जीवन के विभिन्न पहलुओं को आपस में कैसे मिलाएं

परिचय

परम पावन दलाई लामा कहते हैं कि बौद्ध धर्म के तीन पहलू हैं:

  • बौद्ध मनोविज्ञान और विज्ञान – चित्त किस तरह काम करता है, और ब्रह्मांडविज्ञान किस तरह संचालित होता है
  • बौद्ध दर्शन – तर्कशास्त्र की एक उन्नत व्यवस्था और यथार्थ, कारण तथा प्रभाव और लौकिक व्यवहार का एक गहन विश्लेषण
  • बौद्ध धर्म – विगत और भविष्य के जन्मों, अनुष्ठानों, पाठ-पूजा आदि के संदर्भ में आत्मविकास की विभिन्न विधियाँ।

उनका यह भी मत है कि बौद्ध विज्ञान और दर्शन, जो बौद्ध धर्म से बिल्कुल अलग हैं, दुनिया को बहुत कुछ दे सकते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने “जीवन के विभिन्न पहलुओं को आपस में कैसे मिलाएं” के नाम से एक अभ्यास साधना विकसित की थी जोकि बौद्ध विज्ञान और दर्शन का मिश्रित रूप है। इसका उपयोग व्यक्तिगत तौर पर या समूह के रूप में चिकित्सा विधान के लिए किया जा सकता है, लेकिन यह उपयोग केवल उन लोगों तक सीमित न तो है और न होना चाहिए जो भावनात्मक समस्याओं से जूझ रहे हों; यह सभी के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

पाश्चात्य मनोविज्ञान और अहम्

मनोविज्ञान में हम स्वस्थ अहम् और स्फीत अहम् का उल्लेख करते हैं, और मैं मानता हूँ कि सभी इस बात से सहमत होंगे कि रोज़मर्रा के जीवन की कठिनाइयों और यथार्थ का मुकाबला करने के लिए स्वस्थ अहम् बहुत महत्वपूर्ण है। स्वस्थ अहम् होने का मतलब है कि हम स्वयं अपने प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं (और इसलिए दूसरों के प्रति भी वैसा ही दृष्टिकोण रखते हैं), आत्मविश्वास के भाव और इस क्षमता से परिपूर्ण होते हैं कि जीवन में जो भी हो, हम उसका मुकाबला कर सकते हैं। स्फीत या अस्वस्थ अहम् का मतलब होता है कि हम ऐसा मानते हैं कि हम स्वयं दूसरे सभी लोगों से अधिक महत्वपूर्ण हैं, हम हमेशा सही होते हैं और इसलिए हमेशा सब कुछ हमारी मर्ज़ी से होना चाहिए। स्वाभाविक है कि इसके कारण समस्याएं और टकराव उत्पन्न होते हैं क्योंकि अहम् का यह भाव यथार्थपरक नहीं है। अहम् के बारे में दूसरे और भी ऐसे दूषित दृष्टिकोण हैं जो स्फीत अहम् की श्रेणी में नहीं आते हैं, जैसे स्वयं के बारे में नकारात्मक सोच रखना, लेकिन ये भी जीवन की परिस्थितियों का सामना करते समय बड़ी समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं।

बौद्ध धर्म और अहम्

बौद्ध धर्म में अहम् के बारे में व्यापक रूप से चर्चा की गई है, लेकिन सामान्यतया हम इसके लिए अहम् शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं क्योंकि अलग-अलग दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक पद्धतियों में इसे विशिष्ट ढंग से परिभाषित किया गया है और ये परिभाषाएं बौद्ध दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती हैं।

बौद्ध धर्म में पारम्परिक अहम् और मिथ्या अहम् का उल्लेख किया जाता है। यदि हमारा अहम् स्वस्थ हो तो बौद्ध धर्म इसे इस प्रकार से देखेगा कि हम अपने आपको “पारम्परिक मैं” की दृष्टि से देखते हैं। यदि हमारा अहम् अस्वास्थ्यकर हो या आत्म-सम्मान के भाव का अभाव हो, तो हम स्वयं को “मिथ्या मैं” की दृष्टि से देखते हैं।

बौद्ध धर्म में हम अहम् को अपनी अनुभूति, जिसके कई अवयव होते हैं, को विखंडित करके समझते हैं:

  • इंद्रिय अनुभूति – प्रत्येक क्षण हम कोई न कोई दृश्य देखते हैं, ध्वनि सुनते हैं, किसी भौतिक संवेदना आदि को अनुभव करते हैं।
  • मूलभूत मानसिक कारक – हर समय कुछ हद तक हमारा ध्यान बना रहता है, एकाग्रता, रुचि, थकान आदि बने रहते हैं।
  • मनोभाव – प्रत्येक क्षण के साथ विभिन्न प्रकार के मनोभाव जुड़े होते हैं। ये मनोभाव सकारात्मक हो सकते हैं जैसे प्रेम, धैर्य और करुणा या फिर नकारात्मक हो सकते हैं जैसे क्रोध, लोभ और ईर्ष्या।
  • बोध – हमें हमेशा कुछ न कुछ हद तक सुख या दुख का बोध बना ही रहता है। हो सकता है कि यह बोध बहुत प्रबल न हो, लेकिन बोध तो हमेशा बना ही रहता है।
  • अप्रतिरोध्यता – हममें से बहुत से लोगों को किसी विशेष प्रकार से व्यवहार करने या वचन कहने की एक अप्रतिरोध्यता की अनुभूति होती है, जिसके बारे में हो सकता है कि हमें ऐसा लगता हो कि हम उसे ध्यानपूर्वक नियंत्रित करते हैं, लेकिन यह अप्रतिरोध्यता हमारी आदतों, हमारे लालन-पालन, पर्यावरण आदि में ढली होती है।

ये सभी अवयव एक ही समय पर अलग-अलग ढंग से बदलते रहते हैं, और हमारे क्षण-प्रतिक्षण की आत्मपरक अनुभूति का निर्माण करते हैं। यह सातत्य हमारे जन्म से शुरू होकर मृत्यु पर्यन्त चलता रहता है।

हमें इसकी अनुभूति किस प्रकार होती है? हममें से प्रत्येक इसे “मैं” की दृष्टि से अनुभव करता है। इस सतत-परिवर्तन के दृष्टिगत हम एक “मैं” गढ़ लेते हैं जिसका विश्लेषण करना बहुत दिलचस्प है। क्या इस “मैं” में कुछ ऐसा है जो सदैव अपरिवर्तनीय हो? आप शिशु के रूप में अपने किसी चित्र को देखते हैं और कहते हैं, “यह मैं हूँ,” और फिर किसी किशोर के रूप में अपने चित्र को देखकर कहते हैं “यह मैं हूँ,” और फिर वयस्क के रूप में अपने चित्र को देखकर कहते हैं, “यह भी मैं ही हूँ।“ इस “मैं” की दृष्टि से हम किसे पहचान रहे होते हैं? वास्तव में इन चित्रों में ऐसा कोई मूर्तिमान “मैं” नहीं है जिसे हम पहचान रहे होते हैं, लेकिन फिर भी वह मैं ही हूँ, आप नहीं हैं। इस प्रकार हम अपनी अनुभूति के एक लम्बे सातत्य, एक पूरे जीवन पर इस “मैं” को आरोपित कर लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम 365 दिनों के सातत्य पर एक वर्ष की धारणा को आरोपित कर लेते हैं।

यदि हम प्रत्येक क्षण के प्रवाह के इस विचार की दृष्टि से देखें, “इस समय में यह कर रहा हूँ। अब मैं वह कर रहा हूँ। अब मुझे यह अनुभूति हो रही है। अब मुझे वह अनुभूति हो रही है,” तो इसे हम पारम्परिक “मैं” कहेंगे। इसके आधार पर हम अहम् का एक स्वस्थ बोध विकसित कर सकते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम एक अपरिवर्तनीय “मैं” की अवधारणा को विकसित कर लेते हैं और जीवन भर के अनुभवों में से किसी एक चित्र को अपनी पहचान मान लेते हैं। यह ऐसा है जैसे हम जीवनभर के चलचित्र को कहीं रोक लेते हैं और उसके किसी एक फ्रेम या छोटे हिस्से को अपनी पहचान के रूप में देखते हैं, जहाँ फ्रेम कभी-कभी बीच में बदलता है।

सामान्य भाषा में कहें तो हम अपने बारे में कोई एक पहचान निश्चित कर लेते हैं। यह छवि ऐसी हो सकती है, “मैं एक बलिष्ठ, आकर्षक शरीर वाला युवा व्यक्ति हूँ,” जोकि हमेशा हमारी वास्तविक अनुभूति के अनुरूप नहीं हो सकता है, जिसके कारण असंतोष उत्पन्न होता है। हम अपने आपको दर्पण में देखते हैं या अपना वज़न तोलते हैं और सोचते हैं, “यह तो मैं नहीं हूँ। मेरा वज़न इतना अधिक नहीं हो सकता है।“ या फिर हम अपनी पहचान अपनी विद्वता, या धन-दौलत, या पेशे के रूप में भी गढ़ सकते हैं; यह सूची लम्बी होती चली जाती है।

इसका एक अच्छा उदाहरण यह है कि हम किसी के साथ किसी सम्बंध में होते हैं, और अक्सर उस जोड़े के एक सदस्य के रूप में अपनी पहचान गढ़ लेते हैं। यह तो हमारे जीवन के चलचित्र का केवल एक दृश्य है। लेकिन तभी दूसरा व्यक्ति हमसे सम्बंध तोड़ लेता है हम गहरी पीड़ा में डूब जाते हैं क्योंकि अभी भी जोड़े का एक सदस्य होने वाली अपनी पहचान से चिपके हुए होते हैं, जबकि वैसा होता नहीं है। इस स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका यह है कि सम्बंध विच्छेद के बाद हम अधिक से अधिक अनुभवों से गुज़रें ताकि हमें अपने “मैं” के बोध को आरोपित करने के लिए कोई और अवलंब मिल सके। “अब मैं यह हूँ।“ जब तक हमें सम्बंध विच्छेद के बाद ऐसे पर्याप्त नए अनुभव नहीं होंगे जिन्हें हम “मैं” और “मेरा जीवन” की दृष्टि से देख सकें, तब तक हम अपने आपको उस जोड़े के सदस्य के रूप में देखने की आदत में ही फंसे रहेंगे।

“मैं” को आरोपित करने के आधार का विस्तार करने का यह तरीका स्वयं हमारे लिए तो उपयोगी है ही, इससे दूसरों को भी लाभ होता है। हम यह सोचने लगते हैं कि यदि किसी मित्र या प्रेमी व्यक्ति के साथ हमारे घनिष्ठ सम्बंध हैं, कि उसके जीवन में हमारे अलावा कोई दूसरा व्यक्ति शामिल नहीं है और इसलिए उस व्यक्ति को हमारे लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए, और हम इस तथ्य को भुला देते हैं कि उसके दूसरे मित्र भी है और उसके जीवन में दूसरी बाते  भी घटित हो रही हैं। इसलिए जब वह व्यक्ति हमें कॉल नहीं करता है तो हम सीधे इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच जाते हैं कि उसे हमसे प्रेम नहीं रहा, बल्कि इस बात को समझते हैं कि उस व्यक्ति के जीवन में दूसरी बातें भी घटित हो रही होंगी। हम केवल “मैं” के साथ उनके सम्बंध के स्थान पर, और केवल कॉल न करने की इस अकेली घटना के स्थान पर उनके साथ अपने सम्बंध के आधार का विस्तार करते हैं, और उस व्यक्ति के जीवन में शामिल प्रत्येक घटना और प्रत्येक व्यक्ति को भी उसमें शामिल करते हैं।

इस स्थिति में अपनी सहायता के लिए हम एक बौद्ध तर्क के आधार पर विश्लेषण का भी प्रयोग कर सकते हैं। “मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है” और “मेरा मित्र मुझे प्रेम नहीं करता है” इन दोनों समुच्चयों की व्याप्ति कहाँ तक है?

  • ऐसा हो सकता है कि मेरा मित्र मुझे कॉल करता है और वह मुझसे प्रेम करता है।
  • या, मेरा मित्र मुझे कॉल करता है और वह मुझसे प्रेम नहीं करता है।
  • या ऐसा हो सकता है कि मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है और मुझसे प्रेम नहीं करता है।
  • या मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है, लेकिन फिर भी वह मुझसे प्रेम करता है।

इसलिए यदि मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है, तब भी यह सम्भावना है कि मेरा मित्र मुझसे फिर भी प्रेम करता है। इसके बाद हम विश्लेषण करते हैं कि मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है? मेरा मित्र मुझे प्रेम नहीं करता है, इसके अलावा इसका कोई दूसरा कारण भी हो सकता है। हो सकता है कि वह व्यस्त हो। हो सकता है कि उसका फोन काम न कर रहा हो। हो सकता है कि उसके सैल-फोन की बैटरी चार्ज न हुई हो। कॉल न करने के बहुत से कारण हो सकते हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना तर्कविरुद्ध है कि मेरा मित्र मुझसे प्रेम नहीं करता है। केवल इस बात से कि मेरा मित्र मुझे कॉल नहीं करता है, यह सिद्ध नहीं हो जाता है कि मेरा मित्र मुझसे प्रेम नहीं करता है। यह एक अमान्य विचार है। यही बौद्ध तर्क शास्त्र है।

“मैं” का एक गुणकारी बोध विकसित करना

एक स्वस्थ अहम् या “मैं” का गुणकारी बोध विकसित करने के लिए हमें वर्तमान की दृष्टि से “मैं” को आरोपित करने की योग्यता हासिल करनी होगी, और विगत की स्मृतियों या भविष्य के स्वप्नों में फंसे रहने से बचना होगा। यही सामान्य सिद्धांत है। इसके लिए प्रयुक्त तकनीकी अभिव्यक्तियाँ हैं “अहम्” और “अहम को आरोपित करने का आधार”। हमारे अनुभव के क्षण इसका आधार हैं।

यदि हम अपने अभी तक के जीवन के पूरे सातत्य को देखें तो उस अवधि के दौरान हमें अनेक प्रकार के अनुभव हुए हैं और हम अपने साथ घटित हुई हर घटना से प्रभावित हुए हैं, भले ही हमें उसका स्मरण हो या न हो। इसका यह मतलब है कि हम अपने परिवार के सभी सदस्यों और मित्रों, अपने विद्यार्थी जीवन, अपने शिक्षकों और हमने जो कुछ भी सीखा है, उन सब चीज़ों ने हमें प्रभावित किया है। हमने जहाँ-जहाँ भी काम किया है उन सभी रोज़गारों ने भी हमें प्रभावित किया है। हमने मीडिया और मनोरंजन के जो भी साधन देखे हैं, उन सभी ने हमें प्रभावित किया है। हम जिन-जिन जगहों पर रहे हैं या जहाँ-जहाँ हमने यात्रा की है, उन सभी स्थानों ने हमें प्रभावित किया है। हमारा जीवन – हर किसी का जीवन – ऐसे अनुभवों और प्रभावों से भरा पड़ा है जो हमारी वर्तमान अनुभूति को प्रभावित करते हैं: हम किस तरह सोचते हैं, बर्ताव करते हैं, और बोलते हैं। यह सब एक प्रभाव छोड़ता है, हो सकता है कि हर समय उसका पूरा प्रभाव पड़ता हो, लेकिन हमारी अनुभूतियों का पूरा विस्तार एकजुट होकर हमारे वर्तमान को आकार देता है।

समस्या का एक प्रमुख कारण तब उत्पन्न होता है जब हमें उन सभी प्रभावों का बोध नहीं होता है जो हमारे विचारों, बोलचाल और व्यवहार को प्रभावित करते हैं, या जब हम बाकी के सभी प्रभावों को भुलाकर किसी एक प्रभाव को ही अपनी पहचान मानने के प्रति आग्रही हो जाते हैं। कुछ ऐसे अचेतन मन के प्रभाव भी होते हैं जिन्हें हम स्वीकार ही नहीं करते, और कुछ ऐसे प्रभाव होते हैं जिन्हें हम जानबूझकर अस्वीकार करते हैं।

अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को आपस में जोड़ने की प्रक्रिया में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है, जहाँ हम अपने ऊपर पड़ने वाले सभी प्रभावों के प्रति सजग रहने का प्रयास करते हैं और उन्हें एक समग्र चित्र में करते हैं। ऐसा करते समय, जैसे-जैसे हमारे जीवन में और अधिक अनुभव घटित होते जाते हैं, “मैं” को आरोपित करने का हमारा आधार भी विस्तृत होता चला जाता है। हालाँकि जो कुछ घटित हो रहा होता है वह किसी एक विशेष क्षण में घटित हो रहा होता है, और हम उस क्षण पर “मैं” को आरोपित कर रहे होते हैं, किन्तु फिर भी उस क्षण में हमारे पूरे जीवन भर का प्रभाव मौजूद होता है।

मैं कुछ ऐसी उपचार विधियों के बारे में जानता हूँ जहाँ हम अपने ऊपर पड़े नकारात्मक प्रभावों, जैसे अपने माता-पिता से मिले प्रभावों को पहचानने का प्रयास करते हैं। हम अपनी माता से सीखी हुई आदतों की एक सूची बनाते हैं, और फिर अपने पिता से सीखी हुई आदतों की एक अलग सूची तैयार करते हैं और उनके प्रति सचेत रहने का प्रयास करते हैं। इसमें सामान्यतया नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, लेकिन कभी-कभी तटस्थ आदतों को भी इसमें शामिल किया जाता है जैसे मुझे अपने घर को साफ-सुथरा रखना पसंद है या मैं चीज़ों को फेंक देना पसंद करता हूँ या पसंद नहीं करता हूँ। मुझे किसी एक निश्चित समय पर खाना पसंद है। ये सब बातें तटस्थ हैं, हैं न?

लेकिन ये सब नकारात्मक और तटस्थ आदतें पूरे चित्र का एक हिस्सा मात्र हैं। अपने माता-पिता, परिवार के बाकी सदस्यों या मित्रों, छात्रजीवन, व्यवसाय आदि से सीखी हुई सकारात्मक आदतों के प्रति सचेत होना भी बहुत महत्वपूर्ण है।

लोगों में एक सहज प्रवृत्ति होती है कि वे निष्ठावान रहें: अपने परिवार के प्रति निष्ठावान, अपने व्यवसाय के प्रति, अपनी लिंग जाति के प्रति, और भी बहुत सी बातों के प्रति निष्ठावान रहें। होता यह है कि अनजाने में हम नकारात्मक पहलुओं के प्रति निष्ठावान होते हैं। इसलिए यदि हमारे माता-पिता हमसे यह कहते रहते हैं कि हम किसी काम के नहीं हैं तो हम निश्चित तौर पर इतना खराब व्यवहार करते हैं, ताकि एक प्रकार से हमें इस दृष्टि से स्वीकार कर लिया जाए कि हाँ, हम किसी काम के नहीं हैं। ऐसे नकारात्मक पहलुओं के प्रति निष्ठावान बने रहना उपयोगी नहीं होता है, है न? ठीक है, हम इन नकारात्मक प्रभावों को नकार नहीं सकते हैं, लेकिन उसके बारे में शिकायत करने से दरअसल कोई लाभ नहीं होता है। हालाँकि इसे स्वीकार किए जाने की आवश्यकता होती है, “ठीक है, मेरे भीतर ये सब नकारात्मक प्रभाव हैं,” लेकिन उन नकारात्मक प्रभावों के लिए माता-पिता या स्कूल या समाज को दोष देने से वास्तव में कोई लाभ नहीं होता है।

इस प्रकार हम इस बात को स्वीकार करने और समझने का प्रयास करते हैं। लेकिन इसके बाद क्या? यह महत्वपूर्ण होता है कि हम इन्हें बढ़ाचढ़ा कर न देखें और उनके विचारों में ही न डूबे रहें। हम यह देख पाते हैं कि हमारे ऊपर नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं और यह समझ पाते हैं कि हम स्वयं इन्हें आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं। बल्कि हमें विरासत में मिले हुए सकारात्मक पहलुओं पर बल देना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो स्वतः ही हमारा दृष्टिकोण बहुत सकारात्मक हो जाएगा, हम दूसरों को दोष देने के बजाए उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखेंगे। यदि हम ऐसा सोचेंगे कि हमारे माता-पिता नाकारा थे, तो फिर नाकार माता-पिता किसे जन्म देंगे? नाकारा संतान को! भले ही ऐसा अनजाने में होता हो, लेकिन अधिकांशतः हम ऐसा ही सोचेंगे, जिसके कारण आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के अभाव सम्बंधी अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

हाँ, इसके अपवाद भी हो सकते हैं – ऐसे लोग जो इन सब बातों से ऊपर उठ जाते हैं। लेकिन मैं यहाँ सामान्यतया उत्पन्न होने वाली स्थिति की चर्चा कर रहा हूँ। यदि हम अपने माता-पिता, स्कूल, और समाज से विरासत में मिली आदतों के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएंगे तो इससे हम स्वयं अपने प्रति एक अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करेंगे, जो आत्मविश्वास जगाने वाला होगा। इस “मैं” को स्फीत करके जब तक कि हम “मैं कितने कमाल का व्यक्ति हूँ” में न बदल दें और इसे व्यावहारिक सीमा में रखें तो ऐसा अहम् एक स्वस्थ अहम् होगा, आत्म का एक स्वस्थ बोध होगा।

अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को एकाकार करना

स्वयं के प्रति सम्मान का यह भाव एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। हम विभिन्न पहलुओं, विशेष कर सकारात्मक पहलुओं को अपने जीवन में समाहित करके इस भाव, और आत्मविश्वास को विकसित करना सीख सकते हैं।

एक-एक पहलू के बारे में अलग-अलग विचार करना

एक आसान तरीका यह है कि हमें प्रभावित करने वाले विभिन्न पहलुओं पर एक-एक करके विचार किया जाए:

  • हमारे परिवार का प्रत्येक सदस्य, और बचपन से लेकर वर्तमान समय तक के हमारे सभी मित्रों में से प्रत्येक
  • वह मूल देश या क्षेत्र जहाँ के हम रहने वाले हों, और वह संस्कृति और धर्म (या धर्म का अभाव) जिसमें हम पले बढ़े हों
  • वे विषय-क्षेत्र जिनका हमने अपने जीवन में अध्ययन किया हो, और वे खेल आदि जिन्हें हमने खेला हो
  • हमारे शिक्षकगण, जिनसे हमने अपने जीवन की कोई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक या गैर आध्यात्मिक चीज़ें सीखी हों
  • हमारे विभिन्न पार्टनर जिनके साथ हमारा सम्बंध रहा हो, और हमारे बच्चे, यदि हों
  • हमारे जीवन में घटी महत्वपूर्ण घटनाएं, जैसे कोई दुर्घटना या गम्भीर बीमारी या लॉटरी का जीतना
  • विभिन्न व्यवसाय और स्थान जहाँ हमने काम किया हो, और हमारे सहकर्मी
  • हमारी आर्थिक स्थिति, अच्छी या खराब

हमारे जीवनकाल में हमारे अनुभवों का निर्माण करने वाले और हमारी वर्तमान स्थिति तथा परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को प्रभावित करने वाले तत्वों की एक लम्बी सूची हो सकती है।

हम इनमें से प्रत्येक को एक-एक करके लेते हैं और पहले नकारात्मक प्रभावों के बारे में विचार करते हैं। यह महत्वपूर्ण होता है कि नकारात्मक प्रभावों को अनदेखा न किया जाए। लेकिन बाद में हम इस बात को समझते हुए उन्हें छोड़ देते हैं कि इनके बारे में शिकायत करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उससे कोई लाभ नहीं होने वाला है। इसके बाद हम हासिल की गई सकारात्मक चीज़ों के बारे में विचार करते हैं और इस बात को समझते हुए कि ये हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं, हम निश्चय करते हैं कि अनजाने में नकारात्मक पहलुओं के प्रति निष्ठावान बने रहने के बजाए हम इन सकारात्मक पहलुओं के प्रति निष्ठावान रहेंगे।

पहले चित्त को शांत करें

ऐसा करने से पहले अपने चित्त को शांत कर लेना अच्छा रहता है ताकि हम बुद्धिमत्तापूर्वक इन चीज़ों के बारे में विचार कर सकें। हमें उत्पन्न होने वाले बाध्यकारी विचारों, विशेष तौर पर नकारात्मक विचारों का त्याग करने का अभ्यास करना होगा। जब हम ऐसी नकारात्मक चीज़ों के बारे में विचार करते हैं जिन्होंने हमें प्रभावित किया हो, तो हम उन्हीं में उलझकर रह जाते हैं – “वह स्थिति कितनी भयावह थी। वह व्यक्ति कितना बुरा था। उन्होंने मुझे बहुत पीड़ा पहुँचाई” – और हम भीतर ही भीतर ऐसे बाध्यकारी संवादों को दोहराते चले जाते हैं। इसे शांत करना आवश्यक होता है ताकि हम सकारात्मक चीज़ों पर अपने ध्यान को केंद्रित कर सकें।

इसके लिए बौद्ध साधना में बहुत सी विधियाँ सुझाई गई हैं, लेकिन उनमें से सबसे आसान विधि को हम “स्वयं को मुक्त करने” की विधि कह सकते हैं। आप अपनी मुट्ठी में अपने हाथ को पकड़ते हैं और फिर मुट्ठी को खोलकर हाथ को मुक्त कर देते हैं। ऐसा करते समय आप अपने मन में भी एक ऐसी ही प्रक्रिया करते हैं, यहाँ हम कल्पना करते हैं कि हमारा चित्त मुट्ठी के समान है जो किसी बाध्यकारी विचार को कसकर पकड़े हुए है, जिसे आप ढीला करते हैं और स्वयं को उस विचार से मुक्त कर लेते हैं। हाँ, वह अशांतकारी विचार तुरन्त ही हमारे चित्त में लौट कर आ सकता है, इसलिए आपको इस प्रक्रिया को दोहराते रहने की आवश्यकता होगी।

एक अन्य विधि है जिसमें हम अपने चित्त को – अपने विचारों और मनोभावों के विभिन्न पहलुओं को – एक विशाल सागर के रूप में देखते हैं। इसमें नकारात्मक विचार सतह की तूफानी लहरों के समान होते हैं, किन्तु हम तो पूरा सागर हैं, और सतह की लहरें उसकी गहराइयों को अशांत नहीं कर सकती हैं। हम सागर की सतह पर लहरों के थपेड़ों में फंसी किसी नौका जैसे नहीं बनना चाहते हैं, लेकिन साथ ही हम गहराई में छिप कर लहरों से बचने का प्रयास करती हुई कोई पनडुब्बी भी नहीं बनना चाहते हैं। यह सोचते हुए कि ये विचार पूरे सागर का एक छोटा सा हिस्सा हैं, हम अपने चित्त को शांत कर सकते हैं।

सुखी होने की कामना को पुनः पुष्ट करना

हमारा अगला विचार यह होना चाहिए कि “मैं सुखी होना चाहता हूँ। सभी सुखी होना चाहते हैं, और कोई भी दुख नहीं चाहता है। दूसरे सभी लोगों की ही भांति मेरी भी अपनी भावनाएं और मनोभाव हैं। जिस प्रकार यह बात मुझे प्रभावित करती है कि दूसरे मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी स्वयं अपने साथ जैसा व्यवहार करता हूँ वह मेरे भावों को प्रभावित करता है। इसलिए आत्मविनाशकारी होने से क्या लाभ? ऐसा नहीं है कि मैं बुरा हूँ और इसलिए मुझे स्वयं को दंडित करना चाहिए। यह तो मूर्खतापूर्ण है। ऐसा करने से स्वयं मेरे अलावा और किसे कष्ट होगा? ऐसा करने से कोई लाभ नहीं है। यदि मैं सुखी होना चाहता हूँ तो मुझे सकारात्मक व्यवहार करना होगा और उससे सुख की उत्पत्ति होगी।“

यह विचार कि “हर कोई सुख चाहता है, कोई भी दुख नहीं चाहता” बौद्ध शिक्षाओं का आधारभूत सिद्धांत है। यदि आप इसके बारे में सोच कर देखें तो यह बात सही है। बौद्ध ग्रंथों में दी गई परिभाषा के अनुसार “सुख एक ऐसी अनुभूति है जिसके घटित होने पर आप उससे अलग नहीं होना चाहते हैं, और चाहते हैं कि वह अनुभूति बनी रहे।“ वहीं “दुख वह अनुभूति है जिसका अनुभव होने पर आप उससे अलग होना चाहते हैं, और आप चाहते हैं कि वह खत्म हो जाए।“ उत्तरजीविता की सहज प्रवृत्ति, स्वयं को कायम रखने की प्रवृत्ति, प्रजातियों के संरक्षण का पूरा सिद्धांत इसी पर आधारित है। आप किसके कायम रहने की कामना करते हैं? आप सुखी बने रहने की कामना करते हैं, और यह तथ्य कि आप कायम रहने की कामना करते हैं इस बात का प्रमाण है कि आप सुख चाहते हैं, क्योंकि कायम रहना ही सुख है। इसलिए इसे जीवविज्ञान के बुनियादी सिद्धांत के तौर पर स्वीकार किया गया है।

यह बहुत दिलचस्प है। हो सकता है कि आप स्वयं को दंडित करना चाहते हों और स्वयं को दुख देना चाहते हों, और इसलिए आप अपने हाथ को आग में जलाते हैं। लेकिन आपकी सहज प्रवृत्ति होगी कि आप अपने हाथ को आग से बाहर निकाल लें और इस प्रवृत्ति पर विजय पाने के लिए आपको बहुत अधिक प्रयास करना होगा, जोकि यह दर्शाता है कि हमारी यह सहज प्रवृत्ति है कि हम दुख नहीं चाहते हैं, हम सुख चाहते हैं।

इसलिए हम सराहनापूर्वक और कृतज्ञता के भाव से उन सकारात्मक चीज़ों के बारे में विचार करते हैं जो हमें किसी से भी प्राप्त हुई हों। यदि वह व्यक्ति हमारे जीवन से जुड़ा हुआ हो तो यह विचार इस दृष्टि से हो सकता है कि उस व्यक्ति ने हमारे साथ कैसा व्यवहार किया है, जैसे हमारे माता-पिता ने हमारा लालन-पालन किया है, या हमारे शिक्षक हो सकते हैं जिन्होंने हमें कोई बहुत उपयोगी शिक्षा दी हो। हम केवल दूसरों में ही अच्छे गुणों को तलाश नहीं करते हैं, बल्कि यह भी देखते हैं कि स्वयं हमारे भीतर वे गुण हैं या नहीं।

पीले प्रकाश के रूप में सकारात्मक प्रभाव के हमारे भीतर प्रवेश करने की कल्पना करना

जब हम इस प्रक्रिया को कर रहे हों तब किसी व्यक्ति के चित्र को साथ रखना उपयोगी रहता है, या फिर हम उस व्यक्ति की कल्पना भी कर सकते हैं। इसमें हम एक बौद्ध मानसचित्रण की प्रक्रिया को अपना सकते हैं जहाँ हम उस व्यक्ति से निकलते हुए एक पीले प्रकाश की कल्पना करते हैं जो हमारे भीतर प्रवेश कर रहा होता है और हमें प्रेरित करता है कि हम उन सद्गुणों को और अधिक विकसित करें। किसी विशेष प्रकार की चित्तावस्था को विकसित करने में सहायता करने की दृष्टि से मानसचित्रण सचमुच बहुत उपयोगी रहता है।

इस प्रक्रिया में और आगे बढ़ते हुए आप कल्पना करते हैं कि आप में से पीला प्रकाश निःसृत हो रहा है जो दूसरों को, आपके बच्चों को, मित्रों, सहकर्मियों, या यदि आप और अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहेँ तो पूरी दुनिया को प्रेरित कर रहा है कि वे भी विकसित हों।

इन सभी प्रभावों को एकीकृत करना

एक बार जब हम प्रत्येक प्रकार के प्रभावों के साथ इस प्रक्रिया को पूरा कर लेते हैं तो फिर हम उन्हें एक साथ मिलाने के लिए उनका समग्र एकीकरण करते हैं। हम अपनी माता और पिता दोनों के प्रभाव को आपस में जोड़ देते हैं। अपने भाइयों और बहनों, अपने मित्रों, अपने स्कूल आदि के मामले में भी हम ऐसा ही करते हैं। हमने स्कूल में गणित की शिक्षा हासिल करके कौन सी सकारात्मक चीज़ें सीखीं? हो सकता है कि हम अपने मौजूदा व्यवसाय में उसका प्रयोग भी न करते हों, लेकिन क्या उससे मुझे अपने जीवन में कोई लाभ पहुँचा है? हमें इस भावना से मुक्त होना चाहिए कि हमारे जीवन में कुछ भी ऐसा है जिसे समय की बर्बादी कहा जा सके। किसी भी चीज़ पर समय बर्बाद नहीं हुआ है क्योंकि सब कुछ ऐसा था जो हमें फायदा पहुँचा सकता था। यहाँ तक कि हमारे जीवन में आने वाली सबसे मुश्किल परिस्थितियाँ भी हमें यह सबक दे सकती हैं कि हम स्वयं को विकसित कर सकें और हमें दूसरी कठिनाइयों की शक्ति दे सकती हैं। किसी भी चीज़ से हम यह सकारात्मक बात सीख सकते हैं।

इस साधना का उद्देश्य है कि हम स्वयं के बारे में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाएं जो “मैं” को आरोपित करने और उसके बारे में विचार करने के व्यापक आधार पर टिका हो। इस आधार पर हम समझ पाते हैं कि भले ही नकारात्मक चीज़ों ने हमें प्रभावित किया हो, लेकिन हमें इन चीज़ों को महत्व नहीं देना है। हम ध्यानपूर्वक निश्चय करते हैं कि हम सकारात्मक बातों पर ही अपने ध्यान को केंद्रित करेंगे।

सूची तैयार करना

थोड़ा सुव्यवस्थित होना बेहतर रहता है, इसके लिए आप अभ्यास में आगे बढ़ते हुए एक सूची तैयार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए,

  • ये वे सकारात्मक चीज़ें हैं जो मुझे अपनी माँ से विरासत में मिली हैं; ये चीज़ें मैंने अपने पिता से सीखी हैं।
  • जब मैं बड़ा हो रहा था – आप में से उन लोगों के लिए जो काफी बड़े हो चुके हैं – उन दिनों में सोवियत संघ में मेरे जीवन पर यह सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • मौजूदा आर्थिक स्थिति का मेरे जीवन पर यह सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

हम इन सब बातों को वैसे ही स्पष्ट तौर पर लिखते हैं जैसे अपना गृहकार्य कर रहे हों। यह उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे आसान शब्दों में “अपने आप को जानना” कहते हैं। जब हम सचमुच अपने आप को जान लेते हैं तो हम यह भेद कर पाते हैं कि क्या सकारात्मक है और क्या नकारात्मक है, मैं किस बात को महत्व देना चाहता हूँ और किस चीज़ को कम करना चाहता हूँ। इस प्रकार हम अपने बारे में एक सर्वांगीण दृष्टिकोण हासिल करते हैं।

मंडल के मॉडल का प्रयोग

इन सभी प्रभावों को आपस में जोड़ने और उन्हें एकीकृत करने के लिए हम जिस एक और मॉडल का प्रयोग कर सकते हैं वह मंडल है जोकि थोड़ा अधिक चित्रात्मक होता है। मंडल में बहुत सी आकृतियाँ होती हैं जो हमारे समग्र रूप को प्रदर्शित करती हैं। हम उन सभी का एकीकृत रूप हैं। ऐसा नहीं है कि हम उसकी केंद्रीय आकृति होते हैं; बल्कि हम उसका समग्र होते हैं। इसे हमारे शरीर के मॉडल से समझा जा सकता है: हमारा शरीर केवल पाचनतंत्र ही नहीं है, वह केवल रक्तवाही तंत्र भी नहीं है, स्नायुतंत्र आदि ही नहीं है, बल्कि उन सबको मिला कर हम बनते हैं।

शुरुआत में हम अपने जीवन के आठ क्षेत्रों जैसे परिवार, मित्रों, जोड़ीदारों, शिक्षकों, अध्ययन के विषयों, अपनी रिहाइश के स्थानों, और धर्म से हमें प्राप्त हुए सकारात्मक प्रभावों की पहचान करते हैं। बेशक हम और भी कई क्षेत्रों पर ध्यान दे सकते हैं जैसे अपनी विशेष योग्यताओं पर ध्यान दे सकते हैं। यहाँ तक कि हम इनमें से किसी एक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए उसे आठ भागों में बांट सकते हैं, जैसे परिवार को हम माता, पिता, अपने भाई-बहनों, और यदि हम विवाहित हों, तो अपने बच्चों की श्रेणियों में बांट सकते हैं। इसके बाद हम इनमें से प्रत्येक क्षेत्र को किसी व्यक्ति या उस क्षेत्र को दर्शाने वाली किसी चीज़ के मानस चित्र से प्रदर्शित कर सकते हैं और उन्हें किसी मंडल के रूप में अपने आसपास व्यवस्थित कर सकते हैं। आप उसके केंद्र में हैं। यदि आपको इसकी कल्पना बहुत कठिन लगती है तो आप उन्हें अपने सामने व्यवस्थित किया हुआ चित्रित कर सकते हैं। उसके बाद आप कल्पना करते हैं कि पूर्व की भांति उन सभी में से एक साथ एक पीले प्रकाश के रूप में सकारात्मक प्रभाव आपकी ओर आ रहा है। अब यह महसूस करें कि आप स्वयं यह पूरा समूह हैं, सकारात्मक प्रभावों का पूरा मंडल हैं – यही “मैं” है। यह विचार करते हुए इसे समाप्त करें, “इसे ही मैं आगे बढ़ाना चाहता हूँ; यही मैं इस दुनिया को देना चाहता हूँ।“ यह विधि कोई आसान विधि नहीं है, लेकिन यदि आप इसे कर पाएं, तो यह बहुत ही प्रेरणाप्रद होता है।

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