संवेदनशीलता सम्बंधी समस्याएं और अभ्यास का सिंहावलोकन

संवेदनशीलता के अभ्यास और बौद्ध शिक्षाओं के बीच परस्पर सम्बंध

भावनात्मक संतुलन हासिल करने के अभ्यास के लिए मैंने “संतुलित संवेदनशीलता कैसे विकसित करें” नाम से एक कार्यक्रम तैयार किया है। यह कार्यक्रम बौद्ध शिक्षाओं पर आधारित है, और इसलिए इसमें बताई गई सभी साधनाएं बौद्ध स्रोतों से ली गई हैं; लेकिन यह एक ऐसा अभ्यास है जिसे करने के योग्य बनने के लिए किसी प्रकार की बौद्ध पृष्ठभूमि की या किसी बौद्ध संदर्भ की आवश्यकता नहीं होती है। मैंने यह अभ्यास मूलतः इसलिए विकसित किया है क्योंकि बहुत से लोग जीवन में समस्याओं का सामना करते हैं और यह समझ नहीं होती है कि वे इन समस्याओं को हल करने के लिए किस प्रकार बौद्ध शिक्षाओं की मदद ले सकते हैं। जो लोग पहले से ही बौद्ध साधना न कर रहे हों उन्हें भी इस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है और इन समस्याओं का समाधान करने के लिए उपयुक्त विधियों को ढूँढ पाना हमेशा आसान नहीं होता है। इन समस्याओं का सम्बंध संवेदनशीलता के विषय से होता है।

इस प्रयोजन के लिए बौद्ध विधियों का प्रयोग करने में कठिनाई यह होती है कि अंग्रेज़ी भाषा के सेंसिटिविटी शब्द के लिए संस्कृत या तिब्बती भाषाओं में कोई शब्द उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार की समस्याओं के समाधान में सहायक होने वाली विधियों का पता लगाने के लिए यह विश्लेषण आवश्यक होता है कि दरअसल कौन-कौन से ऐसे कारक हैं जो संवेदनशीलता से जुड़े होते हैं।

वीडियो: डा. चोन्यी टेलर - बुद्ध, प्रथम मनोवैज्ञानिक
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दत्तचित्तता और अनुक्रियाशीलता

यदि हम विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि संवेदनशीलता की हमारी साधना में दो घटक शामिल होते हैं। ये घटक हैं (1) दत्तचित्तता, यानी हम किस प्रकार और कितना ध्यान देते हैं, और (2) अनुक्रियाशीलता, हम किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं। हाँ, जब हम संवेदनशीलता की बात करते हैं तो हम भावनात्मक संवेदनशीलता की बात कर रहे होते हैं। यहाँ हम विभिन्न प्रकार की एलर्जी या इसी प्रकार की किसी दूसरी संवेदनशीलता की बात नहीं कर रहे होते हैं।

हम किस प्रकार ध्यान देते हैं इसे लेकर कुछ कठिनाइयाँ होती हैं। या तो हम बहुत अधिक ध्यान दे रहे होते हैं या फिर हम आवश्यकता से बहुत कम ध्यान देते हैं; और फिर इस बात को लेकर कठिनाइयाँ होती हैं कि हम किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं: हम या तो बहुत अधिक प्रतिक्रिया करते हैं या फिर बहुत कम या बिल्कुल भी प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। हम जिन क्षेत्रों की चर्चा कर रहे हैं वे हैं (1) हमारे व्यवहार से उत्पन्न होने वाले प्रभाव – इसका सम्बंध हमारे व्यवहार से दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव और स्वयं अपने ऊपर पड़ने वाले व्यवहार से होता है – और (2) स्थितियाँ: दूसरों की परिस्थिति और स्वयं हमारी अपनी परिस्थिति।

जब हम इन सभी घटकों को एक साथ रखकर देखते हैं तो इनके बहुत सारे रूप होते हैं और इन्हें लेकर हमें समस्याएं हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, हम इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं कि हमारे व्यवहार का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा या फिर हम अपने व्यवहार से दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर बहुत अधिक चिंतित रहते हैं। कोई व्यक्ति हमसे कुछ कह देता है और हमारी भावनाएं बहुत जल्दी आहत हो जाती हैं और हम आवश्यकता से अधिक प्रतिक्रिया कर बैठते हैं। या फिर हम इस बात की परवाह ही नहीं करते हैं कि दूसरे क्या सोचेंगे और न ही हमें इस बात की परवाह होती है कि हम दूसरों के लिए व्यवधान आदि उत्पन्न कर रहे हैं। हो सकता है कि हमें यह पता चल रहा हो कि क्या चल रहा है, लेकिन फिर भी हम कोई हरकत या प्रतिक्रिया न करें। या हो सकता है कि हम वास्तव में कुछ करें भी, लेकिन उसके पीछे हमारा कोई भाव ही न हो; या हो सकता है कि किसी स्थिति के बारे में हमारी प्रतिक्रिया या उस स्थिति का सामना करने के ढंग को लेकर हमारा निर्णय असंतुलित हो। इन सभी कठिनाइयों का सम्बंध संवेदनशीलता से होता है।

कार्यक्रम क्यों विकसित किया गया

मैंने इस कार्यक्रम को 1990 के दशक के अन्तिम वर्षों में विकसित किया और इसे विकसित करने की प्रक्रिया में और लोगों के सामने उत्पन्न होने वाली विभिन्न समस्याओं के बारे में विचार करते समय मैंने अपना ध्यान मुख्यतः लोगों के सामान्य दैनिक प्रकार के परस्पर व्यवहार पर केंद्रित किया: कामकाजी जीवन में, अपने परिवार के साथ, उनके मित्रों आदि के साथ उनके व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया। इस प्रकार मैंने इस कार्यक्रम को विकसित किया और इस कार्यक्रम में 22 अभ्यास शामिल किए गए हैं। यह एक बहुत ही व्यापक कार्यक्रम है, इसलिए मैं इसकी चर्चा संक्षेप में ही करूँगा।

इस कार्यक्रम को पूरा करने में तीन वर्ष का समय लगता है जहाँ हर सप्ताह एक कक्षा में भाग लेते हुए धीरे-धीरे, सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होता है। मैंने बर्लिन में दो बार तीन-तीन साल तक इस कार्यक्रम की शिक्षा दी है और दुनिया भर के कई देशों में इस कार्यक्रम का परिचय दिया है और लोगों ने इसे बहुत ही प्रभावी पाया है।

लेकिन अब समय बदल चुका है। जब मैंने इस कार्यक्रम को विकसित किया था वह सोशल नेटवर्किंग से पहले का ज़माना था; यह टैक्स्ट मैसेजिंग और मल्टीटास्किंग, जिनका लोग आजकल प्रयोग करते हैं, से पहले की बात है। मुझे लगता है कि आज लोगों को ऐसे कार्यक्रमों की पहले से भी अधिक आवश्यकता है, क्योंकि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई इस प्रगति के कारण संवेदनशीलता का असंतुलन और अधिक बढ़ा है। मैंने सोशल नेटवर्किंग के इस आधुनिक युग में असंतुलन के कुछ उदाहरणों की सूची तैयार की है।

सोशल नेटवर्किंग के युग में संवेदनशीलता का असंतुलन

हम किसी व्यक्ति के साथ होते हैं, लेकिन उसी समय हम किसी और व्यक्ति को टैक्स्ट मैसेज भेज रहे होते हैं या उसके साथ फोन पर बात कर रहे होते हैं। हम अपने साथ वाले व्यक्ति के यथार्थ के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील होते हैं मानो, “उसका कोई अस्तित्व ही न रहा हो, अब वह महत्वपूर्ण नहीं रहा,” और ऐसा लगता है जैसे इस दूसरे मित्र को मैसेज भेजना या ट्वीट पोस्ट करना या ऐसा ही कोई दूसरा काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह तो बड़ी असंवेदनशीलता है, है न?

यहाँ ध्यान देने की दृष्टि से भी काफी समस्या होती है: हम जिस व्यक्ति के साथ होते हैं उस पर हम ध्यान नहीं दे रहे होते हैं। या फिर हम बार-बार फोन संदेशों को या सोशल मीडिया के फीड्स आदि को देखते रहते हैं। बहुत सारे युवा लोग रात को अपने फोन को अपने नज़दीक रखकर सोते हैं और ठीक से सो भी नहीं पाते हैं। यहाँ हम देख सकते हैं कि ये लोग अपने इस व्यवहार से स्वयं अपने ऊपर पड़ने वाले प्रभाव पर ध्यान नहीं दे पाते हैं क्योंकि अगले दिन वे बुरी तरह थके हुए होते हैं, उन्हें अपने स्कूल या कार्यस्थल पर अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने आदि में कठिनाई होती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम इस लिहाज़ से अतिसंवेदनशील हो रहे हैं कि हम सचमुच यह जानना चाहते हैं कि दूसरे सभी लोग क्या सोच रहे हैं, क्या कर रहे हैं, उनके ट्वीट्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक पेज आदि पर क्या चल रहा है, लेकिन वास्तव में यह उनके प्रति असंवेदनशीलता है क्योंकि हम तो मुख्यतः मैं के बारे में चिन्तित होते हैं, “मैं नहीं चाहता कि मुझसे कोई जानकारी छूट जाए।“ है न?

या फिर हम मल्टीटास्किंग करते रहते हैं, हम देखते हैं कि बहुत से लोग यहाँ-वहाँ घूम रहे होते हैं और उनमें से बहुत से लोग, चाहे वे कुछ भी कर रहे हों, लगभग हर समय कानों पर ईयरफोन्स लगाए रहते हैं और आइपॉड पर संगीत चल रहा होता है। उनका ध्यान अपने आसपास घटित हो रही बातों या अपने आसपास के लोगों पर कभी पूरी तरह केंद्रित नहीं होता है।

असंवेदनशीलता के प्रभाव

मैंने हाल में इंटरनेट पर यह खबर पढ़ी थी कि एक सब-वे कार में किसी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। मुझे याद नहीं आ रहा है कि यह घटना न्यूयॉर्क में हुई या सैन फ्रांसिस्को में हुई थी या ऐसी ही किसी और जगह हुई थी, और वहाँ सिक्योरिटी कैमरा लगा हुआ था और उसमें सब-वे कार में मौजूद लोगों को दिखाया गया था। वहाँ मौजूद ज़्यादातर लोग अपने सैलफोन पर टैक्स्ट मैसेज भेजने या वीडियो गेम्स खेलने आदि में इतने व्यस्त थे, अपनी छोटी सी दुनिया में इतने तल्लीन थे, कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वे जिस डिब्बे में सवार थे उसी डिब्बे में किसी व्यक्ति की हत्या की जा रही थी। उन्होंने सिर उठाकर देखा तक नहीं। असंवेदनशील होने, ध्यान न देने, अपनी दुनिया में पूरी तरह डूबे रहने की चरम सीमा का यह एक उदाहरण है, जैसे बाकी दुनिया का कोई वजूद ही न हो।

कुछ लोगों को दूसरों के प्रति निष्कपट मानवीय दृष्टि से प्रतिक्रिया करने में कठिनाई होती है, और इसलिए वे नकली पहचान बना लेते हैं और इस नकली पहचान की सहायता से दूसरों के साथ संवाद करते हैं। या फिर सही विवेक न होने के कारण वे दूसरों के प्रति बहुत ही सीमित सी प्रतिक्रिया करते हैं; यानी, किसी के साथ बातचीत करने के बजाए या परस्पर संवाद करने के बजाए वे सिर्फ एक टैक्स्ट मैसेज भेज देते हैं। या फिर ऐसे लोग इतना भर भी नहीं करते; वे ट्विटर पर बस कोई सामग्री पोस्ट कर देते हैं ताकि लक्षित व्यक्ति के अलावा पूरी दुनिया भर के लोग भी उसे देख लें।

दूसरों की निजता की अपेक्षा के प्रति असंवेदनशीलता का भाव होता है। और फिर फेसबुक पर “लाइक्स” का चलन भी होता है जहाँ लोग इस बात को लेकर चिंतित बने रहते हैं कि उन्हें कितने “लाइक्स” मिले हैं और फिर यदि उन्हें पर्याप्त संख्या में “लाइक्स” न मिलें तो वे एकदम अवसादग्रस्त हो जाते हैं, और इसका सम्बंध भी मूलतः केवल “मैं” को लेकर चिंतित बने रहने से होता है। “मुझे” पसंद करने वाले लोगों की संख्या कितनी है? और कभी-कभी इसके बारे में हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया इस बात को लेकर नहीं होती है कि लोग वास्तव में हमें चाहते हैं या नहीं, इसका सम्बंध इस बात से अधिक होता है कि “मुझे” कितने “लाइक्स” मिले हैं। इस दृष्टि से इसका सम्बंध “मैं” से होता है।

और फिर स्वयं अपनी स्थिति के प्रति असंवेदनशीलता होती है, जैसे घर पर बैठकर फेसबुक पर दूसरे सभी लोगों के छुट्टियाँ मनाने के चित्रों को देखना कि वे लोग कितना बढ़िया समय बिता रहे हैं और “बेचारा मैं यहाँ बैठा-बैठा यह सब सिर्फ कम्प्यूटर पर देख रहा हूँ।“ ऐसी स्थिति में लोग और अधिक अवसादग्रस्त हो जाते हैं और वे फेसबुक के कारण और अधिक गम्भीर हो चुकी अपनी स्थिति के प्रति अतिसंवेदनशील हो जाते हैं। निष्कर्ष यह है कि आज लोगों को पहले से भी अधिक संवेदनशीलता के अभ्यास की आवश्यकता है ताकि वे उन समस्याओं का सामना कर सकें जो सोशल नेटवर्किंग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रही प्रगति के कारण और अधिक गम्भीर होती चली जा रही हैं।

दो पायों पर टिका संवेदनशीलता का अभ्यास

तो फिर क्या किया जाए? जैसाकि मैं कह चुका हूँ, इस कार्यक्रम में 22 अभ्यास हैं और यह क्रमिक रूप से आगे बढ़ता है। मैं इसके बारे में यह कहना पसंद करता हूँ कि यह पूरा अभ्यास कार्यक्रम दो पायों के ऊपर टिका हुआ है: दो ऐसी आधारभूत चीज़ें जो इस अभ्यास के लिए आवश्यक हैं। पूरा अभ्यास कार्यक्रम इन दो आधारभूत घटकों पर टिका होता है जिन्हें हमें विकसित करने की आवश्यकता होती है। ये दो घटक हैं “शांत चित्त” और “दूसरों की परवाह करने वाला हृदय” या “अप्रमाद”।

शांत चित्त

चित्त के शांत होने का मतलब होता है कि हम हर तरह के वार्तालाप, निर्णय, अशांति, संगीत, हमारे चित्त में चल रही दूसरी सभी चीज़ों को शांत कर लेते हैं ताकि हम वास्तव में शांत हो सकें और ध्यान को केंद्रित करते हुए दूसरे व्यक्ति के प्रति, या स्वयं अपनी भावनाओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपना सकें।

शुरू में मैंने जब यह कार्यक्रम विकसित किया था, उस समय मेरा ध्यान लोगों की दूसरे सभी लोगों को प्रसन्न करने के लिए अतिचिंतित रहने की समस्या पर केंद्रित था। यही कारण है कि लोग कभी भी वास्तविक अर्थ में अपनी इस चिंता को शांत नहीं कर पाते हैं और सोचते हैं, “मुझे कैसा महसूस हो रहा है?” अक्सर ऐसा उन लोगों के साथ होता है जो कभी भी न नहीं कह पाते हैं और इसलिए वे हमेशा अपने ऊपर आवश्यकता से अधिक दबाव डालते हैं। यह तब होता है जब आप सामाजिक संवाद करते हैं; ऐसे भी लोग होते हैं जो सामाजिक स्तर पर संवाद भी नहीं कर रहे होते हैं। यदि आप लगातार हर समय संगीत सुनते रहते हों तो आप अपने आप को शांत करके यह भी नहीं देख पाते हैं, “मुझे कैसा महसूस हो रहा है? मेरी भावनाएं क्या हैं? मेरी आवश्यकताएं क्या हैं?” आपको ऐसे असम्बद्ध विचार को शांत करने की आवश्यकता होती है।

दूसरों के साथ आमने-सामने की चर्चा करते समय यह आवश्यक होता है कि हम कुछ और न सोच रहे हों। “यह व्यक्ति कब चुप होगा और कब मेरा पीछा छोड़ेगा? हो सकता है कि मेरे फेसबुक आदि पर कोई संदेश आया हो जिसे मैं देख नहीं पा रहा हूँ क्योंकि मैं इस व्यक्ति के साथ बातचीत करने में अपना समय गंवा रहा हूँ।“ इस प्रकार के सभी विचार। एक और अजीब स्थिति का उदाहरण यह होता है कि आप किसी से बात कर रहे होते हैं और आप सोचते हैं, “वाह, इस व्यक्ति ने कितनी अच्छी बात कही। माफ कीजिए।“ यह आवश्यक नहीं है कि आप “माफ कीजिए” कहें, आप बस यह सोचते हैं कि आपको इस बात को ट्वीट करें, या आपको लगता है कि आपको इस बात को मैसेज करके किसी और व्यक्ति के पास भेजना चाहिए। ऐसे चित्त को शांत नहीं कहा जा सकता है।

शुरू में जब मैंने इस कार्यक्रम को विकसित किया था तब मैं भी दूसरों के बारे में राय कायम करने की दृष्टि से विचार कर रहा था, “अरे, इस व्यक्ति ने बड़ी बेवकूफी की बात कही है।“ या हम उस व्यक्ति के पूर्ववृत्त से बातें निकाल कर लाते हैं और वर्तमान समय पर ध्यान केंद्रित नहीं रखते हैं। हमें इन बातों को भी शांत करना चाहिए। चित्त को “शांत” करने का मतलब यह नहीं है कि हम कुछ भी महसूस ही न करें। चित्त को “शांत” करने का मतलब होता है कि हम ऐसे सकारात्मक मनोभाव रखने के लिए उदार दृष्टिकोण अपनाते हैं जो वास्तव में स्थिति को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं।

निःसंदेह बौद्ध धर्म में ऐसी अनेकानेक विधियाँ हैं जिनकी सहायता से चित्त को शांत किया जा सकता है। एक बहुत ही सरल तरीका यह है कि हम तनाव मुक्त रहें, हम इस बात को समझ लें कि हम “निरर्थक बातें” सोच रहे हैं और उन्हें भुला कर तनाव रहित हो जाएं। इसके लिए हम एक बंद मुट्ठी की कल्पना कर सकते हैं और फिर अपनी मुट्ठी को खोल कर कल्पना कर सकते हैं कि हमने उस खयाल को छोड़ दिया है। और भी बहुत से तरीके हैं, लेकिन यहाँ हम उन सभी तरीकों के बारे में पूरे विस्तार से चर्चा नहीं करेंगे जिन्हें इनमें से प्रत्येक अभ्यास में सिखाया जाता है।

अप्रमाद

दूसरे पाये को मैं “दूसरों की परवाह करने वाला हृदय” या “अप्रमाद” कहता हूँ। एक बार जब हम अपने चित्त को शांत कर लेते हैं तो हमारा काम दूसरे व्यक्ति को या स्वयं को इस दृष्टि से देखना होता है, “तुम एक मनुष्य हो, तुम्हारी भी वैसी ही भावनाएं हैं जैसी मेरी भावनाएं हैं और मैं तुम्हारे प्रति जैसा व्यवहार करूँगा या तुम्हारे साथ जैसी भाषा का व्यवहार करूँगा उसका तुम्हारी भावनाओं पर वैसा ही प्रभाव होगा जैसा तुम्हारे द्वारा मेरे प्रति किए गए व्यवहार या मेरे प्रति प्रयोग की गई भाषा का प्रभाव मेरे ऊपर होता है। इसलिए मैं तुम्हारे महत्व को और तुम्हारी भावनाओं को गम्भीरता से लेता हूँ और तुम्हारी परवाह करता हूँ।“ ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हारी भावनाओं को लेकर चिंतित हूँ, बल्कि मैं एक गहरा सरोकार रखता हूँ, उन भावनाओं के प्रति एक ईमानदार फिक्रमंदी का भाव रखता हूँ, केवल एक वैज्ञानिक रुचि नहीं रखता हूँ।

मैं मानता हूँ कि सोशल मीडिया के इस युग में अप्रमाद का होना पहले से भी अधिक आवश्यक है क्योंकि अनेक प्रकार से हम दूसरों के साथ अधिक जुड़े हुए होने के नाम पर दरअसल और कम जुड़े होते हैं क्योंकि हम यह मानते ही नहीं हैं कि दूसरे व्यक्ति की भी भावनाएं हैं और वह भी एक सचमुच का व्यक्ति है। हमारे लिए दूसरे लोगों का अस्तित्व केवल एक कम्प्यूटर स्क्रीन तक ही सीमित होता है या वे टैक्स्ट मैसेज में बसे कोई ऐसे लोग होते हैं जिनसे जब आप कोई वास्ता न रखना चाहें तो उन्हें बंद कर सकते हैं।

यदि यह स्थिति इस दिशा में बढ़ती है जहाँ दूसरे सभी लोग आभासिक यथार्थ के किसी बड़े कम्प्यूटर गेम के चरित्र बन जाएं जिनके साथ आप संवाद कर सकते हों या किसी बटन को दबा कर उस गेम को खत्म कर सकते हों और उसका अस्तित्व ही मिट जाए, आपको उसके साथ कोई वास्ता ही न रखना पड़े, तो उस स्थिति में हम दूसरे व्यक्ति को मनुष्य के रूप में गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं। और हम अपने आप को मनुष्य के रूप में गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं, क्योंकि हम दूसरों के साथ भी इसी तरह से व्यवहार करते हैं।

इसलिए हम इन दो मूलभूत गुणों को विकसित करते हैं। हम साधना से पहले एक शांत चित्त और अप्रमाद के भाव को विकसित करते हैं। हर अभ्यास की शुरुआत इन दोनों के महत्व को दोहराते हुए की जाती है। इसके बाद वाले शेष अभ्यासों को अलग-अलग चरणों में विभाजित किया गया है। हमें चार बुनियादी चरणों का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, और उसके बाद पाँचवां चरण आता है: जोकि अधिक उन्नत साधना है।

बुनियादी मूलतत्व

आदर्श संवेदनशीलता की कल्पना

स्वयं को और अधिक विकसित करने के लिए हमें बुनियादी मूलतत्वों वाले पहले चरण से होकर गुज़रने की आवश्यकता होती है। पहले हम अपनी कल्पना का प्रयोग करके यह चित्रित करने का प्रयास करते हैं कि आदर्श संवेदनशीलता का क्या स्वरूप होगा। इसमें निम्नलिखित को शामिल किया जाता है:

  • हमारे चित्त में टिप्पणियों सहित मानसिक कथाएं न चल रही हों
  • दूसरों के प्रति ईमानदारीपूर्ण फिक्रमंदी और खयाल रखने का भाव
  • गैर-आलोचनात्मक दृष्टिकोण – उनके बारे में या स्वयं अपने बारे में राय कायम करना, “मैं भी कितना मूर्ख हूँ,” आदि
  • स्वयं को महत्वपूर्ण समझने का भाव न रखना – ऐसा होने पर हमें लगेगा, “मैं ही इस सृष्टि का केंद्र हूँ और दूसरे सभी लोगों को मुझ पर ध्यान देना चाहिए और आप क्या सोचते हैं मैं इसकी परवाह नहीं करता हूँ; मैं जो सोचता हूँ बस वही महत्वपूर्ण है”
  • हमारे बीच कोई मूर्त दीवारें न हों – किसी व्यक्ति के साथ वैयक्तिक आदान-प्रदान में रक्षक ढाल या अपने आस-पास ऊँची दीवारें न बनाना, रक्षात्मक न होना
  • कोई भय न होना
  • प्रसन्नता का भाव रखना – किसी व्यक्ति के साथ होने पर प्रसन्नचित्त बने रहना
  • सौहार्द और उदारता का भाव रखना – ऐसा उदार व्यक्ति बनना जो दूसरों के साथ सहानुभूति रख सके और यह समझ सके कि उनकी समस्याएं क्या हैं
  • चेहरे के हावभाव – ऐसा भावशून्य चेहरा न बनाना जैसे हम ऊब रहे हों और चाहते हों कि हम जिस व्यक्ति के साथ हैं वह चुप हो जाए और हमारे पास से चला जाए, मन ही मन यह आशा करना कि हमारा फोन बजने लगे ताकि वह व्यक्ति चुप हो जाए
  • आत्म-नियंत्रण – अपने आप पर नियंत्रण रखना ताकि हमारी कही हुई किसी बात से या हमारे किसी कार्य से दूसरे व्यक्ति को चोट न पहुँचे
  • मधुर वचन – हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हमारा लहजा कैसा है और हम क्या कह रहे हैं
  • सोच-विचार कर कार्य करना – हमें कुछ भी करने से पहले उसके बारे में विचार कर लेना चाहिए
  • सहजतापूर्ण व्यवहार – रूखा व्यवहार न करना, लेकिन साथ ही इस बात के प्रति सचेत रहना कि हम जैसा व्यवहार करेंगे उसका दूसरे व्यक्ति पर प्रभाव पड़ेगा, इसलिए जो भी मन में आए वैसा व्यवहार न करना। कुछ लोगों के लिए, जब वे दुखी और उदास हों, तो उन्हें गले लगाना उपयुक्त होता है। लेकिन दूसरे किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो दुखी और उदास हो, हो सकता है कि उसे गले लगाना उपयुक्त न हो, इसलिए सावधानी बरतें और सही निर्णय लें।

हम कल्पना करते हैं कि ऐसा व्यक्ति बनना कैसा रहेगा। आप जिस लक्ष्य तक पहुँचना चाहते हैं, उसके बारे में आपको कुछ अनुमान होना चाहिए ताकि आप उस लक्ष्य तक पहुँच सकें। क्या आप ऐसा बनने का प्रयास करने की कल्पना कर सकते हैं?

अपनी सहज योग्यताओं को स्वीकार करना

इसके बाद अगले अभ्यास में हमें अपनी सहज योग्यताओं को स्वीकार करना होता है और उनका मूल्यांकन करना होता है। “क्या मैं ऐसा बन सकता हूँ? क्या मेरे पास ऐसा करने के लिए आवश्यक साधन-सामग्री है? वे साधन हमारे पास हैं और हम इसकी पुष्टि उन अवसरों को याद करके करते हैं जब हमने इनमें से प्रत्येक गुण को प्रदर्शित किया था।

  • प्रसन्नचित्त और तनावमुक्त अनुभव करना जैसे हम किसी गर्म आरामदेह बिस्तर में हों – आप जानते हैं कि यह अनुभव कैसा होता है।
  • एकाग्र होना और ध्यान केंद्रित रखना – यदि आपको लेखन कार्य करना हो तो आपको अपने ध्यान को केंद्रित रखना होता है, या यदि आप कुछ टाइप करना चाहते हैं तब भी आपको अपने ध्यान को केंद्रित रखना होता है नहीं तो आपसे गलतियाँ होती हैं। इसलिए यह तथ्य कि हम लेखन कर सकते हैं या टाइपिंग कर सकते हैं यह दर्शाता है कि हम ध्यान केंद्रित रखने की क्षमता रखते हैं। ज़ाहिर है कि टैक्स्ट संदेश भेजने के लिए ध्यान को बहुत केंद्रित रखने की आवश्यकता होती है।
  • स्नेह को अनुभव करना और प्रदर्शित करना – यदि आपने कभी किसी बिल्ली के बच्चे या कुत्ते के छोटे बच्चे को अपनी गोद में बैठा कर थपथपाया हो तो आप स्नेह के उस भाव से युक्त व्यक्ति हैं।
  • बोध – यदि आप अपने जूतों के फीते बाँधना जानते हैं तो आप एक निश्चित प्रकार का ज्ञान रखते हैं कि किसी कार्य को कैसे किया जाना चाहिए और आप उस कार्य को सही समझ-बूझ के साथ कर सकते हैं।
  • क्षति पहुँचाने से बचने के लिए आत्मनियंत्रण – उदाहरण के लिए, अपनी उँगली से किसी फाँस को निकालते समय आप बहुत ध्यानपूर्वक कार्य करने के लिए बहुत आत्मनियंत्रण से काम लेते हैं।
  • प्रेरित और ऊर्जा से उत्साहित अनुभव करना – ज्यादातर लोग किसी न किसी चीज़ से प्रेरित और उत्साहित अनुभव करते हैं, संगीत सुनना, सूर्यास्त को देखना, कुछ न कुछ उन्हें प्रेरणा देता है, इस प्रकार हम उत्साह और ऊर्जा को अनुभव करने की योग्यता रखते हैं।

देखिए, अपना विकास करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि पहले तो हमें इस बात की जानकारी हो कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं और फिर हमें यह पुष्टि करनी चाहिए कि हमारे पास वे सारी योग्यताएं हैं जो हमें उस लक्ष्य तक पहुँचाने में सहायक हों। बात सिर्फ उन गुणों को विकसित करने की होती है, लेकिन वे गुण हमारे भीतर मौजूद हैं। यदि यह बात हमारे सामने प्रदर्शित हो जाए कि हमारे पास आवश्यक गुण हैं, तो हमें थोड़ा विश्वास जागेगा कि ऐसा कर पाना सम्भव है।

विनाशकारी व्यवहार से परहेज़ करना

दूसरों के साथ और स्वयं अपने साथ हमारे संवेदनशील व्यवहार का एक और पहलू – एक आधारभूत पहलू – यह है कि हम विनाशकारी व्यवहार से दूर रहें, और नैतिक आधार पर व्यवहार करें, “मैं तुम्हारे साथ कोई विनाशकारी या क्षति पहुँचाने वाला व्यवहार नहीं करूँगा, मैं कोई ऐसा काम नहीं करूँगा जो आत्मविनाशकारी हो।“ यह अभ्यास करके हम अपने व्यवहार के उन पहलुओं को पहचान पाते हैं जो दूसरों के लिए या स्वयं हमारे लिए विनाशकारी होते हैं। इसमें केवल दूसरों के साथ ईमानदारी का व्यवहार न करना ही शामिल नहीं है, बल्कि स्वयं अपने प्रति ईमानदारी का व्यवहार न करना भी शामिल होता है, और इसी प्रकार के दूसरे आचरण शामिल होते हैं। ऐसा व्यवहार करना जो दूसरों के लिए नुकसानदेह हो, और हमारे लिए भी नुकसानदेह हो, जैसे बहुत अधिक काम करना, आराम न करना, ठीक ढंग से खाना न खाना, व्यायाम न करना, ये सभी आत्मविनाशकारी आचरण हैं।

इसके बहुत से सूक्ष्म पहलू होते हैं। आप किसी बुज़ुर्ग के साथ हों, और आप उस व्यक्ति के साथ चल रहे हों तो बहुत तेज़ न चलें, इतने धीमें स्वर में न बोलें कि वह बुज़ुर्ग सुन ही न पाए कि आप क्या कह रहे हैं। इस प्रकार की बातों को ध्यान में रखें। ये बातें बहुत छोटी दिखाई देती हैं लेकिन वास्तव में यदि आप किसी उम्रदराज़ व्यक्ति जैसे विशेष आवश्यकताओं वाले किसी व्यक्ति के साथ संवेदनशील व्यवहार करना चाहते हैं तो ये चीज़ें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।

ऐसी चीज़ों के आधार पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण न अपनाएं। कभी-कभी जब किसी व्यक्ति को आपकी बात को सुनने में कठिनाई होती है और आपको अधिक ऊँचे स्वर में बोलना पड़ता है तो आप सोचने लगते हैं कि वह व्यक्ति मूर्ख है क्योंकि आपको उसके साथ ऊँजी आवाज़ में बात करनी पड़ती है। यह तो दूसरों के बारे में राय कायम करने वाली बात हुई, है न? हमारी संतुलित संवेदनशीलता का यह एक और पहलू है, कि हम दूसरों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण न रखें। वह व्यक्ति हमारी बात को इसलिए नहीं समझ सका क्योंकि उसे हमारी बात ठीक से सुनाई नहीं दी, लेकिन हम सोचते हैं कि उसे हमारी बात इसलिए समझ में नहीं आई क्योंकि वह मूर्ख है।

सौहार्द और आपसी समभाव का मेल कराना

सौहार्द और ज्ञान का मेल कराना इस क्षेत्र का अन्तिम अभ्यास है। हमें इनके मिले-जुले स्वरूप की आवश्यकता होती है। जैसे, “मैं तुम्हें गम्भीरता से लूँगा क्योंकि तुम, तुम्हारी बातें और भावनाएं सच्ची हैं।“ उदाहरण के लिए, “जब मैंने यह कहा था कि मैं परेशान हूँ, तो वास्तव में ऐसा ही था, और इसलिए तुम्हें इस बात को समझना चाहिए और मेरे प्रति स्नेह का व्यवहार करना चाहिए।“ इसी प्रकार जब तुमने यह कहा कि तुम परेशान हो, तो मुझे उस बात को गम्भीरता से लेना चाहिए और तुम्हारे प्रति सौहार्द और समझदारी का व्यवहार करना चाहिए। जैसाकि मैं बता चुका हूँ, इन अभ्यासों के कई-कई भाग होते हैं। मैं इनमें से प्रत्येक के बारे में थोड़ा-थोड़ा परिचय दूँगा।

अपने चित्त और मन की क्षमताओं को उद्घाटित करना

इस साधना के दूसरे चरण को “अपने चित्त और मन की क्षमताओं को अनावृत्त करना” कहते हैं। यदि हम यह जान लें कि हमारे पास इस संतुलित, दूसरों और स्वयं अपने प्रति गुणकारी संवेदनशीलता को विकसित करने के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध है तो फिर वह सामग्री हमें उपयोग के लिए कैसे उपलब्ध हो? यही प्रश्न है और इस खंड में हम इसी प्रश्न का उत्तर तलाश करेंगे।

“मैं” से मानसिक क्रियाकलाप तक

सबसे पहले तो हमें अपने ध्यान को मैं और मैं से हटाकर सिर्फ मानसिक क्रियाकलाप पर केंद्रित करने की आवश्यकता होती है। जैसे जब कोई हमसे कुछ कहता है तो बजाए इस बात पर ध्यान केंद्रित करने के “उसने मुझसे ऐसा कहा,” और, “अब मैं क्या कहूँ?”, केवल यह देखना कि दरअसल केवल इतना ही हो रहा है कि हम कुछ ध्वनियाँ सुन रहे हैं। बस इतना ही हो रहा है। किसी को कुछ कहते हुए सुनना। यही मानसिक क्रियाकलाप है। ठीक? यह ध्वनियों के मानसिक होलोग्राम के उत्पन्न होने के रूप में होता है। आपको उस व्यक्ति के द्वारा एक बार में बोला गया केवल एक शब्द या शब्दांश सुनाई देता है, लेकिन आपका मस्तिष्क उसे एक ऐसे वाक्य के रूप में व्यवस्थित कर देता है जिसका कुछ अर्थ होता है। यही सुनने की प्रक्रिया है। ऐसा कोई मूर्तिमान “मैं” नहीं है जो प्रेक्षक या नियंत्रक हो, जो इस प्रक्रिया से स्वतंत्र हो। लेकिन फिर भी मैं जो कुछ भी अनुभव करता हूँ या जो कुछ भी करता हूँ, उसके लिए मैं जवाबदेह होता हूँ। यहाँ हम अपनी अनुभूतियों की दृष्टि से अधिक निष्पक्ष बनने का प्रयास करते हैं।

हमारी अनुभूतियों की विषयवस्तु हर समय बदलती रहती है। उस विषयवस्तु को सुनने का मानसिक क्रियाकलाप वैयक्तिक होता है और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप मैं जो कुछ भी करूँगा या जो कुछ भी कहूँगा उसके लिए मैं ही जिम्मेदार होऊँगा, और उसका प्रभाव भी मुझ पर ही पडेगा। लेकिन प्रमुख बात यह है कि हम इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि जो घट रहा है वह केवल मानसिक क्रियाकलाप है। सिर्फ मानसिक क्रियाकलाप।

हमारा मानसिक क्रियाकलाप हमेशा चलता रहता है

इसके बाद, अगले अभ्यास में हम यह बोध हासिल करते हैं कि यह मानसिक क्रियाकलाप एक बहुत ही आधारभूत क्रिया है। यह बहुत ही सूक्ष्म होती है: यह हमेशा चलती रहती है, मैं इसे किसी मानसिक होलोग्राम का उत्पन्न होना कहता हूँ, और इसकी अनुभूति हमेशा होती रहती है।

उदाहरण के लिए, हम किसी व्यक्ति को देख रहे हैं और हमें उसके चेहरे पर परेशानी का भाव दिखाई देता है: वह व्यक्ति परेशान है। इसके बाद हम जाँच करते हैं कि देखने के हमारे मानसिक क्रियाकलाप में क्या चल रहा है और हमें यह बोध होता है:

  • मेरे अपने मनोभाव मुझे उस चेहरे को देखने से बाधित नहीं करते हैं, वह दृश्य अभी भी उभर रहा है। मैं परेशान होऊँ, भयभीत होऊँ या जो कुछ भी होऊँ, मुझे वह दृश्य दिखाई देता रहता है: वह मनोभाव मेरी दृष्टि को बाधित नहीं करता है।
  • मेरा भाषिक विचार भी इसे बाधित नहीं करता है।
  • यदि मैं यह सोचूँ कि मैं अपने आपको इस अन्य व्यक्ति के साथ जोड़कर और उसकी समस्याओं के साथ जोड़ कर नहीं देख सकता हूँ, तब भी मुझे यह दिखाई देता है कि वह व्यक्ति परेशान है।
  • वह व्यक्ति परेशान है: यदि मैं यह सोचूँ कि, “इस व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं है, या वह बड़ा ही क्रूर व्यक्ति है,” या कुछ और सोचूँ तब भी मैं इस सच्चाई को बदल नहीं पाता हूँ। ऐसा सोचने से यथार्थ नहीं बदलता है।
  • मेरे चित्त में भले ही और कुछ भी चल रहा हो, तब भी सिर्फ उस व्यक्ति को देखने, उसके परेशान चेहरे को देखने, या उसकी परेशानी की बातों को सुनने का मानसिक क्रियाकलाप फिर भी चल रहा होता है। वह हमेशा चलता रहता है।

चित्त और मन की सहज क्षमताओं को उपयोग में लाना

इसके बाद अगला अभ्यास अपने चित्त और मन की इन सहज क्षमताओं को सामान्य तौर पर उपयोग में लाना होता है। अपने चित्त को शांत करने, तनावमुक्त करने के लिए यह एक बहुत ही गहन अभ्यास है। इसके लिए हम धीरे-धीरे इन चीज़ों पर पकड़ ढीली करते चले जाते हैं:

  • मांस-पेशियों का तनाव
  • अपने मन में उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के भाषिक विचार या मानसिक छवियाँ
  • पूर्वधारणाएं – किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में, स्वयं अपने बारे में और हमारे बीच की सम्भावित परस्पर-क्रिया
  • केवल भाषिक आलोचना ही नहीं, बल्कि गैर-भाषिक आलोचना भी – अपने मन में वास्तव में यह कहे बिना कि “यह व्यक्ति मूर्ख है” या “यह व्यक्ति भी बड़ी मुसीबत है,” लेकिन फिर भी हम गैर-भाषिक ढंग से आलोचना कर सकते हैं।
  • परिकल्पित भूमिकाएं और उसके बारे में स्वयं अपने आप से या दूसरों से हमारी अपेक्षाएं – जैसे, “मैं माँ हूँ, तुम बालक हो। माँ से इस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा की जाती है, बालक से उस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।“ या, “तुम मेरे पार्टनर हो। तुम्हें ऐसा होना चाहिए। मुझे ऐसी भूमिका निभानी चाहिए।“

यदि आप अपने चित्त को शांत कर पाएं और इन सब चीज़ों पर से पकड़ ढीली कर पाएं ताकि सारा दबाव और सारा तनाव दूर हो जाए, तो आप पाएंगे – और लोगों को यह दिखाई देता है – कि दूसरे व्यक्ति के प्रति गर्मजोशी और उदारता का एक सहज भाव उत्पन्न हुआ है। आप सहज रूप से अधिक सचेत और फिक्रमंद रहते हैं। आपको जो भी तरीका उपयुक्त लगता है उसमें प्रतिक्रिया करने में आपको कोई हिचक या व्यग्रता नहीं होती है। यह सब सम्भव है और हम उसे देख-समझ सकते हैं यदि हम यह सोचना बंद कर दें, “मैं, मैं, मैं। मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं?” आदि। यह समझें कि यह सब सिर्फ मानसिक क्रियाकलाप है और सिर्फ यही चल रहा है और यदि आप अपने चित्त को ठीक ढंग से शांत कर लें तो सहज क्षमताएं हमारे चित्त और मन में मौजूद हैं जिनका आप उपयोग कर सकते हैं।

पाँच प्रकार का गहन बोध

अगला काम हमें “पाँच प्रकार के गहन बोध” का अभ्यास करने का करना होता है जोकि चित्त के कामकाज करने का बुनियादी तरीका होता है, जिस प्रकार मानसिक क्रियाकलाप काम करता है।

दर्पण जैसा गहन बोध

हम जानकारी को “दर्पण जैसे गहन बोध” के साथ ग्रहण करते हैं। हम बहुत सारी जानकारी और सूचनाओं को ग्रहण करते हैं; बस हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं। यदि आप दूसरे व्यक्ति को ध्यान से देखें तो आप उसके चेहरे के हावभाव से, उसकी भावभंगिमाओं से, वह किस प्रकार से अपनी देखभाल करता है, कैसे कपड़े पहनता है, कैसे अपना खयाल रखता है इस सबसे बहुत कुछ जान सकते हैं। हम बहुत कुछ देखते हैं; वह सारी जानकारी जमा होती रहती है। यदि आपका चित्त शांत हो तो आप उस पर ध्यान दे सकते हैं।

यदि आप ध्यान से सुनें कि दूसरा व्यक्ति क्या कह रहा है तो आप उसकी आवाज़ के लहजे से, उसकी आवाज़ में छिपी भावना से, यहाँ तक कि उसके स्वर से बहुत कुछ जान सकते हैं। कोई ऐसा व्यक्ति जो इतना धीमे स्वर में बात करता हो कि आप उसे ठीक से सुन भी न सकें: सामान्यतया ऐसा व्यक्ति वह होता है जिसमें आत्मविश्वास का बहुत अभाव होता है। लोगों के बात करने के ढंग और यहाँ तक कि उनके स्वर से भी बहुत सारी जानकारी मिलती है।

गहन बोध को एक समान करना

गहन बोध के अगले प्रकार को “गहन बोध को एक समान करना” कहते हैं, यानी लोगों के व्यवहार के आधार पर पैटर्न को पहचानना, चीज़ों को एक साथ लाना कहते हैं। हमारे पास ऐसा करने की क्षमता होती है। आपके पास ऐसा कर पाने की योग्यता होनी ही चाहिए नहीं तो हम कैसे भेद कर पाते हैं कि ये दो व्यक्ति महिलाएं हैं और वे दो व्यक्ति पुरुष हैं? हम चीज़ों के बीच की समानताओं को देख पाने की योग्यता रखते हैं।

गहन बोध को वैयक्तिक बनाना

इसके बाद “गहन बोध को वैयक्तिक बनाने” का कार्य किया जाता है। इसलिए दूसरे लोगों के व्यवहार में पैटर्नों को देखने के बावजूद, उदाहरण के लिए जब हम अपने पार्टनर के साथ होते हैं, और उनके व्यवहार के पैटर्न के आधार पर उनके साथ चल रही बातों को समझना शुरु करते हैं, इससे हमें उन्हें समझने में सहायता मिलती है; इस गहन बोध से हम इस विशेष स्थिति के दूसरी स्थितियों से अलग होने की बात को समझते हैं और यह जानते हैं कि इस परिस्थिति की अलग प्रकार की विशेषताएं हैं। पैटर्न के अनुकूल होने वाली हर घटना हमेशा एक जैसी नहीं होती है।

निष्पादनकारी गहन बोध

इसके बाद निष्पादनकारी गहन बोध होता है जिसकी सहायता से हम दूसरे प्रकार के गहन बोधों से होने वाली अनुभूतियों पर प्रतिक्रिया करते हैं। यह सिर्फ हमें अनुभूत किसी चीज़ के बारे में कोई प्रतिक्रिया करने, कुछ निष्पादित करने की इच्छा होती है। जब कोई कीड़ा भोजन देखता है तो उसे भी भोजन के अलग अलग टुकड़ों को देखकर यह मालूम होता है कि उन्हें समान रूप से भोजन मान कर खा लेना चाहिए। एक कीड़ा भी इस बात को जानता है।

यथार्थ गहन बोध

इसके बाद यथार्थ गहन बोध होता है, यह जानना कि अनुभूत चीज क्या है और यह जानना कि अब विशिष्टतः क्या करना चाहिए, केवल सामान्य प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि विशिष्टतः क्या किया जाना चाहिए।

ये वे साधन हैं जो चित्त की क्षमताओं का हिस्सा होते हैं। ये बताते हैं कि चित्त कैसे काम करता है, हम किन साधनों का प्रयोग कर सकते हैं। दरअसल हम इनका उपयोग अपने दैनिक जीवन में करते रहते हैं। आसान शब्दों में कहा जाए तो, आप किसी दीवार में एक खाली जगह देखते हैं और आप जान लेते हैं कि वह एक दरवाज़ा है और आपको यह मालूम होता है कि आपको दरवाज़े का क्या करना है, आप जानते हैं कि आप उसमें से चल कर जा सकते हैं और आपको मालूम होता है कि आपको दरवाज़े को खोलना होगा, आप सीधे दरवाज़े में टक्कर मारकर नहीं जा सकते हैं। यही हमारे चित्त के काम करने का तरीका है। हम बहुत सारे अलग-अलग दरवाज़े देखते हैं और हम जान जाते हैं कि वे सभी समान रूप से दरवाज़े हैं और उनमें से प्रत्येक के साथ क्या करना है; और यही बात लोगों के समान रूप से परेशान होने और अधिकांश लोगों की पसंद को लेकर भी लागू होती है। लेकिन यह एक अलग परिस्थिति है और इसलिए उसे अलग करके देखा जाना चाहिए।

वह सब इस दूसरे चरण में आता है, जहाँ हम अपने चित्त और मन की क्षमताओं को उद्घाटित करते हैं।

प्रतीतियों के बारे में भ्रम को दूर करना

तीसरा चरण “प्रतीतियों के बारे में भ्रम को दूर करना” होता है। हम जिस पर ध्यान देते हैं और जिस पर प्रतिक्रिया करते हैं वे मूलतः प्रतीतियाँ या आभास होते हैं, कि चीज़ें हमें कैसी प्रतीत होती हैं। याद रखें कि मानसिक क्रियाकलाप से ही प्रतीतियाँ, मानसिक होलोग्राम उत्पन्न होते हैं। और इसी को देखना कहते हैं, सुनना कहते हैं, विचार करना कहते हैं।

मानसिक होलोग्रामों की इस अवधारणा को समझने का प्रयास करें, यह बहुत महत्वपूर्ण है। हमें कैसे दिखाई देता है? यहाँ मेरे सामने इतने सारे लोग बैठे हुए हैं और उनकी ओर से प्रकाश आ रहा है और मेरे दृष्टिपटल से टकरा रहा है और फिर वह वैद्युत और रासायनिक संवेगों में परिवर्तित हो रहा है। अनुभूति के स्तर पर यह किसी प्रकार से एक मानसिक होलोग्राम में परिवर्तित हो जाता है, और यही हमें दिखाई देता है। ऐसा कोई मानसिक होलोग्राम नहीं है जिसे हम अपने मस्तिष्क में ढूँढ सकते हों। इसीलिए हम इसे मानसिक कहते हैं, लेकिन वास्तव में, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, होता यह है कि यह तंत्रिका कोशिकाओं और रसायनों की क्रिया से होता है।

मानसिक होलोग्रामों का कल्पनाओं से मिल जाना

समस्या यह है कि मानसिक क्रियाकलाप हमारी कल्पनाओं को इन मानसिक होलोग्रामों के ऊपर आरोपित कर देता है। अक्सर हम वास्तविक परिस्थिति के बजाए उसकी कल्पना पर प्रतिक्रिया करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने हमें फोन नहीं किया; यह सिर्फ एक तथ्य है, उस व्यक्ति ने हमसे बात नहीं की। इस बात को लेकर हम कल्पना करने लगते हैं, “अब वह मुझे पसंद नहीं करता है,” और ऐसी ही चीज़ों की कल्पना करते हैं; जबकि बात सिर्फ यह भी हो सकती है कि उसके फोन की बैटरी खत्म हो गई हो। हमें पहले अनुभव किए गए आभास का सत्यापन करना चाहिए। हमें दिखाई देने वाली वास्तविक परम्परागत प्रतीति की पुष्टि करनी चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि हम उसे कहीं बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं देख रहे हैं।

उदाहरण के लिए, हम किसी व्यक्ति के साथ रह रहे हों और उसने बर्तनों को साफ न किया हो, सफाई न की हो, या ऐसा ही कुछ और। यह एक तथ्य है, लेकिन हम उसके आधार पर यह कल्पना कर लेते हैं, “तुम बड़े कामचोर हो; तुम कभी सफाई नहीं करते हो और तुम बड़े गैर-जिम्मेदार हो,” आदि। इस कल्पना को विखंडित करने का तरीका यह है कि हम यह देखें कि यह कल्पना किसी गुब्बारे के जैसी है जिसे हमने किसी परिस्थिति को हवा भरकर फुला लिया है। इसके बाद हम कल्पना करते हैं कि हमने उस गुब्बारे को फोड़ दिया है, लेकिन उस द्वैतवादी ढंग से नहीं जहाँ एक “मैं” है जो उस गुब्बारे से अलग है और उसे किसी पिन को चुभा कर फोड़ देता है, बल्कि सिर्फ इतना ही कि गुब्बारा फूट जाता है।

या फिर हम कल्पना कर सकते हैं कि कोई परीकथा वाली किताब है जो किसी राजकुमार या राजकुमारी, या किसी झमेले के बारे में है या किसी दंभी विपत्तिग्रस्त व्यक्ति के बारे में या किसी आलसी कामचोर व्यक्ति के बारे में है – या आप उस स्थिति में जो भी कहानी गढ़ना चाहते हों। उस किताब को बंद करके पटक दीजिए, कोई परीकथा नहीं। यही पहला अभ्यास है।

भ्रामक प्रतीतियों को विखंडित करना

इसके बाद हम भ्रामक प्रतीतियों, कल्पनाओं को विखंडित करने के श्रृंखलाबद्ध अभ्यास करते हैं। पहले हम जीवन में होने वाले बदलावों की कल्पना करते हैं, जैसे किसी का बूढ़ा हो जाना, ताकि हम इस भ्रामक प्रतीति को विखंडित कर सकें कि उस व्यक्ति की उम्र नहीं बढ़ेगी और वह हमेशा ऐसा ही रहेगा। हम इसी प्रकार अनुभव करते हैं। हम किसी व्यक्ति को देखते हैं, उदाहरण के लिए अल्जाइमर्स रोग से पीड़ित किसी बुजुर्ग व्यक्ति को देखते हैं और हम सोचते हैं कि वह हमेशा ऐसा ही रहा होगा। हम यह बिल्कुल नहीं सोचते हैं कि वह कभी एक सामान्य ढंग से कामकाज करता व्यक्ति था; उसका अपना एक जीवन था, उसका अपना एक व्यवसाय था, उसका अपना एक परिवार था आदि। हम ऐसा मानते हैं कि अपना नाम तक न जानने वाला अल्जाइमर्स रोग से पीड़ित यह व्यक्ति हमेशा-हमेशा से ऐसा ही था। और फिर हम उसके साथ मिलने-जुलने से डरते हैं; हम उसे छूने से भी डरते हैं।

उदाहरण के लिए हम किसी व्यक्ति के साथ हों, अपने पार्टनर के साथ हों और वह परेशान हो, और हम उससे कहते हैं, “अरे, तुम तो हमेशा परेशान रहते हो।“ इस बात का क्या मतलब है? कि वह उस समय से जब वह छोटा बच्चा था से लेकर वर्तमान समय तक और जीवन पर्यन्त परेशान ही रहेगा? हम भूल जाते हैं कि जीवन में बदलाव आते हैं, कि जीवन में बहुत सी दूसरे प्रकार की स्थितियाँ भी आती हैं। हम उस स्थिति को सम्बंध की समग्रता के संदर्भ में नहीं देखते हैं। सम्बंधों के बारे में यह बात बहुत महत्वपूर्ण होती है कि हम किसी व्यक्ति के साथ अपने सम्बंध के पूरे संदर्भ को भूल जाते हैं। क्योंकि इस समय की कोई घटना विशेष बहुत ही नाटकीय है इसलिए हम सोचने लगते हैं कि ऐसा ही होता है, आप समझ रहे हैं न? यह तो पूरी तरह से अतिशयोक्तिपूर्ण है, है न?

या स्वयं अपने बारे में हम सोचते हैं, “मैं हमेशा से ही ऐसा हूँ; मैं हमेशा ऐसा ही रहूँगा।“ अपने पूरे जीवन के संदर्भ में इसे देखना आवश्यक होता है, कि हम अपने जीवन की यात्रा में किस प्रकार से विकसित होते जाते हैं। आप हमेशा से ऐसी किसी विशेष अवस्था में नहीं थे जहाँ अपने लिए कोई रोज़गार नहीं ढूँढ पा रहे हों या किसी सम्बंध में कठिनाइयों का सामना कर रहे हों या ऐसी ही किसी दूसरी स्थिति में नहीं रहे होंगे। जीवन में कई दौर आते हैं, कई बदलाव आते हैं। आप व्यापक संदर्भ को देंखें।

अपने अनुभवों को हिस्सों में और कारणों में विभाजित करना

इसके बाद अगले अभ्यास में हम अपने अनुभवों को छोटे-छोटे हिस्सों और कारणों में बाँटते हैं। उदाहरण के लिए कल्पना करें कि कोई व्यक्ति परेशान है। देखिए, उसके कई-कई कारण हैं, केवल इतना ही नहीं है, “मेरी कही हुई बात ने आपको परेशान कर दिया। मैं ही पूरी तरह से इसका कारण हूँ,” या “तुम बहुत बुरे हो और तुम हमेशा परेशान रहते हो।“ आप जानते हैं कि जब हम घर लौट कर आते हैं या हमारा पार्टनर घर लौट कर आता है और हम घर पर होते हैं तब क्या स्थिति होती है। यहाँ हम कल्पना कर लेते हैं कि मानो हमारे घर लौट कर आने पर या उस व्यक्ति के घर लौट कर आने से पहले उस व्यक्ति के जीवन में कुछ भी घटित नहीं हो रहा था। बस इस समय वह व्यक्ति यहाँ मौजूद है और उसके दिमाग में इस बात का कोई अस्तित्व ही नहीं है कि दफ्तर में उसका दिन परेशानी भरा रहा या बच्चों के साथ उसका दिन अच्छा नहीं बीता। इसलिए हमें यह समझने की आवश्यकता है कि अभी वह जैसा व्यवहार कर रहा है या जैसा अनुभव कर रहा है वह इस बात पर निर्भर करता है कि इससे पहले दिन में उसके साथ क्या-क्या घटित हुआ। ऐसा नहीं है कि अभी जो कुछ हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है वह इससे पहले घटित हुई चीज़ों के बिना ही घटित हो रहा है।

मैं मानता हूँ कि यह बात उन टैक्स्ट संदेशों और ई-मेल संदेशों के संदर्भ में सबसे अधिक प्रासंगिक है जिन्हें हम एक-दूसरे को भेजते रहते हैं। हम यह कल्पना कर लेते हैं कि जैसे दूसरे व्यक्ति के जीवन में कुछ और घटित हो ही नहीं रहा है। यदि वह व्यक्ति हमारे संदेश का जवाब न दे और तुरन्त उत्तर न भेजे तो हम बहुत नाराज़ हो जाते हैं। हम इस बात के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो जाते हैं कि उस व्यक्ति का भी अपना जीवन है और जब हम किसी व्यक्ति को कॉल करते हैं तो हमें उससे पूछ लेना चाहिए, “क्या आप व्यस्त हैं? क्या आप कुछ क्षण की फुर्सत निकाल सकेंगे? क्या मैं अभी आपसे बात कर सकता हूँ या मैं बाद में फोन करूँ?”

यह समझना तो बड़ी असंवेदनशीलता है और स्वंय को बहुत महत्वपूर्ण मानने वाली बात है कि मैं कभी भी एस.एम.एस. भेजकर या टेलीफोन कॉल करके आपके काम में व्यवधान डाल सकता हूँ और आपको तुरन्त उसका जवाब देना होगा। लोगों की परिस्थितियों, उनकी मनोदशा आदि की दृष्टि से इसके पीछे उनके बचपन के अनुभव, उनके माता-पिता और उनके कार्यस्थल की घटनाओं और उनके स्वास्थ्य और बहुत से दूसरे कारक होते हैं; इसलिए इन्हें विखंडित करके देखें।

अपने अनुभवों को सागर की लहरों के रूप में देखना

इसके बाद कुछ और भी अभ्यास हैं जहाँ हम अपने अनुभवों को समुद्र में उठने वाली लहरों के रूप में देखते हैं; हमारे मनोभावों में उफान आता है, लेकिन फिर लहर नीचे उतर जाती है। “तुमने मुझसे ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की?!” कोई व्यक्ति सचमुच चुभने वाली कोई बात कह देता है और आप बहुत आहत हो जाते हैं, जैसे सागर में कोई ऊँची लहर उठती है। लेकिन यदि आप शांत बने रहें, तो जैसा कि सागर की लहर के साथ होता है, आपका चित्त धीरे-धीरे शांत हो जाता है। बस आवश्यकता इस बात की होती है कि आप इसे अपने चित्त के सागर में उठी बड़ी सी लहर के रूप में देखें। उसे शांत होने दें; उस लहर को सागर की गहराई में अशांति न फैलाने दें।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति हमसे कुछ कह देता है; वह कोई ऐसी बात कह देता है जो सचमुच बहुत अप्रिय हो, या सचमुच बहुत खराब हो या हमारी आलोचना करने वाली हो। इसमें मानसिक क्रियाकलाप क्या था? हमने इसके बारे में इस खंड के पहले अभ्यास में बात की थी। यहाँ बस सुनने की बात है। आपने बस कुछ शब्द सुने, बस इतना ही हुआ। यदि आप अभ्यास करके अपने चित्त को पर्याप्त रूप से शांत कर चुके हों तो आप अपने भीतर अपनी ऊर्जा को आन्दोलित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। कोई व्यक्ति आपसे ऐसे कठोर शब्द कह देता है और आप उसे अपने पेट में ऊर्जा के कसाव के रूप में अनुभव करते हैं। यह समुद्र में उठने वाली किसी बड़ी सी लहर के जैसा होता है, लेकिन चित्त तो बस सुन रहा होता है, यह समुद्र के जैसा होता है। ऐसा ही होता है।

चित्त भी ऐसा ही शांत समुद्र है जो केवल शब्दों को सुनता है, लेकिन फिर वह आपके पेट में उत्पन्न होने वाली ऐँठन की तरह सख्त हो जाता है जोसे वह किसी मूर्तिमान “मैं” को रचने का प्रयास कर रहा हो जो खड़ा हुआ चीख-चिल्ला रहा हो, “तुमने मुझे ऐसा कहा! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!” यह स्थिति बड़ी कसावपूर्ण होती है। यहाँ हमें उस स्थिति को शांत हो जाने देना होता है। यह तो बस समुद्र पर उठने वाली किसी लहर के जैसा होता है। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उसे शांत हो जाने दें और आप स्वयं समुद्र जैसे बन जाएं। तब बस इतना ही होगा कि आपने कुछ शब्द सुने हैं और फिर आप शांत ढंग से उस पर प्रतिक्रिया कर सकेंगे, इस प्रकार नहीं: “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई! मैं, मैं, मैं!”

इसके बाद कुछ अभ्यास हमारी प्रतीतियों को खंडित करके करुणा के साथ मिलाने से सम्बंधित होते हैं।

संतुलित संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया व्यक्त करना

इसके बाद, चौथा खंड, जोकि इस बुनियादी साधना का अन्तिम चरण है, “संतुलित संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया व्यक्त करने” से सम्बंधित होता है। दूसरे शब्दों में, एक बार जब हम कल्पनाओं को विखंडित कर लेते हैं, हम वास्तव में देख पाते हैं कि दूसरे व्यक्ति या स्वयं हमारे साथ क्या चल रहा है, तब हम जो कुछ घटित हो रहा होता है उसके बारे में न तो कल्पना करते हैं और न ही उसकी अनदेखी करते हैं, जैसा कि उस समय होता है जब हम असंवेदनशील होते हैं। इसके बाद हमें आवश्यकता होती है कि हम वास्तविक स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकें। हम चाहते हैं कि हम इस योग्य हो सकें कि हम अपनी कल्पना के आधार पर प्रतिक्रिया करने के बजाए यथार्थ पर प्रतिक्रिया कर सकें।

अपने मानसिक कारकों को अनुकूलित करना

पहला अभ्यास “अपने मानसिक कारकों को अनुकूलित करने” के बारे में होता है। हम अपने मानसिक क्रियाकलाप के विभिन्न कारकों के बारे में सीखते हैं: हम किस प्रकार ध्यान देते हैं, हम चीज़ों में कितनी रुचि लेते हैं, हम किसी स्थिति या व्यक्ति में किन चीज़ों को अलग करके देख सकते हैं, हम किस प्रकार भेद करते हैं, हमारे इरादे क्या हैं। और हम जान पाते हैं कि हम इन सभी कारकों को बदल सकते हैं, उन्हें अनुकूलित कर सकते हैं, लेकिन ऐसा हम द्वैतवादी ढंग से नहीं करते हैं जैसे यहाँ कोई “मैं” हो जो किसी रेडियो की घुंडी को व्यवस्थित कर रहा हो। दूसरे व्यक्ति द्वारा कही जा रही बातों में अधिक रुचि दिखाएं, लेकिन यह नहीं “ओह, यह तो बहुत उबाऊ है,” और “मैं परवाह नहीं करता।“ रुचि दिखाएं, लोगों के साथ आप इसी तरह संवाद करते हैं, आप उनके जीवन में रुचि लेते हैं। “आपका जीवन कैसा चल रहा है?” ईमानदारी बरतें।

हम जान पाते हैं कि रुचि विकसित कर पाना सम्भव है। यदि यहाँ स्वैटरों का ढेर लगा हुआ हो तो हमें उसमें कोई खास रुचि नहीं होगी। लेकिन यदि तेज़ सर्दी पड़ रही हो, और यदि हमें सर्दी से बचने के लिए स्वैटर पहनने की आवश्यकता हो तो हम उनमें रुचि दिखाएंगे। हमारे मानसिक कारकों को बदलना या उन्हें अनुकूलित करना सम्भव होता है।

अपनी भावनाओं को अवरोधमुक्त करना

इसके बाद हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण अभ्यास करते हैं जिसका सम्बंध “हमारी भावनाओं को अवरोधमुक्त करने” से होता है। इसमें हम दुख और दूसरों को सुख देने की योग्यता को स्वीकार करते हैं क्योंकि कभी-कभी हम किसी व्यक्ति के साथ होते हैं और वह व्यक्ति सचमुच बहुत परेशान होता है या सचमुच बहुत दुखी होता है, और हम उस बात को स्वीकार करने और उससे निपटने और उसे महसूस करने से डरते हैं। हम सहानुभूति और समवेदना की अनुभूति को अवरुद्ध किए रहते हैं।

मूलतः हम डरे हुए होते हैं। हमें यह सीखना होगा कि भावनाओं से डरने की कोई बात नहीं है। या हम बहुत अधिक व्यस्त होते हैं, इसलिए हम परवाह नहीं करते। हमें यह समझना होगा कि यह हो सकता है कि हमें किसी दूसरे व्यक्ति के दुख से दुख महसूस हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप आवश्यकता से अधिक प्रतिक्रिया करें और रोना शुरू कर दें और उस दूसरे व्यक्ति को ही हमें चुप कराना पड़े। इसलिए होना यह चाहिए कि दूसरे के दुख के साथ समवेदना रखने के बावजूद हम किस प्रकार उसे दिलासा देने और उसका हौसला बढ़ाने के योग्य बन सकें। ऐसा हम किस प्रकार कर सकते हैं? हम किस प्रकार संवेदनशीलता का ऐसा संतुलन विकसित करें कि हम उसकी तकलीफ और दुख के प्रति संवेदनशील तो हों, लेकिन साथ ही उस व्यक्ति को दिलासा दे सकें और उसके प्रति प्रेम और समझबूझ का व्यवहार कर सकें? इस भाव को विकसित करना एक अच्छा अभ्यास है।

यह बहुत दिलचस्प होगा कि यदि हम कोई माता या पिता हों और हमारा कोई छोटा बच्चा हो और वह बहुत परेशान हो, तो हम किस प्रकार उसके प्रति संवेदनशीलता का व्यवहार कर सकें। बच्चे को चोट लग जाती है और ज़ाहिर है कि आप बहुत दुखी हो जाते हैं कि बच्चा गिर गया और उसे चोट लग गई, लेकिन फिर भी आपको उसे ढाढ़स और प्रेम तो देना ही होगा, और स्वयं को परेशान होने और घबरा जाने से रोकना होगा। जब आप अपने पार्टनर के साथ व्यवहार कर रहे होते हैं तब यह स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है। मूलतः निष्कर्ष यही निकलता है कि आप यह जानें कि इसमें अपनी भावनाओं से घबराने वाली कोई बात नहीं है और हमें अपनी भावनाओं को संयत रखना चाहिए।

अपनी भावनाओं से भयभीत न होने के बारे में ये बड़े ही सरल अभ्यास हैं। इसका अभ्यास आप अपनी शारीरिक अनुभूतियों को नियंत्रित करके करते हैं। आप अपने हाथ को बहुत ज़ोर से खरोंचते हैं; फिर आप अपने हाथ को पकड़ते हैं और फिर अपने हाथ को गुदगुदाते हैं। इनमें क्या अन्तर है? यह सिर्फ एक संवेदना है। कोई बड़ी बात नहीं है। इससे कहीं अधिक कठिन तब होता है जब आपके साथ बैठा व्यक्ति आपके हाथ को बहुत ज़ोर से खरोंचता है, फिर आपके हाथ को पकड़ कर उसे गुदगुदाता है। इसमें क्या अन्तर है? कोई अन्तर नहीं है; यह सिर्फ एक शारीरिक संवेदना है। दरअसल इसे अनुभव करना और यह विश्लेषण करना बहुत ही दिलचस्प होता है कि आप किस प्रकार इससे निपटते हैं। ऐसा करने के लिए आपकी भावनात्मक प्रतिक्रिया बहुत दिलचस्प होती है।

संवेदनशील निर्णय करना

अन्तिम अभ्यास “संवेदनशील निर्णय करना” होता है, कि आप वास्तव में क्या करते हैं। यहाँ सबसे पहले हमें तथ्यों की जाँच करनी होती है; क्या ऐसा है कि हम यथार्थ पर प्रतिक्रिया कर रहे हैं और अपनी कल्पनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं? एक बार जब अच्छी तरह जान लेते हैं कि यथार्थ क्या है, तब हमें विश्लेषण करना होता है: मेरी क्या करने की इच्छा हो रही है? मैं क्या करना चाहता हूँ? मुझे क्या करना चाहिए? मेरी सहज बुद्धि मुझे क्या करने के लिए कह रही है?

एक उदाहरण, जिसका मैं प्रयोग करता हूँ, जो मेरे खयाल से बहुत स्पष्ट है, अपनी खुराक को कम करने को लेकर होता है।

  • मैं अपना आहार घटाना चाहता हूँ – फिर आप विश्लेषण करते हैं कि आप किन कारणों से अपना आहार कम करना चाहते हैं – स्वास्थ्य सुधारने के लिए या बेहतर दिखने के लिए या किसी और कारण से।
  • क्या मुझे आहार कम करने की आवश्यकता है? – क्या यही कारण तो नहीं है कि मुझे खाने से अरुचि हो गई है और मेरी ऐसी कल्पना है कि मैं बहुत मोटा हो गया हूँ, या सचमुच मुझे उच्च रक्त दाब को नियंत्रित करने या किसी दूसरे कारण से ऐसा करने की आवश्यकता है?
  • मेरी क्या करने की इच्छा है? – देखिए, मेरा मित्र मेरे लिए एक केक लेकर आया है। मेरी इच्छा उसे खाने की है। मैं अपने आहार को कम करना चाहता हूँ, मुझे अपना आहार घटाने की आवश्यकता है, लेकिन मेरी खाने की इच्छा है। मुझे केक को खाने की इच्छा क्यों हो रही है? लोभ, आसक्ति, लालसा के कारण। केक लाने वाला व्यक्ति मेरा मित्र था आदि।

फिर आप जाँच करके देखते हैं: क्या आप अपने प्रति ईमानदारी बरत रहे हैं? “देखिए, बोधिसत्व संवरों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मुझे कोई चीज़ देता है तो उसे इसके कारण उसकी उदारता का पुण्य हासिल होगा, इसलिए मैं उसके द्वारा लाए गए केक को खाऊँगा। लेकिन यह तो बस एक बहाना है क्योंकि वास्तव में मैं बहुत लोभी हूँ और मैं सचमुच इस केक को खाना चाहता हूँ!” क्या हो रहा है इसके प्रति ईमानदार दृष्टिकोण रखें। “तुम्हारे प्रति करुणा भाव के कारण मैं केक को खा लूँगा।“ हम किसे मूर्ख बना रहे हैं?

जो भी हो, आप उन कारणों का मूल्यांकन करते हैं कि आप किसी कार्य को क्यों करना चाहते हैं, आपको वैसा करने की क्यों आवश्यकता है, क्यों आप कुछ और करना चाहते हैं और फिर उसके बाद हम कोई तर्कसंगत निर्णय करें। मेरा साथी परेशान है, मैं उसके पास से भाग जाना चाहता हूँ, लेकिन मुझे रुके रहने और उसे ढाढ़स देने की आवश्यकता है और मुझे महसूस होता है, “ओह, मैं चाहता हूँ कि यह व्यक्ति संयत हो जाए। मुझे लग रहा है कि मैं बहुत निराश हो रहा हूँ क्योंकि मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ।“ आप इन सब चीज़ों का मूल्यांकन करते हैं। “मैं भाग खड़ा होना चाहता हूँ, मैं इस स्थिति का सामना नहीं करना चाहता हूँ लेकिन मुझे इसका सामना करने की आवश्यकता है।“ और आवश्यकता ही ज़्यादा महत्वपूर्ण है, आवश्यकता का कारण मेरे भय, या जो भी भावना हो जिसके कारण मैं उस स्थिति का सामना नहीं करना चाहता हूँ, से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। और इसलिए आप उस स्थिति का सामना करते हैं।

दरअसल अपने कामकाज में इस सिद्धांत का पालन करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। कितनी ही बार ऐसा होता है कि हम अपने कार्यस्थल पर होते हैं और “मैं सचमुच इस काम को करना नहीं चाहता हूँ। मैं सचमुच ऐसा करना नहीं चाहता हूँ, लेकिन मुझे ऐसा करना चाहिए। और मुझे ऐसा क्यों करने की आवश्यकता है? मैं किराया नहीं चुका सकता हूँ,” या जो भी हो। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है, “मैं इस मूर्खतापूर्ण काम को नहीं करना चाहता हूँ” – आप उस काम को करते हैं। “मैं कुछ और करना चाहता हूँ” – तो क्या हुआ! इसके बाद आप उस स्थिति का अच्छे से अच्छे ढंग से सामना करते हैं। आप संवेदनशील ढंग से उस स्थिति का सामना करते हैं। यही बुनियादी साधना है।

उन्नत साधना में आगे और भी अभ्यास हैं जो हमारी कल्पनाओं का और अधिक गहन तरीके से विखंडन करते हैं।

अभ्यास के चरण

हर अभ्यास के लिए हम असल में जिस विधि का प्रयोग करते हैं उसके कई-कई भाग होते हैं। इसलिए सामान्यतया हर अभ्यास को पूरा करने में तीन से चार सत्र लगते हैं।

पहले हम उन लोगों के साथ अभ्यास करते हैं जो मौजूद न हों। इसके दो चरण होते हैं: पहले किसी पत्रिका में दिए गए चित्रों के साथ और फिर लोगों के बारे में सोचते हुए। हृदय में परवाह करने का भाव विकसित करने के लिए हम इस प्रकार से विचार करते हैं, “तुम एक मनुष्य हो और मेरी ही तरह तुम्हारी भी भावनाएं हैं,” इसलिए आप किसी ऐसे व्यक्ति के चित्र को देखते हैं जिसके साथ आपके घनिष्ठ सम्बंध हों, कोई ऐसा व्यक्ति जिसके साथ आपकी बस जानपहचान भर हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो अजनबी हो – पत्रिका में दिया गया कोई चित्र – और फिर कोई ऐसा व्यक्ति जिसे आप पसंद न करते हों। “तुम एक मनुष्य हो और मेरी ही तरह तुम्हारी भी भावनाएं हैं।“ और फिर हम तीन या चार लोगों के साथ यही अभ्यास करते हैं: कोई ऐसा व्यक्ति जो सचमुच हमें पसंद हो, कोई ऐसा व्यक्ति जिससे बस हमारी जानपहचान भर हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो अजनबी हो जो किसी ऐसे स्टोर में काम करता हो जहाँ हमारा आना-जाना हो और कोई ऐसा व्यक्ति जो हमें पसंद न हो, लेकिन हम उनके बारे में विचार करते हैं।

इसके बाद हम सजीव, हमारे पास मौजूद लोगों के साथ अभ्यास करते हैं। हम एक गोल घेरा बनाकर बैठते हैं और घेरे में बैठे प्रत्येक व्यक्ति को देखते हैं। “तुम एक मनुष्य हो, तुम्हारी भी भावनाएं हैं, तम्हारी भी भावनाएं हैं।“ और हमें इस बात का ध्यान करना है, “मैं अपने मन में प्रत्येक व्यक्ति के बारे में किस्से गढ़ना और टिप्पणियाँ करना बंद कर दूँगा,” और ताकि लोग इस अभ्यास के प्रति सहज रहें, हम हँसना शुरू न कर दें या किसी प्रकार से ध्यान भटकने न दें। और यह ऐसा नहीं है जैसे हम एक-दूसरे को घूर रहे हों, जैसे हम किसी चिड़ियाघर में जानवरों को देख रहे हों।

उसके बाद जब लोग इसके प्रति सहज हो जाएं, और सांस्कृतिक दृष्टि से इसके कई स्वरूप होंगे, फिर हम एक-एक व्यक्ति के साथ आमने-सामने अभ्यास करते हैं। यह एक बहुत ही गहन अभ्यास है, भावनात्मक दृष्टि से बहुत ही प्रभावी है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहता है, “तुम एक मनुष्य हो, तुम्हारी भी भावनाएं हैं, मैं तुम्हारी कद्र करता हूँ,” और इसे सुनने वाला दूसरा व्यक्ति अनुभव करता है कि उसे स्वीकार किया जा रहा है, कि कोई ऐसा है जो उसकी परवाह करता है। इसके बाद आप भूमिकाओं की अदला-बदली कर लेते हैं। भावनात्मक दृष्टि से यह अभ्यास बहुत प्रभावशाली होता है।

यदि आपके समूह में पर्याप्त विविधता हो और आपके पास पर्याप्त समय हो तो इस प्रकार के आमने-सामने के अभ्यास को स्वयं अपने लिंग वाले और फिर विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के साथ दोहराना बहुत लाभकारी होता है। यदि इस अभ्यास के लिए उम्र की दृष्टि से पर्याप्त विविधता हो तो किसी अधिक उम्र वाले और किसी युवा व्यक्ति के साथ यह कहते हुए अभ्यास करें, “तुम एक मनुष्य हो और मेरी ही तरह तुम्हारी भी भावनाएं हैं।“

और फिर किसी भी अभ्यास का अन्तिम चरण स्वयं हमारी ओर लक्षित होता है। इस चरण का अभ्यास पहले किसी दर्पण में अपने आप को देखते हुए किया जाता है। अपने चेहरे के हावभाव आदि पर ध्यान दें। “मैं एक मनुष्य हूँ,” आदि। यदि हम किसी समूह में अभ्यास कर रहे हों और कोई बड़ा सा दर्पण उपलब्ध हो तो हम सभी एक साथ अपने आप को दर्पण में देख सकते हैं और यह बोध हासिल कर सकते हैं, “मैं बाकी सभी लोगों के जैसा ही हूँ। हमारे बीच कोई अन्तर नहीं है। जैसे समूह के प्रत्येक सदस्य की भावनाएं हैं, वैसे ही मेरी भी भावनाएं हैं। चूँकि हर कोई मनुष्य है जिसकी अपनी आवश्यकताएं और अपनी समझ है, इसलिए हमारे बीच कोई अन्तर नहीं है। मैं अंटार्कटिका में रहने वाले पेंग्विन पक्षियों के समूह की ही तरह इस समूह का एक सदस्य मात्र हूँ।“

इसके बाद हम दर्पण के बिना अभ्यास करते हैं। इसमें सबसे हृदयस्पर्शी अभ्यास वह होता है जिसे हम अपने पिछले जीवन से जुड़े चित्रों, विशेष तौर पर अपने जीवन के उन दौरों के चित्रों के साथ करते हैं जिनके बारे में हमें पश्चाताप होता है और जिनके बारे में हम अपने प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। “उस समय मैं मनुष्य था, मेरी भावनाएं थीं, मैं अच्छे से अच्छा करने का प्रयास कर रहा था,” आदि, और इस प्रकार हम स्वयं अपने प्रति और अपने पिछले जीवन के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का प्रयास करते हैं।

आप पाएंगे कि ये अभ्यास भावनात्मक दृष्टि से बहुत ही मर्मस्पर्शी हो सकते हैं, यही कारण है कि यह बहुत महत्वपूर्ण होता है कि ये अभ्यास बहुत जल्दी न किए जाएं और लोगों को अपने अनुभवों को व्यक्त करने और हर अभ्यास के हर हिस्से के बारे में प्रश्न पूछने का अवसर दिया जाए। हमें यह भी समझना चाहिए कि यह अभ्यास ऐसे लोगों के लिए नहीं है जो गम्भीर भावनात्मक समस्याओं से ग्रस्त हों। इसके लिए आपको भावनात्मक दृष्टि से स्थिर होना चाहिए क्योंकि इस अभ्यास के दौरान कई प्रकार के मनोभाव उत्पन्न होंगे। यह बात स्पष्ट कर दें कि यदि कोई अभ्यास भावनात्मक दृष्टि से बहुत अधिक कठिन हो तो उसे न किया जाए। यही कारण है कि सबसे पहला अभ्यास, जोकि चित्त को शांत करने का अभ्यास होता है, बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि आप एक ऐसा संरक्षित स्थान तैयार कर रहे होते हैं जहाँ मूल सिद्धांत यह होता है कि कि समूह के लोग आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रखेंगे, “मैं अपने मन में तुम्हारे बारे में किस्से-कहानियाँ नहीं गढ़ूँगा, कि तुम जो कुछ अनुभव कर रहे हो वह बहुत ही मूर्खतापूर्ण है या मैं तुम्हें हीन समझूँगा,” आदि। लोग इस संरक्षित स्थान में अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं।

हालाँकि इस अभ्यास को अकेले अपने आप ही किया जा सकता है – समूह के बिना किया जा सकता है और मैंने अपनी पुस्तक में बताया है कि ऐसा कैसे किया जा सकता है – लेकिन यदि आप इस अभ्यास को किसी छोटे समूह में करें तो यह कहीं अधिक प्रभावी होता है। समूह बहुत बड़ा न हो, बल्कि छोटा ही हो।

यह बुनियादी अभ्यास है और दुनिया भर में कुछ समूह हैं जिन्होंने मेरे बिना ही इसका अभ्यास शुरू कर दिया है क्योंकि मेरे पास तो इसे विकसित करने और इसका प्रसार करने का समय निश्चित तौर पर नहीं है। एक समूह मैक्सिको में है जिसका अभ्यास जारी है; एक समूह जर्मनी में भी है। इस अभ्यास को करने के लिए लोगों का स्वागत है। इसकी शिक्षा देने के अपने अनुभव से मैंने यह जाना है कि आरामदेह रफ्तार से अभ्यास करने पर इसे पूरा करने में लगभग तीन वर्ष का समय लगता है, जिसमें आप हर सप्ताह प्रत्येक अभ्यास के एक-एक हिस्से का अभ्यास करते हैं।

एक बार जब आप इस साधना को कर लेते हैं, या इसके किसी हिस्से को ही पूरा कर लेते हैं तो यह हमें अपनी दैनिक साधना या ध्यानसाधना या जो भी कार्य हम करते हैं, में इन विभिन्न बिन्दुओं का स्मरण कराने के लिए बहुत उपयोगी है, क्योंकि हर अभ्यास के लिए – और इसके लिए मैंने एक हैंडबुक तैयार की है – कुछ प्रमुख शब्द दिए गए हैं जिनका प्रयोग करके आप अपने आप को प्रत्येक अभ्यास की मुख्य बातों का स्मरण करा सकते हैं।

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