एकाग्रता की पारमिता: ध्यानपारमिता

हमारा चित्त यहाँ-वहाँ भटकता ही रहता है। जब हम किसी चीज़ पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं तब भी हमारे स्मार्टफोन पर लगातार आते रहने वाले नोटिफिकेशंस के कारण, या भविष्य के परिदृश्यों की कल्पनाओं के कारण हमारा ध्यान लगातार भंग होता रहता है। हमारे मनोभावों में आने वाले उतार-चढ़ाव हमें स्थिर होकर अपने ध्यान को केंद्रित नहीं करने देते, खास तौर पर तब जब हमारा चित्त व्यग्रता, चिंताओं और आशंकाओं से घिरा होता है। मानसिक और भावनात्मक स्थिरता के साथ एकाग्रता की पारमिता से युक्त होकर हम किसी भी सकारात्मक कार्य को पूरा करने के लिए अपनी पूरी क्षमताओं का सफलतापूर्वक उपयोग कर पाते हैं।

प्रस्तावना

एकाग्रता या मानसिक स्थिरता छह व्यापक दृष्टिकोणों (पारमिताओं) के समूह में से पाँचवीं पारमिता है। इसकी सहायता से हम जब तक चाहें किसी भी लक्ष्य पर अपने ध्यान को पूरी तरह से केंद्रित रख सकते हैं। हमारा चित्त मानसिक भटकन की अतिशयताओं, अशांतकारी मनोभावों (विशिष्टतः लालसा उत्पन्न करने वाली वस्तुओं) के कारण उत्पन्न स्वेच्छाचारिता, या मानसिक मंदता से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। जब हमारा चित्त कुशाग्र होता है तो हमारी ऊर्जाएं केंद्रित और हमारे नियंत्रणाधीन हो जाती हैं, और वे अनियंत्रित होकर हमारे भीतर उत्पात नहीं करती हैं। हमें मानसिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर हर्षित करने वाले आनंददायी – किंतु शांतिदायक भी – भाव की अनुभूति होती है। हमें अपने चित्त में असाधारण रूप से स्पष्टता का अनुभव होता है जो उस समय की अवस्था है जब हमारा चित्त किसी भी प्रकार के भटकाने वाले विचारों या बाह्य मनोभावों से मुक्त हो जाता है। इस स्पष्ट, शुद्ध और आनंदमय अवस्था के प्रति आसक्ति रखे बिना हम इसका उपयोग किसी भी इच्छित सकारात्मक प्रयोजन की सिद्धि के लिए कर सकते हैं।

इस व्यापक मानसिक स्थिरता को अनेक प्रकार से विभाजित किया जा सकता है – प्रकृति के आधार पर, प्रकार के आधार पर और प्रकार्य के आधार पर।

एकाग्रता की प्रकृति के आधार पर विभाजन

व्यापक मानसिक स्थिरता की विभिन्न अवस्थाओं को विभाजित करने का एक तरीका यह है कि उन्हें साधक की सिद्धि के स्तर के आधार पर बांटा जाए। हम निम्नलिखित के आधार पर ध्यानपारमिता के भेद कर सकते हैं

  • साधारण व्यक्ति – कोई ऐसा व्यक्ति जिसने अभी शून्यता के निर्वैचारिक बोध का स्तर हासिल न किया हो
  • साधारण से उच्चतर स्तर प्राप्त व्यक्ति – शून्यता का निर्वैचारिक बोध प्राप्त उच्च सिद्धिप्राप्त व्यक्ति (“आर्य”)।

जो शून्यता का तनिक भर भी निर्वैचारिक बोध हासिल कर चुके होते हैं, किसी सीमा तक अपने चित्त को अशांतकारी मनोभावों से मुक्त कर चुके होते हैं। इस प्रकार ऐसे साधकों को इस बात की आशंका कम होती है कि वे भावनात्मक अशांति या उत्तेजना के कारण अपने दैनिक जीवन में व्यापक एकाग्रता को लागू न कर सकें।

वीडियो: डा. एलन वालेस — एकाग्रता अवधि और आजकल के बच्चे
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एकाग्रता के प्रकारों के आधार पर विभाजन

यह विभाजन उस लक्ष्य से सम्बंधित होता है जिसे हम व्यापक मानसिक स्थिरता को प्राप्त करके प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। हमारी एकाग्रता निम्नलिखित की सिद्धि को प्राप्त करने की ओर लक्षित हो सकती है:

  • शमथ – एक शांत और स्थिर मनोदशा, जो स्वेच्छाचारिता और मंदता से पूरी तरह मुक्त होती है जिसमें आनंद, शरीर और चित्त की स्वस्थता की सुखद अनुभूति होती है और हम अपनी इच्छा के अनुसार जब तक चाहें किसी सकारात्मक दशा में अपने ध्यान को केंद्रित रख पाते हैं। इस अवस्था में हम किसी लक्ष्य पर सकारात्मक चित्तवृत्ति के साथ अपने ध्यान को एकाग्र रख सकते हैं – उदाहरण के लिए, किसी एक या उससे अधिक सीमित क्षमताओं वाले जीव या जीवों पर करुणा या विवेकी बोध के साथ उस लक्ष्य की सामान्य स्थूल विशेषताओं जैसे उसकी नश्वरता या उसकी दुख भोगने की प्रकृति को पहचानते हुए ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
  • विपश्यना – एक असाधारण रूप से अनुभवग्राही मनोदशा; यह भी स्वेच्छाचारिता और मंदता से मुक्त होती है और इसमें भी आनंद, स्वस्थता की सुखद अनुभूति होती है और यह स्पष्ट बोध के साथ किसी भी लक्ष्य के सभी गुणों को स्पष्ट बोध के साथ अनुभव कर सकती है। शमथ की साधना की ही तरह यह साधना भी किसी सकारात्मक मनोदशा जैसे करुणा, से युक्त हो कर किसी लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करती है, किन्तु इसमें लक्ष्य के सभी विशिष्ट गुणों जैसे जीवों द्वारा भोगे जाने वाले समस्त प्रकार के दुखों का सूक्ष्म विवेक शामिल होता है।
  • युग्मित जोड़े के रूप में शमथ और विपश्यना – जब हम शमथ की अवस्था को पूरी तरह प्राप्त कर लेते हैं तो फिर हम उसे विपश्यना के साथ जोड़ने के लिए अभ्यास करते हैं। वास्तविक विपश्यना की अवस्था को शमथ की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद ही हासिल किया जा सकता है। तब उस युग्मित जोड़े की अवस्था में दोनों ही प्रकार की आनंदमयी सुखद अनुभूति होती है – किसी इच्छित लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखने के लिए अपेक्षित योग्यता की अनुभूति और उसके समस्त गुणों को अनुभव कर पाने के साथ-साथ उन गुणों की स्थूल अनुभूति और सूक्ष्म विवेक की योग्यता की अनुभूति होती है।

एकाग्रता द्वारा किए जाने वाले कार्यों के आधार पर विभाजन

एक बार व्यापक मानसिक स्थिरता की पारमिता को प्राप्त कर लेने के बाद हम उससे अनेक प्रकार के परिणाम हासिल कर सकते हैं। इन्हें इस प्रकार की एकाग्रता के प्रकार्य कहा जाता है। एकाग्रता निम्नलिखित कार्य करती है:

  • हमारे शरीर और चित्त को इसी जीवनकाल में आनंद की अवस्था की अनुभूति होती है – एक ऐसी अवस्था जहाँ हमें मानसिक और शरीर के स्तर पर आनंद और सुख की अनुभूति होती है, और हमारे अशांतकारी मनोभाव अस्थायी तौर पर शांत हो जाते हैं
  • सद्गुणों का विकास होता है – केवल अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्नशील साधकों के ही समान प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ, जैसे असाधारण दृष्टि और अत्युन्नत बोध, पुनर्जीवनकारी शक्तियाँ, भ्रमयुक्त मनोभावों से अस्थायी तौर पर मुक्ति सहित मानसिक स्थिरता (“ध्यान”) की उच्चतर अवस्थाएं, और अशांतकारी मनोभावों का तिरोभाव।
  • हमें दुख भोग रहे जीवों की भलाई करने के योग्य बनाती है – 11 प्रकार के लोग जिनकी सहायता की जानी चाहिए और जिनके बारे में व्यापक नैतिक आत्मानुशासन और लगनशीलता की पारमिताओं के सम्बंध में भी चर्चा की गई है।

सारांश

हो सकता है कि हमें प्रत्यक्ष तौर पर हमेशा ऐसा दिखाई न दे, किन्तु हमें अपने जूतों के फीते बाँधने जैसे छोटे और मामूली कार्यों को करने के लिए भी एकाग्रता की आवश्यकता होती है। हममें से अधिकांश लोग इससे कहीं बहुत अधिक जटिल कार्यों को करने के लिए एकाग्रता बनाए रखने की योग्यता रखते हैं, और हम अपने आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अपने इन कौशलों को परिपूर्ण बना सकते हैं। दूसरे व्यापक दृष्टिकोणों के साथ मिलकर और बोधिचित्त लक्ष्य की सहायता से हमारी मानसिक स्थिरता और एकाग्रता इतनी व्यापक हो जाती हैं कि वे हमें ज्ञानोदय की प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचा सकती हैं।

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