ध्यान साधना कैसे करें

ध्यान साधना एक ऐसा साधन है जो हमारे चित्त को शांत रखने, तनाव को कम करने और सद्गुणों को विकसित करने में सहायक होता है। अधिकांश नौसिखिए साधक अपने उत्साह के कारण बौद्ध शिक्षाओं के बारे में ज़्यादा कुछ सीखे बिना ही ध्यान साधना शुरू कर देना चाहते हैं। लेकिन बेहतर यही होगा कि हम चरणबद्ध ढंग से आगे बढ़ें। जैसे-जैसे हम बुद्ध की शिक्षाओं को बेहतर ढंग से जानेंगे, हमारी ध्यान साधना उतनी ही गहन होती चली जाएगी। 

यहाँ हम ध्यान साधना के अभ्यास सम्बंधी कुछ विषयों की चर्चा करेंगे। कोई उन्नत साधक किसी भी समय कहीं भी ध्यान साधना कर सकता है। लेकिन शुरुआत करने वालों के लिए, यह उपयोगी रहेगा कि वे कोई ऐसा स्थान चुनें जो मन को शांत करने में सहायक हो क्योंकि हमारे आसपास का माहौल हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव डालता है।

वीडियो: परम पावन शाक्य त्रिज़िन - नवसाधकों के लिए ध्यान साधना
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ध्यान साधना के लिए स्थान

हमारे मन में यह कल्पना हो सकती है कि ऐसा कमरा ध्यान साधना के लिए सबसे उपयुक्त होगा जिसमें मोमबत्तियों और मूर्तियों से सजा हो और धूप से सुगंधित हो, और यदि आप ऐसा चाहें, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। सौभाग्य से इतना तामझाम आवश्यक नहीं होता है; हाँ, कमरा साफ-सुथरा अवश्य होना चाहिए।

जब हमारे आसपास का वातावरण व्यवस्थित होता है तो चित्त को व्यवस्थित करने में सहायता मिलती है। अस्तव्यस्तता का वातावरण चित्त पर उल्टा प्रभाव डाल सकता है।

ध्यान साधना की शुरुआत करने वालों के लिए शांत वातावरण भी बहुत मददगार होता है। कोलाहल और हलचल भरे शहरों में रहने वाले लोगों के लिए ऐसा वातावरण पाना कठिन हो सकता है, इसीलिए बहुत से लोग तड़के सुबह या देर रात के समय ध्यान साधना का अभ्यास करने का प्रयास करते हैं। अंततः एक ऐसी स्थिति आएगी कि आप शोर से परेशान नहीं होंगे, लेकिन शुरुआत में यह अस्थिरता का एक बड़ा कारण बन सकता है।

संगीत और ध्यान साधना

बौद्ध धर्म में संगीत की सहायता से ध्यान साधना करने को उचित नहीं माना जाता है क्योंकि इसका अर्थ होगा कि आप शांतचित्तता के लिए किसी बाहरी सहारे पर निर्भर हैं। हम तो शांति को भीतर से उत्पन्न करना चाहते हैं।

ध्यान साधना की मुद्रा

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप आरामदेह मुद्रा में बैठें जहाँ पीठ सीधी हो और कंधे, गरदन और चेहरे की मांसपेशियों में कोई खिंचाव न हो। यदि आपको कुर्सी पर बैठना अधिक आरामदेह लगता है, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। ध्यान साधना यातना जैसी नहीं लगनी चाहिए! कुछ प्रकार की ज़ेन ध्यान साधना में साधक को बिल्कुल भी हिलना-डुलना नहीं होता है। दूसरे प्रकार की ध्यान साधनाओं में यदि आप अपनी टांगों को हिलाना-डुलाना चाहें, तो यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।

ध्यान साधना की अवधि

शुरुआत में बहुत थोड़े समय के लिए ध्यान लगाने की सलाह दी जाती है – तीन से पाँच मिनट का समय काफ़ी होता है। आपको पता चलेगा कि दरअसल इससे अधिक समय तक ध्यान को केंद्रित रखना कठिन होता है। थोड़े समय के लिए ध्यान को केंद्रित रखना कहीं अधि उपयोगी होगा बजाए इसके कि हम अधिक लम्बे समय तक ध्यान लगाने का प्रयत्न करें और हमारा चित्त कल्पनालोक में भटकता रहे, या हम सो ही जाएं! 

ध्यान रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सब चीज़ों में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। किसी-किसी दिन आपकी ध्यान साधना बहुत सफल रहेगी, तो किसी-किसी दिन आप उतने सफल नहीं होंगे।

इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि हमारे शरीर और चित्त में कोई तनाव नहीं होना चाहिए, और अपने ऊपर बहुत अधिक दबाव भी नहीं डालना चाहिए। किसी किसी दिन आपकी ध्यान साधना करने की इच्छा होगी, किसी दिन नहीं भी होगी। हमारी प्रगति कभी सीधी रेखा के रूप में नहीं होती है, इसलिए यदि एक दिन हमें बहुत अच्छा लगेगा, तो हो सकता है कि अगले दिन उतना अच्छा न लगे। कुछ सालों की सतत साधना के बाद हम पाएंगे कि सामान्य दृष्टि से हमारी साधना के अभ्यास में सुधार हो रहा है।

ध्यान साधना कितनी बार करें

ध्यान साधना को जारी रखना महत्वपूर्ण होता है। सबसे अच्छा तो यही है कि हम एक बार में कुछ मिनट की ध्यान साधना से शुरू करके हर दिन ध्यान साधना करते रहें। पहले कुछ मिनट के बाद हम कुछ समय के लिए अवकाश ले सकते हैं, और उसके बाद फिर ध्यान साधना शुरू कर सकते हैं। इस तरह से अभ्यास करना एक घंटे भर तक बैठ कर अपने आप को यातना देने से बेहतर है। 

श्वास पर ध्यान केंद्रित करना

अधिकांश लोग शांतिपूर्वक बैठ कर श्वास पर ध्यान केंद्रित करने के रूप में ध्यान साधना की शुरुआत करते हैं। तनाव होने पर चित्त को शांत करने के लिए यह अभ्यास बहुत उपयोगी है।

  • नाक से सामान्य रूप से सांस लें – न बहुत तेज़, और न ही बहुत धीरे; न बहुत गहरा, और न ही बहुत उथला।
  • दो में से किसी एक स्थान पर श्वास पर ध्यान केंद्रित करें – यदि आपको नींद आ रही हो तो अपनी ऊर्जा को बढ़ाने के लिए नाक के अन्दर या उससे बाहर जाती हुई श्वास पर, या यदि हमारा चित्त भटक रहा हो तो अपने आप को स्थिर करने के लिए पेट के फैलने और सिकुड़ने की अनुभूति पर।
  • दस-दस बार श्वास को अंदर लेने और बाहर छोड़ने के चक्रों की गिनती करते हुए जागरूकता के साथ श्वास लें – जब चित्त भटकने लगे तो उसके ध्यान को सावधानी से श्वास पर वापस लाएं।

इस अभ्यास में हम अपने चित्त को निष्क्रिय नहीं कर देते हैं। असली काम यह होता है कि जैसे ही हमारा ध्यान भटकने लगे, हम यथाशीघ्र उस स्थिति को भांप लें और उसे वापस ले आएं; या, यदि हमें यह लगे कि हम सुस्त होने लगें या हमें नींद आने लगे, तो हम अपने आप को जगा लें। यह कोई आसान काम नहीं है। हमें अपनी शिथिलता या मानसिक भटकन का आभास भी नहीं होता है – विशेष तौर पर जब ऐसा किसी अशांतकारी मनोभाव के प्रभाव के कारण होता है, जैसे जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोच रहे हों जिससे हम नाराज़ हों। लेकिन श्वास तो हमेशा चलती रहती है; यह एक ऐसी सतत क्रिया है जिस पर हम अपने ध्यान को हमेशा वापस लाकर केंद्रित कर सकते हैं।

श्वास पर ध्यान केंद्रित करने से होने वाले लाभ

तनाव से मुक्ति के अलावा श्वास पर ध्यान केंद्रित करने के कई दूसरे लाभ भी हैं। यदि आप अपने ही खयालों में खोए रहने वाले व्यक्ति हैं तो श्वास पर ध्यान केंद्रित करने से आपको अपने चित्त को स्थिर रखने में सहायता मिलेगी। श्वास पर ध्यान साधना का उपयोग कुछ अस्पतालों, विशेष तौर पर अमेरिकी अस्पतालों में पीड़ा को नियंत्रित करने के लिए भी किया जाता रहा है। इससे न केवल शारीरिक पीड़ा में राहत मिलती है, बल्कि यह भावात्मक पीड़ा को भी कम करता है। 

दूसरों के प्रति प्रेमभाव विकसित करना

एक बार जब हम श्वास पर ध्यान केंद्रित करके अपने चित्त को शांत कर लेते हैं, तो फिर हम अपने चित्त की इस उदार और सजग अवस्था का उपयोग दूसरों के प्रति प्रेमभाव विकसित करने के लिए कर सकते हैं। शुरुआत में ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ यह सोचें कि “अब मुझे सभी से प्रेम है” और असल में वैसा अनुभव होना शुरू हो जाएगा। उसके पीछे किसी प्रकार के बल का प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होगी। प्रेम के भाव को विकसित करने के लिए हम एक तर्कसंगत विचार प्रक्रिया का प्रयोग करते हैं:

  • सभी जीवधारी परस्पर सम्बंधित हैं, हम सभी यहाँ एक साथ रहते हैं।
  • सभी समान रूप से सुख चाहते हैं और कोई भी दुख नहीं चाहता।
  • सभी चाहते हैं कि उनसे प्रेम किया जाए; कोई नहीं चाहता कि उसे नापसंद किया जाए या उसकी अनदेखी की जाए।
  • मैं और बाकी सभी जीव एक जैसे ही हैं।

चूँकि हम सभी परस्पर सम्बंधित हैं, हम कामना करते हैं:

  • सभी सुखी हों और सभी को सुख के साधनों की प्राप्त हो यदि सभी सुखी हों और किसी को कोई दुख न हो तो कितना अच्छा हो।

हम यह विचार करते हैं, और अपने हृदय से सभी दिशाओं में चमकने वाले सूर्य की तरह एक स्नेहमय पीले प्रकाश के फैलने की कल्पना करते हैं जिसमें सभी के लिए प्रेम का भाव होता है। यदि हमारा ध्यान भटकने लगे तो हम उसे वापस इस भावना पर केंद्रित करते हैं कि “सभी सुखी हों।“

दैनिक जीवन में ध्यान साधना की उपयोगिता

यदि हम इस प्रकार की साधनाओं का अभ्यास करें तो हम ऐसे साधन विकसित कर सकते हैं जिनका उपयोग हम अपने दैनिक जीवन में कर सकते हैं। इसका अन्तिम उद्देश्य दिन भर के लिए श्वास पर ध्यान केंद्रित की क्षमता विकसित करना भर नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से हासिल की गई योग्यताओं को अपनी इच्छा और आवश्यकता के अनुसार केंद्रित बने रहने के लिए उपयोग करना है। यदि हम किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों और उस समय केवल यही सोच रहे हों कि “यह व्यक्ति कब चुप होगा?” तो उस समय हमारी ध्यान साधना हमें यह समझ पाने में सहायक होगी कि “यह व्यक्ति भी एक इंसान है और मेरी तरह यह भी चाहता है कि दूसरे लोग इसे पसंद करें और इसकी बात को सुनें।” इस प्रकार ध्यान साधना हमारे व्यक्तिगत जीवन में और दूसरों के साथ हमारे मेलजोल की स्थितियों में उपयोगी साबित हो सकती है।

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