साथ होना पूर्णत: “अवसादकारी” अनुभव होता है। यदि हम इसका विश्लेषण करें, तो यह व्यक्ति ऐसा व्यवहार इसलिए करता है क्योंकि वह अत्यंत दुखी है। अपनी मनोदृष्टि को रचनात्मक बनाने की एक विधि यह है कि हम सोचें; “काश यह व्यक्ति सुखी हो पाता, तो यह बराबर इस तरह शिकायत न करता और मेरे लिए भी मुसीबत खड़ी न करता।” बौद्धधर्म में प्रेम की परिभाषा है यह कामना करना कि अन्य लोग सुखी हों और सकारण सुखी हों। अत: बजाय यह कामना करने के कि दूसरा व्यक्ति बस कहीं चला जाए और मुझे परेशान न करे, हम यह कामना करते हैं कि काश वह सुखी हो जाए और जो कुछ उसे परेशान कर रहा है वह समाप्त हो जाए। इस प्रकार हम कम अशांत होंगे। ध्यान साधना में मनोदृष्टि में ऐसा परिवर्तन करने का अभ्यास “चित्त साधना” कहलाता है।

सम्मोहनकारी यौन आकर्षण क्षीण करना

इसी प्रकार, यदि हम किसी के प्रति अत्यधिक आकर्षित हैं तो हम ऐसे अस्थायी विरोधी भाव लागू करके अपनी कल्पना का प्रयोग करते हैं। आत्म-केन्द्रित होकर केवल उस व्यक्ति के बाहरी रंग-रूप के बारे में सोचने के बजाय मानो वह मेरे ही सुख-भोग का आलम्बन है, हम कल्पना कर सकते हैं कि उसके शरीर के भीतरी अवयव कैसे होंगे- उसका पेट, अंतड़िया, मस्तिष्क इत्यादि। इससे भी अधिक सहायक होता है कि हम उसके मुख की ओर देखें और कल्पना करें कि उसकी खोपड़ी अन्दर से कैसी होगी। निस्संदेह जो हम कल्पना कर रहे हैं वह यथार्थ है क्योंकि उस व्यक्ति की त्वचा के भीतर वही सब तो स्थित है।

एक अन्य प्रभावी पद्धति है कि उस व्यक्ति की एक बालक के रूप में कल्पना करना और यह सोचना कि एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति के रूप में वह कैसा लगेगा। इस प्रकार हम अपनी आसक्ति को कम कर सकते हैं, विशेषतया यदि वह यौन आकर्षण हो। यह समझते हुए कि जो कुछ हम देख पा रहे हैं वह ऊपरी रंग-रूप है और निश्चित रूप से वह सदा नहीं रहेगा अथवा यदि उसे कोई भीषण त्वचा का रोग हो जाए अथवा उसका मुंह मुहांसों से भर जाए, तो क्या हम तब भी हम इसी प्रकार आकर्षित रहेंगे? जितना अधिक हम इस बात को समझेंगे कि उसके भीतर अंतड़िया हैं और एक कंकाल है उसी अनुपात में हमारी दृष्टि में परिवर्तन होगा तथा भावात्मक आवेग धीमा पड़ जाएगा। हम अधिक संतुलित हो जाते हैं।

इसके पश्चात हम उनके प्रति एक अप्रमाद की मनोदृष्टि विकसित कर सकते हैं। यह व्यक्ति जिसके प्रति हमारे भीतर इतना प्रबल यौन आकर्षण था, उसका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि ऐसी प्रबल आसक्ति और आकर्षण प्राय: शरीर केन्द्रित ही होता है। हम इस बात को भूल जाते हैं कि वे भी मनुष्य हैं, वे सुखी होना चाहते हैं, दुखी होना नहीं चाहते और यह भी नहीं चाहते कि उनके साथ को उपभोग की वस्तु माना जाए। उस व्यक्ति की भी अपनी असुरक्षाएं, भावात्मक समस्याएँ, अपनी पारिवारिक समस्याएँ होती हैं। उनके इन पक्षों के बारे में सोचना उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु मानने का विरोधी होगा। हम उन्हें एक वास्तविक मनुष्य के रूप में देखते हैं और उनके सुख तथा कल्याण के लिए सच्चे मन से फ़िक्रमंदी का भाव विकसित करते हैं।

भिखारियों अथवा विकलांग व्यक्तियों के प्रति वितृष्णा एवं उपेक्षा से बचना

जब हम किसी कुरूप या घृणित व्यक्ति को देखते हैं तो विरोधी भाव का प्रयोग अत्यंत प्रभावी होता है। यह विशेष रूप से प्रभावी होता है अन्य देशों की अपेक्षा मेक्सिको अथवा भारत जैसे देशों में जहाँ प्राय: हमारा सामना भिखारियों अथवा निम्न श्रेणी के अत्यधिक निर्धन लोगों से होता है। हम इसका प्रयोग विकलांग व्यक्तियों के लिए भी कर सकते हैं जिनका साथ हमारे लिए अत्यधिक असह्य एवं उलझन पैदा करने वाला हो जाता है, चाहे वे दृष्टिबाधित हों अथवा कर्णबाधित हों अथवा पक्षाघात ग्रस्त हों।

मुझे याद है बर्लिन में एक बार विकलांग लोगों से सम्बंधित एक प्रदर्शनी हुई थी उसके एक भाग में पक्षाघात ग्रस्त लोगों के विडियो साक्षात्कारों की एक श्रृंखला थी। उनके हाथ-पाँव अनियंत्रित रूप से फड़क रहे थे उनके मुह टेढ़े थे और उनकी वाणी अस्पष्ट थी। ये लोग अपने यौन जीवन की चर्चा कर रहे थे और बता रहे थे कि उनके ह्रदय में भी ठीक उसी प्रकार के मनोभाव उठते थे, उनकी ठीक उसी प्रकार की यौन आवश्यकताएं थीं और दूसरों की भाँति सम्बन्ध स्थापित करने की कामनाएँ थीं। तत्पश्चात उन्होंने बताया कि उनके किस प्रकार के प्रेम समबन्ध रहे। बर्लिन स्कूल के सभी बच्चों के लिए यह प्रदर्शनी देखना अनिवार्य था जो मेरे अनुसार बहुत बढ़िया बात थी। यह दिखाना कि ये लोग भी दूसरों की भांति हाड़-मांस के मनुष्य थे । ऐसे लोगों के साथ होने पर अपनी आत्म-केन्द्रित वितृष्णा अथवा विमुखता अथवा मात्र असहज भाव पर विजय पाने के लिए यह पद्धति अत्यंत सहायक है। एक अन्य पद्धति यह है कि जब आप सड़क पर किसी वृद्ध व्यक्ति को भीख मागते देखें तो “मेरी माँ” अथवा “मेरे पिता” को वहां बेघर भीख मांगती अवस्था में कल्पित कीजिये। अथवा यदि आप किसी घर से भागे हुए किशोर को सड़क पर भीख मांगते हुए देखें तो कल्पना कीजिये कि “मेरा पुत्र” या “मेरी पुत्री” इस अवस्था में हों तो कैसा हो। मनोदृष्टि में यह परिवर्तन कि हम उस व्यक्ति को किस दृष्टि से देखते हैं, उस व्यक्ति के प्रति हमारी भावात्मक प्रक्रिया को पूर्णतया बदल देगा।

मुझे स्वीकार करना चाहिए कि मैं ऐसा कभी नहीं कर पाया। परन्तु मैं न्यूयॉर्क में एक पश्चिमी जेन शिक्षक को जानता हूँ, जिनके छात्र यदि वे चाहें तो सड़कों पर जाते हैं बिना धन, क्रेडिट या डेबिट कार्ड के और फिर बेघर-बार हालत में एक सप्ताह तक भीख मांगते हैं, यह अनुभव करने के लिए कि उस स्थिति में कैसा लगता है। 

ये कुछ अत्यंत प्रभावशाली “ओषधियाँ” हैं जिनसे हम कठिन परिस्थितयों में भी उपेक्षा भाव पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। मैं सोच रहा हूँ, प्राय: जब हमारा ऐसे लोगों से सामना होता है तो हम उनकी ओर देखना भी नहीं चाहते। हम असहज हो जाते हैं। कल्पना कीजिये कि हम उनके स्थान पर होते। आप उस स्थिति में हैं, संघर्षरत और कोई आपकी ओर देखना भी नहीं चाहता अथवा आपके अस्तित्व को स्वीकार करना भी नहीं चाहता अथवा आपको भगाना चाहता है मानो कि आप कोई मच्छर हों। बहरहाल जो भी हो विरोधी बलों को लागू करने की यह एक पद्धति है परन्तु यह कामचलाऊ हैं, यह समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच पाती।

गहनतम-प्रभावी विरोधी बलों को काम में लाना

दूसरी चित्त साधना पद्धति है एक ऐसे विरोधी बल को काम में लाना जो कामचलाऊ समाधान नहीं है बल्कि वह समस्या की जड़ तक पहुँचती है और उसका निवारण करती है। यहाँ अभिप्राय एक ऐसी चित्त की अवस्था को काम में लाना है जो कि परस्पर अनन्य, भ्रमित और भ्रान्ति युक्त मनोदशा के ठीक विपरीत है। यहाँ शून्यता का बोध अभिप्रेत है, अर्थात किसी व्यक्ति अथवा स्थिति के अस्तित्वमान होने की भ्रांत धारणा जो यथार्थ से बिल्कुल मेल नहीं खाती। दूसरे शब्दों में हमारी आसक्ति अथवा क्रोध मूलतः अस्तित्व विषयक भ्रान्ति ही है।

यह अवसर शून्यता पर विस्तृत चर्चा का नहीं है अत: आइये इस पर केवल प्राथमिक स्तर पर चर्चा की जाए। उदाहरण के लिए, मान लीजिये आप अपने रोगी दादा-दादी अथवा अपने  वयोवृद्ध माता या पिता से किसी वृद्धों के नर्सिंग होम में मिलने जाते हैं। जब आप दालान से निकलकर उनके कमरे में प्रवेश करते हैं तो आप किसी ऐसी वृद्धा के पास से गुज़रते हैं जो किसी पहियों वाली कुर्सी पर निढाल बैठी हुई है, अपने आप से बुदबुदाती हुई, उसके मुंह से लार बह रही है जिसे वह अपनी गोद में रखे तौलिये से पोंछ रही है। ऐसे किसी व्यक्ति को देखकर आप बहुत असहज हो उठते हैं। आप सोच लेते हैं कि वह हमेशा से वैसी ही रही है। और यदि उसके पास से गुजरते हुए वह अपना हाथ बढ़ाकर आपका हाथ थाम लेना चाहती है अथवा केवल आपका स्पर्श करती है आप घबरा जाते हैं। आप केवल अपने बारे में सोच रहे हैं।

निस्संदेह यहाँ हम विरोधी बल का प्रयोग कर सकते हैं और याद कर सकते है कि वह भी मनुष्य है, उसका भी एक जीवन था, एक व्यवसाय था, जब वह युवा थी; वह सदैव वैसी नहीं लगती थी। वह अपना हाथ बढ़ा रही है क्योंकि वह मानव संपर्क चाहती है। यह प्रभावी हो सकता है परन्तु हम एक गहनतर पद्धति अपना सकते हैं। हम इस बात को समझें कि हम उसके विषय में एक असम्भव कल्पना कर रहे हैं कि वह उसी रूप में रही है जैसी वह आज दिखाई देती है, वृद्ध और जर्जर इसके इतर कुछ भी नहीं। कोई भी इस प्रकार संभवत: अस्तित्वमान नहीं रहता मानो एक स्थिर चित्र में एक समय अवधि में आबद्ध। फिर हम अपना ध्यान एकाग्र करते हैं, “ऐसा कुछ नहीं है, यह असंभव है”। यह कहीं अधिक प्रबल विधि है अपनी भ्रांत धारणा के अवरोधन की ताकि हम उस वृद्धा के प्रति अधिक यथार्थवादी और करुणामय मनोदृष्टि अपना सकें।

अंतर्निहित गहन सचेतनता प्रकट करने के लिए अशांतकारी मनोभावों को शिथिल करना

ध्यान साधना के उन्नत प्रकार में एक अन्य विधि का प्रयोग किया जाता है जिसे “महामुद्रा” कहा जाता है, नामत: “अन्तर्निहित गहन सचेतनता का दर्शन जिसमें अशांतकारी मनोभावों का स्वत: विलय हो जाता है।” इस विधि में उस क्रियाविधि का उपयोग किया जाता है जिसके माध्यम से हमारा चित्त यथार्थता का बोध करता है – सरल भाषा में कहा जाए तो “हमारे चित्त की कार्यसंचालन विधि।”

चलिए एक उदाहरण देखते हैं। मान लीजिये कि हमारे भीतर किसी के प्रति प्रबल आकर्षण एवं उसे पाने की प्रबल लालसा है। यदि हम उस भावात्मक दशा के तनाव को शिथिल कर सकें तो हम उसकी तह में पायेंगे, “गहन सचेतनता का वैयक्तिकरण”। दूसरे शब्दों में, वास्तव में हो यह रहा है कि किसी भी अन्य व्यक्ति के विपरीत हमने उस व्यक्ति को विनिर्दिष्ट कर दिया है कि वह व्यक्ति एक इकाई है। कुल मिलाकर चित्त की मूल संरचना में यही हो रहा है। इसके पश्चात हम यह प्रक्षेपण करते हैं “यह व्यक्ति वास्तव में विशिष्ट है।” हम उस व्यक्ति में कुछ विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं और फिर आकर्षण एवं लालसा अथवा आसक्ति का अनुभव करते हैं।

लालसा तब होती है जब आपके पास वह आलंबन नहीं होता। आप उसे पाना चाहते हैं; और आसक्ति तब होती है जब वह आपके पास होता है, परन्तु आप उसे जाने नहीं देना चाहते। स्पष्ट है कि दोनों ही स्थितियों में आप पूरी तरह आत्म-केन्द्रित होते हैं। यदि आप इस मनोदशा में अतिरंजना और उसी से संसक्त रहने की बंधी हुई ऊर्जा को शिथिल कर दें तो चित्त का मूल रूप शेष रह जाएगा जो विनिर्दिष्ट कर रहा है। बस इतनी सी बात है।

यह पर्याप्त उन्नत विधि है परन्तु अत्यंत प्रभावी हो सकती है यदि आप इसका प्रयोग कर सकें। परन्तु इसमें किंचित परिपक्वता अपेक्षित है कि हम भावनाओं में बहकर न रह जाएँ। आप में क्षमता होनी चाहिए कि आप देख सकें कि किसी स्थिति का सामना करते हुए आपके भावात्मक व्यवहार की तह में क्या चल रहा है और फिर शांत हो सकें। जितना अधिक हम अन्तर्निहित मूलभूत बोध को समझते जायेंगे हमारे मनोभावों का स्वत: उन्मोचन हो जाएगा।

प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाना : दूसरों के प्रति हमारा दृष्टिकोण

अगली पद्धति है आपके अनुसार ऐसी स्थितियां जो आपकी साधना के अनुकूल नहीं हैं उन्हें अनुकूल बनाना। परम्परागत चित्त साधना ग्रंथों में, विशेषतया लंगरी तंगपा रचित चित्त साधना के आठ छंद में महान भारतीय आचार्य, शांतिदेव ने बोधिसत्वचर्यावतार में इस प्रकार की मनोदृष्टि का संकेत किया है। उन्होंने लिखा

(vi.10) यदि उसका उपचार हो सकता है, तो किसी बात पर अपनी मनोदशा क्यों बिगाड़ी जाए और यदि उसका उपचार नहीं हो सकता तो मनोदशा बिगाड़ कर ही क्या मिल जाएगा?

यदि आप किसी स्थिति को बदलने के लिए कुछ कर सकते हैं, तो फिर उसे लेकर अशांत क्यों हुआ जाए? उसे बदल डालिए। और यदि कुछ नहीं कर सकते तो फिर परेशान क्यों हुआ जाए? उससे तो कुछ नहीं मिलेगा। तो यदि हम किसी ऐसी परिस्थिति में हैं जो अत्यंत क्षतिकारक है, अत्यन्त विकट जैसे आलोचना, अथवा कोई बात न बन पाना और उसमें कोई परिवर्तन न कर पाना, तो फिर परेशान होकर क्या हो जाएगा? बस अपना रवैया बदल लीजिये।

किसी प्रतिकूल स्थिति को अनुकूल बनाने की अनेक विधियाँ हैं। अपना रवैया बदलने की कुछ विधियाँ इस बात पर निर्भर हैं कि हम दूसरों को किस प्रकार भिन्न दृष्टि से देखते हैं जब वे हमारे लिए समस्या खड़ी कर रहे होते हैं। अन्य विधियाँ वे हैं जो इस पर निर्भर करती हैं कि इन विकट स्थितियों में हम स्वयं अपने को किस रूप में देखते हैं। आइये पहले उन विधियों को देखें जिनका सम्बन्ध दूसरों के प्रति हमारे रवैये से है।

कष्टकारी लोगों को इच्छा-पूरक मणि के रूप में देखना

कष्टकारी लोगों के प्रति अपनी दृष्टि को बदलने की एक विधि यह है कि हम उन्हें “इच्छा-पूरक मणि सदृश” देखें। उदाहरण के लिए, हम सोचते हैं, “यह व्यक्ति मेरे लिए एक चुनौती बन रहा है; यह मुझे आत्म-विकास करने का, यह परख करने का अवसर दे रहा है कि मेरा कितना विकास हुआ है। यह एक अद्भुत अवसर है। अथवा, “इस व्यक्ति ने मुझे दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया है। ऐसे व्यक्ति हमेशा शिकायत करते रहते हैं और मुझे पूर्णत: अवसादग्रस्त कर देते हैं परन्तु यह एक अद्भुत अवसर है! कितनी बढ़िया बात है कि इस व्यक्ति ने मुझे आमंत्रित किया है क्योंकि अब मुझे धैर्य-अभ्यास और समझने का अवसर मिलेगा।” तो ऐसे व्यक्ति इच्छा-पूरक मणि के समान होते हैं। “कितनी बढ़िया बात है कि मेरे पड़ोसी ने मुझसे अनुरोध किया है कि मैं सारी शाम उसके बालक का ध्यान रखूं। मैं जानता हूँ कि वह शिशु सारी शाम रोता-चिल्लाता रहेगा। यह बहुत अच्छी बात है।

शांतिदेव ने इसे बहुत भली प्रकार समझाया है,

(VI.107) अत: मैं अत्यंत हर्षित होऊँगा ऐसे शत्रु के सम्बन्ध में जो मेरे घर में एक कोष की भांति सहसा निकल पड़ा है, जिसे मैंने बिना किसी उद्यम के अर्जित किया है क्योंकि वह बोधिसत्व चर्या के लिए मेरा सहायक बन जाएगा।

किसी बोधिसत्व के लिए परम हर्ष का विषय होता है जब ऐसा सत्व जो परहित के लिए ज्ञानोदय प्राप्ति हेतु समर्पित है, उनसे कोई सहायता मांगता है। यदि उनसे कोई सहायता नहीं मांगता, तो वे बहुत खिन्न हो जाते हैं, उन्हें व्यर्थता बोध की अनुभूति होती है। मेरी एक वेबसाइट है और मुझे अनेक ईमेल प्राप्त होते हैं जिनमें प्रश्न पूछे जाते हैं, अथवा कुछ सहायता मांगी जाती है। ऐसी स्थिति में उनकी विशाल संख्या देखकर झुंझला जाना बहुत स्वाभाविक है। परन्तु यदि मैं वास्तव में इस प्रकार की अभ्यास साधना करूँ तो मुझे हर्ष होगा। जितने अधिक ऐसे अनुरोध आयेंगे उसी अनुपात में मुझे लोगों की सहायता करने का अवसर मिलेगा। यदि मैं बौद्धधर्मी शैली में प्रार्थना करूँ, “काश मैं सभी सत्वों के लिए हितकारी हो सकूँ”, और अधिक से अधिक सत्व वास्तव में मुझसे सहायता का अनुरोध करें, तो क्या मेरी प्रार्थना सत्य सिद्ध नहीं हुई?

जैसा शांतिदेव ने लिखा,  

(vii.64) यद्यपि लोग सुख प्राप्ति हेतु कृत्य करते हैं, तथापि यह निश्चित नहीं कि वे सुखी हो पायेंगे अथवा नहीं; परन्तु(किसी बोधिसत्व) के कृत्य वास्तव में सुखकारी होते हैं क्योंकि ऐसे कृत्य किये बिना वे कैसे सुखी हो सकते हैं?

कष्टकारी लोगों को अपने रुग्ण बालक के रूप में देखना

अपनी मनोदृष्टि में एक अन्य परिवर्तन हो सकता है ऐसे अप्रिय और कष्टकारी व्यक्ति के सान्निध्य को अपने रुग्ण बालक के रूप में देखना। जब हमारा बालक बीमार होता है और चिड़चिड़ा होकर रोता रहता है तो वह समय बहुत मुसीबत भरा हो सकता है। परन्तु फिर भी हमारे भीतर उसके प्रति गहरा वात्सल्य भाव बना रहता है क्योंकि हम समझते हैं कि वह बीमार है। संभवत: उसे बिस्तर में सुलाने की, या वैसा ही कुछ करने की आवश्यकता है। और ऐसे में यदि वह बुरी तरह थका हुआ बालक कहता है “मैं आपसे घृणा करता हूँ मुझे बिस्तर में नहीं सोना,” तो हम उसकी बात पर गंभीर रूप से प्रतिक्रिया नहीं करते क्योंकि वह बीमार है। तो इस प्रकार बस इतनी सी बात है कि ऐसे अप्रिय व्यक्तियों के प्रति अपना रवैया बदलकर उन्हें एक खिजाने वाले कीट-पतंग की तरह मारने के बजाय एक रुग्ण बालक समझा जाए। इस रूप में हम आत्म-केन्द्रित होने के बजाय उनके प्रति फिक्रमंद हो जाते हैं।

कष्टकारी लोगों को अपना गुरु समझना

तीसरी विधि है ऐसे लोगों को अपना शिक्षक समझना। एक प्रसिद्ध कथा है कि जब अतिश तिब्बत गए तो वे भारत से अपना रसोइया साथ लेकर गए। यह भारतीय रसोइया कभी उनकी बात नहीं मानता था और सदा पलटकर जवाब देता था। तिब्बतवासियों ने अतिश से कहा “आप इसे भारत वापस क्यों नहीं भेज देते? हम आपके लिए भोजन पका दिया करेंगे”। इस पर अतिश ने उत्तर दिया, “नहीं, नहीं! यह मात्र मेरा रसोइया नहीं है; यह मुझे धैर्य-परीक्षा सिखाने वाला गुरु है।” अत: यदि हमारा कोई खिजाने वाला रिश्तेदार है जिसे हमें निभाना ही है, तो उसे धैर्य की शिक्षा देने वाले गुरु के रूप में देखना अत्यंत सहायक होगा।  

वस्तुत: लोग हमें अनेकानेक बातें सिखा सकते हैं। उदाहरण के लिए बुरा व्यवहार करके वे हमें सिखाते हैं कि हम उस प्रकार के कृत्य न करें। यहाँ तक कि हमारा कुत्ता भी हमारा शिक्षक हो सकता है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है, यदि आप दिन के समय अपने कुत्ते को टहलाने ले जाते हैं तो वह कुत्ता कहीं भी भूमि पर लेटकर विश्राम कर लेता है, यहाँ तक कि सो भी जाता है। जबकि हमारी अनेक आवश्यकताएं हैं, “ओह, विशेष प्रकार का बिस्तर होना चाहिए, विशेष प्रकार की चादर हो, और वो भी बेहद मुलायम” अथवा “कड़ी होनी चाहिए,” अथवा ये, अथवा वो। कुत्ता कोई शिकायत नहीं करता। कुत्ता कहीं भी लेट सकता है। यह भी एक महान शिक्षा है। ये विधियाँ हैं दूसरों को भिन्न दृष्टि से देखना, जब वे आपके लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हों – उन्हें इच्छा-पूरक मणि के रूप में, अथवा अपने रुग्ण बालक अथवा गुरु के रूप में देखिये।

नकारात्मक परिस्थितियों को सकारात्मक रूप में परिवर्तित करना : हम अपने आपको किस रूप में देखते हैं  

दूसरों को विजय का दान

ऐसी भी विधियाँ हैं कि हम किस प्रकार अपने को भिन्न-रूप से देखें और इन स्थितियों में अपने प्रति अपना रवैया बदलें। पहली विधि है “अन्य लोगों को विजय प्रदान करके स्वयं पराजय स्वीकार करना।” दूसरे शब्दों में आत्म-पोषक मनोदृष्टि के साथ हम सदैव अपने विषय में सोचने के अभ्यस्त हो जाते हैं जैसे, “मुझे अवश्य जीतना है; बस मेरी बात चलेगी और दूसरे व्यक्ति को मेरे सामने झुकना ही होगा”; जबकि, यदि हम अपनी पराजय स्वीकार करते हैं तो फिर कोई बहस रहती ही नहीं। उदाहरण के लिए आप अपने मित्र या साथी के साथ हैं और आपको यह तय करना है कि किस रेस्टोरेंट में जाया जाए? यदि आपका मित्र किसी विशेष स्थान पर जाना चाहता है और आप किसी दूसरे पर जोर देते हैं तो फिर बहस पर बहस होती चली जायेगी, कोई अंत नहीं। परन्तु अंतत: उससे अंतर क्या पड़ता है? यदि आप मान जाते हैं और कहते हैं, “ठीक है, चलो तुम्हारे वाले रेस्टोरेंट में ही चलते हैं,” तो बहस वहीँ समाप्त हो जायेगी। दूसरे शब्दों में बहस तब समाप्त होगी जब हम दूसरे व्यक्ति को अपने से अधिक चाहेंगे और उन्हें जीतने का अवसर देंगे।

हम यहाँ आत्यंतिक स्थितियों की चर्चा नहीं कर रहे जिसमें दूसरा व्यक्ति कुछ बहुत ही नकारात्मक एवं विनाशकारी कृत्य कर रहा हो। परन्तु जहाँ वास्तव में कुछ बहुत गहरा अंतर न पड़ रहा हो, दूसरे को जीत का सेहरा पहनने दीजिये। निस्संदेह इस तरकीब पर किसी को आपत्ति हो सकती है यदि आप सदैव हार मान रहे हों और दूसरा उसका अनुचित लाभ उठा रहा हो। इसलिए स्पष्ट ही है कि आपको इतना संवेदनशील तो होना होगा कि इस पद्धति का कब प्रयोग किया जाए। परन्तु ऐसी बहुत सी स्थितियां हैं जिनमें किसी समस्या का सामना करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ विधि होगी।

मैं आपको अपने अनुभव से एक उदाहरण देता हूँ। मैं बर्लिन के एक प्रमुख रेस्टोरेंट बहुल जिले के एक व्यस्त नुक्कड़ पर रहता हूँ। मैं एक अपार्टमेंट वाले भवन के निचले तल में रहता हूँ। यहाँ एक शांत सराय हुआ करती थी परन्तु फिर उसके स्थान पर वहां एक अत्यंत लोकप्रिय स्पहानी रेस्टोरेंट खुल गया। यह रेस्टोरेंट प्रातः सात बजे से अगले दिन प्रात: तीन बजे तक सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है। जब मौसम गर्म होता है, तो वे हमारे भवन के दोनों ओर बाहर की ओर मेजें लगा लेते हैं। लोग बाहर बैठकर बियर या मदिरा पीते रहते हैं और प्रातः तीन बजे तक जोर-जोर से बोलते और हँसते रहते हैं। जब इन लोगों ने इस रेस्टोरेंट में बाहर की ओर मेजें लगाना आरम्भ किया जो कि मेरे शयनकक्ष की खिड़कियों के ठीक नीचे रखी रहती थीं तो मैं रात को लेटा रहता था और शोर के कारण सो नहीं पाता था। हताश क्रोध से भरा हुआ अपने ही विषय में सोचता रहता था। यह नहीं सोच पाता था कि वे कितना आनंद उठा रहे हैं। मेरे मन में भांति-भांति की कल्पनाएँ जन्म लेतीं। मैं कल्पना करता कि मैं किसी मध्यकालीन किले में हूँ और मेरे पास उबलते हुए तारकोल से भरा एक कुम्भ है जिसे उलटकर मैं नीचे बैठे लोगों पर गिरा रहा हूँ। परन्तु मैं उतना चिड़चिड़ा वृद्ध नहीं बन पाता था कि सदा चिल्लाकर कहता रहूँ, “इन लोगों से कहो कि शांत रहें, नहीं तो मैं पुलिस को बुला लूँगा!” इससे बात नहीं बनती।

अत: मैंने निर्णय किया कि इस समस्या से निपटने का एकमात्र रास्ता यही है कि मैं दूसरों को जीतने दूँ और स्वयं पराजय स्वीकार कर लूँ। उनके लिए गर्मियों की रातों का आनंद उठाना, मेरे अपने शयनकक्ष में सो पाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। मेरे मकान में रसोई ही एकमात्र वह कक्ष है जिसका मुंह सड़क की ओर नहीं है। मेरा रसोईघर बहुत बड़ा है जिसमें सुबह के नाश्ते वाले हिस्से के लिए एक ऊँचा चबूतरा बना हुआ है। वहां पर्याप्त खाली स्थान है। अत: गर्मियों के मौसम में मैं वहां सो जाता हूँ। दिन के समय मैं अपना गद्दा दीवार के सहारे खड़ा कर देता हूँ और रात के समय मैं उसे फर्श पर बिछाकर वहीँ रसोईघर में सो जाता हूँ। यहाँ बिलकुल शान्ति रहती है और सत्य यह है कि यह मेरे मकान का सबसे ठंडा कक्ष है।

मैं अपने रसोईघर में सोकर बहुत प्रसन्न रहता हूँ। मैंने उन्हें विजेता होने का अवसर प्रदान कर दिया और अब मेरे लिए कोई अंतर नहीं है कि वे कितना शोर मचा रहे हैं क्योंकि मुझे वह सब सुनाई ही नहीं दे रहा यह नव वर्ष के आगमन के दिनों के लिए बहुत अच्छा रहता है क्योंकि जर्मनवासियों को पटाखें बहुत पसंद हैं। सड़क से बहुत ही तेज़ शोर आता है परन्तु यदि मैं अपना रवैया बदल लूँ और अपने रसोई घर में सोकर उन्हें विजेता बना दूँ तो फिर कोई समस्या ही नहीं है।

मेरे साथ होने वाली नकारात्मक घटनाएँ मेरे नकारात्मक कर्मों से मुझे मुक्ति प्रदान कर रहीं हैं

एक दूसरी पद्धति यह है कि मेरे साथ जो भी नकारात्मक घटित हो रहा है उसे “नकारात्मक कर्मों से मेरी मुक्ति” के रूप में देखना। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम इसे दंड के रूप में स्वीकार करें अपितु हम यह सोचें कि यह जो विपत्ति है वह मेरे नकारात्मक कर्मों के बदले में एक छोटी विपत्ति के रूप में मुझे छुटकारा दिला रही हैं और इस प्रकार भविष्य में ये नकारात्मक कर्म परिपक्व होकर भविष्य में मेरे लिए किसी बड़ी विपत्ति का कारक नहीं बन रहे। एक छोटा सा उदाहरण : आप ट्रैफिक की भीड़ में फंसे हुए हैं और लम्बे समय तक वहां से टस से मस नहीं हो सकते। तो आप सोचते हैं “बहुत अच्छा हुआ! यह मेरे उन कर्मों से मुक्ति दिला रहा है जिनके कारण मैं पक्षाघात ग्रस्त हो सकता था और आगामी जीवन में हिलडुल भी नहीं पाता।” इस प्रकार हम इस बात को लेकर संतोष का अनुभव करते हैं कि ऐसी नकारात्मक बातें घटित हो रही हैं और भविष्य के लिए हमारा मार्ग निष्कंटक बना रही हैं।

परम्परावादी बौद्धधर्मी अनिष्टकारी प्रेतात्माओं में विश्वास रखते हैं। यदि हम उनके अस्तित्व को स्वीकार कर लें तो हम इस मनोदृष्टि परिवर्तन को एक कदम आगे बढ़ाकर उन अनिष्टकारी प्रेतात्माओं से अनुरोध कर सकते हैं “और अधिक अनिष्ट करो। करते जाओ।” मुझे हाल में ही इसका बहुत अच्छा अनुभव हुआ। जुलाई मास के लगभग मध्य से लेकर लगभग दो महीने तक सब कुछ गड़बड़ा गया। सबकुछ तहस-नहस हो रहा था। मेरी पीठ पर एक विचित्र रूप से कुछ उभर आया और मैं लगभग दो महीने तक फिटनेस क्लब नहीं जा पाया क्योंकि बाद में जाकर उस संक्रमण को साफ़ करना पड़ा। वह जो उभर आया था उसे काटना पड़ा। इसके पश्चात मेरे कंप्यूटर में भयानक वायरस आ गया, उसने हार्ड डिस्क को भी नष्ट कर दिया और इस प्रकार एक महीने तक मेरे पास अपना कंप्यूटर ही नहीं था। इसके बाद उसका प्रिंटर टूट गया; मेरे पास दो विडियो प्लयेर थे, वे दोनों टूट गए। मैं ज्योतिष शास्त्र से अत्यंत प्रभावित हूँ – कारण अज्ञात है। मैंने विभिन्न लोगों की जो जन्मपत्रियाँ एकत्रित कर रखीं थी वे सब उड़ गईं। वह जानकारी फिर से प्राप्त करना मेरे लिए असम्भव है। फिर मेरा चहेता प्याला टूट गया जिससे मैं हमेशा पीता था, और इसके पश्चात – इस सबके बीच – परम पावन दलाई लामा की शिक्षाओं का श्रवण करने मैं फ्रांस गया और वहां की एयरलाइन ने मेरा सामान खो दिया। बस यही होना शेष था। जब मेरा सामान गुम हो गया, मैं बस हंस दिया; यह सब कितना हास्यापद था। फिर मैंने विचार किया, “विनाशकारी प्रेतात्माओं कुछ और ले जाओ। अब मेरा अनिष्ट करने के लिए और क्या-क्या होगा?” इस प्रकार मैंने बेहतर अनुभव किया। बजाय इसके कि ऐसी बाधाओं को दूर रखने के लिए एक भावात्मक प्रतिरोध की दीवार खड़ी कर ली जाए, मैंने खुले मन से उन्हें स्वीकार किया और अधिक के स्वागत की तैयारी की।

मैंने अपनी एक दाढ़ में रूट कैनाल करवाया था और जबड़े की हड्डी का एक टुकड़ा कटवाने के लिए दन्त शल्य चिकित्सा करवानी पड़ी थी। अभी कुछ वर्ष पहले, उसी दाढ़ के नीचे जबड़े की हड्डी में एक संक्रमण हो गया। फ्रांस की यात्रा के तत्काल बाद मैं एक दन्त चिकित्सक के पास गया और उन्होंने मुझे यह सुखद समाचार दिया कि जहाँ चीरा लगा था वहां फिर से संक्रमण हो गया था और परिणामस्वरुप मुझे दूसरी दन्त शल्य चिकित्सा करवानी पड़ेगी ताकि हड्डी के उस हिस्से को काटा जाए। इस मनोदृष्टि के साथ मैं इस समाचार को सकारात्मक रूप दे सका, “वाह! वाह! मेरी वेबसाइट पर नए भाषा-विभाग को आरम्भ करने में आने वाली बाधाओं से यह मुझे मुक्ति दिला रहा है।”

बौद्धधर्मी शिक्षाओं के अनुसार, जितना अधिक सकारात्मक कार्य आप पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें विघ्न डालने के लिए उतनी ही अधिक बाधाएं आएँगी। अत: मैंने इन सब घटनाओं को एक अद्भुत स्थिति के रूप में देखा जो बाधाओं से मुक्ति दिला रही थीं और फिर मैंने अनिष्टकारी प्रेतात्माओं से कहा, “और बाधाएं उत्पन्न करो, उनसे मुझे लाद दो!”। ऐसा करके इस दौर में जबकि सबकुछ तहस-नहस हो रहा था मैं बिल्कुल भी दुखी नहीं हुआ। अत:, यदि आप वास्तव में चित्त साधना की पद्धति को लागू कर सकते हैं तो इससे बहुत लाभ होगा। बजाय इसके कि किसी स्थिति को इतनी कठिन, भयावह तथा निराशाजनक माना जाए, आप उसे देखने की मनोदृष्टि बदलकर उसे अद्भुत कल्पित कीजिये।

दूसरों को सुख देकर उनके कष्टों का वरण करना (तोंग्लेन)

जिस अंतिम विधि का मैं उल्लेख करना चाहता हूँ वह अत्यंत उन्नत एवं सर्वाधिक कठिन है। यह तोंग्लेन की अभ्यास साधना है, प्रदान करना और वरण करना। जब आप किसी कठिन स्थिति का सामना कर रहे होते हैं, उदाहरण के लिए दन्त पीड़ा, तो विधि यह है कि आप सोचिये, “काश सब अपनी दन्त पीड़ा से मुक्त हो जाएँ और वह परिपक्व होकर मुझ पर आ जाए। सबकी पीड़ा अपने ऊपर लेकर काश ऐसा हो कि किसी को पुन: दन्त पीड़ा न हो।” सबके प्रति अपने चित्त और ह्रदय के द्वार खोलकर और सहर्ष उनके कष्टों का वरण करके हम अपने उस विचार की जकड़न, भय और दुःख से मुक्त हो जाते हैं जिसमें हम बराबर केवल यही सोचते हैं “मैं बेचारा”। तोंग्लेन के साथ हम इससे भी आगे बढ़कर सोचते हैं मैं उनकी समस्त पीड़ा तथा कष्ट का निवारण करूंगा और फिर अपने चित्त की उच्चतम सुख की अवस्था को उन्हें प्रेषित करूँगा।”

यहाँ आपको बहुत सावधान रहना होगा कि आप किसी शहीद की मुद्रा न अपना लें, “मैं तुम्हारे कष्टों को भोगूँगा,” जो एक अर्थ में, स्फीत अहं की तुष्टि है। मुझे आत्म-स्वीकृति करनी चाहिए कि इस पद्धति मैं बहुत निपुण नहीं हूँ। इसे पूरी सदाशयता से करने के लिए अत्यधिक साहस अपेक्षित है परन्तु हाल ही में मैंने इसे आजमा कर देखा था।

मैंने उल्लेख किया है कि मेरे जबड़े की दूसरी शल्य चिकित्सा हुई। इसमें आप पूरे समय होश में होते हैं। यह बहुत ही हर्षदायक होता है। वे आपके मुंह के एकतरफ के पूरे मसूड़े को चीरकर खोल देते हैं फिर उसे नीचे की ओर खींचकर मोड़ देते हैं। इसके बाद ये एक बिजली की आरी जैसी चीज़ अन्दर ले जाकर जबड़े की हड्डी का टुकड़ा और दाढ़ की जड़ का थोडा सा ऊपरी हिस्सा तथा आस-पास के मॉस का एक टुकड़ा काट देते हैं। उनकी कार्य पद्धति वास्तव में बिल्कुल मध्यकालीन है। पहली बार जब मुझे यह करवाना पड़ा तो मुझे ये सब बहुत, बहुत दिलचस्प लगा। वास्तव में यह इतना पीड़ादायक नहीं था क्योंकि उनका एनेस्थीसिया(सुन्न करने की दवा) बहुत अच्छा था यद्यपि बीच में मुझे थोडा और लेना पड़ा परन्तु दूसरी बार यह करवाना पड़ा तो संक्रमण बहुत अधिक हो गया था और जब ऐसा रोग-संचार हो जाता है तो उस स्थान पर नोवाकेन विशेष प्रभावी नहीं होती अत: यह सब अत्यंत पीड़ादायक रहा।

मैंने महामुद्रा नामक विधि भी आजमा कर देखी – यह तो मात्र एक संवेदना है, यह कोई इतनी बड़ी बात तो नहीं है। चाहे आप अपने हाथ पर गुदगुदी करें या चुटकी भरें, या खुजाएं, या काट दें यह मात्र एक शारीरिक संवेदन है, इससे अधिक कुछ नहीं तो इस बात को इतना महत्त्व मत दीजिये। इससे कुछ सीमा तक सहायता मिली परन्तु तभी मुझे तोंग्लेन याद हो आया। यह वह समय था जब तिब्बतवासियों को अत्यधिक सताया जा रहा था तथा उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जा रहीं थीं। मैंने वहां लोगों द्वारा भुगती जाने वाली असह्य पीड़ा के बारे में सोचना आरम्भ किया और सोचा कि उसकी तुलना में जो मैं भुगत रहा हूँ – वह तो बहुत मामूली है। यह तो दो मिनट की बात है उसके बाद सब समाप्त हो जाएगा।

अत: यह सोचने के बजाय, “मैं बेचारा कितना कष्ट भुगत रहा हूँ।” मैंने अपने मनोदृष्टि का विस्तार किया और तिब्बत के लोगों के बारे में सोचना आरम्भ कर दिया “वे जितने कष्ट उठा रहे हैं वह मेरी इस छोटी सी पीड़ा से कहीं अधिक है,” और इस प्रकार मुझे अपनी पीड़ा के विषय में एक भिन्न परिप्रेक्ष्य मिल गया। इसके आगे मैंने सोचा, “काश उन सबकी पीड़ा मेरे इस जबड़े की पीड़ा में विलय हो जाए और मैं शांत और सुखी बना रहूँ और अपने चित्त की शान्ति उन्हें प्रेषित कर सकूँ।”

यद्यपि निश्चित रूप से मैं 100% उचित रीति से तो नहीं कर पाया परन्तु उस स्थिति का सामना करने में इससे बहुत सहायता मिली। यदि आप इसे उचित रीति से करें तो आप वास्तव में उनकी पीड़ा अनुभव करना चाहते हैं और इस तरह अपनी पीड़ा को बढ़ाकर बदतर कर लेते हैं। ईमानदारी से कहा जाए तो यह सदाशयता से कर पाना अत्यंत उन्नत स्तर है। आप इसे शब्दों में कह सकते हैं परन्तु वास्तव में इसका कोई अर्थ नहीं होता। वास्तव में ऐसा घटित होने की इच्छा कर पाना बिल्कुल अलग बात है। परन्तु दूसरे के कष्टों को कुछ सीमा तक अपने में सोख लेने की अनुभूति कि आपका कष्ट उनके कष्ट के बराबर हो जाए – या कम से कम उस स्तर तक जितना आप कर सकते हैं।

इसे भ्रान्तिवश मूल नहीं समझ लेना चाहिए। मूल पद्धति अधिक उग्र है क्योंकि जिस चित्तावस्था को आप यहाँ विकसित कर रहे हैं, जिसका आप प्रयोग कर रहे हैं उसमें पीड़ा से लड़ने के बजाय आप उसे स्वेच्छा से स्वीकार कर रहे हैं इस आत्मविश्वास के साथ कि आप इसे सह सकते हैं। यदि आप इसे सबकी पीड़ा के विस्तृत स्तर पर कर सकते हैं, तो उस स्थिति में निस्संदेह आप में इतना आत्मविश्वास है कि आप अपनी पीड़ा को सह सकें, उससे जूझे नहीं और उससे परेशान न हों। अत: यह कोई जादुई पद्धति नहीं है यदि आप इसका विश्लेषण करें तो यह अत्यंत अर्थवान है।

सारांश

इस प्रकार चित्त साधना, लोजोंग की ये कुछ पद्धतियाँ हैं ताकि आत्म-पोषण पर विजय पाकर प्रधान रूप से दूसरों के प्रति फिक्रमंदी का भाव हो। हमारी प्रेरणा का स्तर चाहे कुछ भी हो, मनोदृष्टि में ऐसा परिवर्तन अत्यंत सहायक होता है। इससे उद्भूत आत्म-रूपांतरण से यह सोचने की क्षमता अर्जित होती है, “चाहे कोई भी विषम, कठिन स्थितियां उत्पन्न क्यों न हों मैं कभी भी अपने को ‘बेचारा मैं’ कहकर अपनी क्षति नहीं होने दूंगा। मैं कभी निराशा के वशीभूत नहीं होऊंगा।” इसके स्थान पर हम जीवन के प्रति एक सामान्य रवैया विकसित करेंगे कि “चाहे कुछ भी हो जाए, मैं उसे रूपांतरित कर सकता हूँ। मैं उसे दूसरों की फिक्रमंदी के लिए विकसित कर सकता हूँ। यह बाधा नही बन पाएगी।” इस प्रकार की मनोदृष्टि आपको जीवन में अपार साहस प्रदान करती है।

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