अर्पण सामग्री की प्राप्ति एवं सजावट

दूसरा प्रारंभिक अभ्यास है आडम्बर रहित अर्पण सामग्री प्राप्त करने तथा उसे सुंदर रूप से सजाने पर ध्यान देना।

विभिन्न प्रकार की अर्पण सामग्री

जब अतिश तिब्बत गए तो उन्होंने लोगों से जल चढ़ाने की संस्तुति की। स्पष्टतः वहाँ के लोग निर्धन थे, परन्तु तिब्बत में इतना अद्भुत स्वच्छ जल था, इसलिए अर्पण के लिए यह अद्भुत सामग्री होती। साथ ही यह निःशुल्क था, इसलिए आप यह शिकायत नहीं कर सकते थे कि आपके पास धन का अभाव है; आप कभी भी इतने निर्धन नहीं हो सकते कि एक छोटा कटोरा-भर पानी भी (जिसे आप बाद में पी भी सकते हैं) चढ़ाने में सक्षम न हों। यहाँ सात कटोरे जल अर्पण करने की परम्परा है, इसलिए सात कटोरे जल। और इसकी एक पूरी विधि है जिसमें आप अर्पण करते हैं और कटोरों को सजाते हैं। यह विधि आपको कोई भी दिखा सकता है।

तो ऐसा करने की एक पारंपरिक विधि है। फिर यह सम्मानजनक भी होना चाहिए। सात कटोरे सप्तांग प्रार्थना के सात अंगों के लिए हैं। जब आप सुबह उठते हैं, नित्यकर्म या जो कुछ भी करना होता है उसे करने के पश्चात, आप कमरे को बुहारते और साफ़-सुथरा करते हैं, और फिर आप जल के कटोरे सजाते हैं। फिर आप उन कटोरों को दिन चढ़े खाली करते हैं, प्रायः देर दोपहर को (यदि आप घर में हैं और दोपहर में उन्हें खाली कर पाते हैं; अन्यथा शाम को)। और जल को सम्मानजनक विधि से बहा देना है, अर्थात इसे शौचालय में न उड़ेल दें। जल को पौधों में डाल सकते हैं, परन्तु यदि आप प्रतिदिन ऐसा करते हैं, तो पौधे जल में डूब सकते हैं। तो कम-से-कम झलेरी में डालें, परन्तु शौचालय में कदापि नहीं, यद्यपि स्पष्टतः जल एक ही स्थान पर जाता है, किन्तु झलेरी में डालना कुछ अधिक सम्मानजनक है।

लोग दिन में पहली बार जो चाय या कॉफ़ी बनाते हैं प्रायः उसका एक अंश अर्पण करते हैं। और यदि आप भोजन इत्यादि अर्पण करते हैं - यह अत्यंत प्रचलित है - तो इसे तब तक न पड़ा रहने दें जब तक यह सड़ न जाए। या यदि आप ऐसे स्थान पर रहते हों जहाँ चूहे या तिलचट्टे या अन्य कीड़े हों जो झुंड में आकर आपकी अर्पण सामग्री खा सकते हों, तो, जैसे रिन्पोचे ने, विशेष रूप से भारत के सन्दर्भ में, सदैव सुझाया है, अर्पण सामग्री को काँच की हांडी में रखना चाहिए। भारत में यह एक गंभीर समस्या है। मुझे यहाँ के बारे में पता नहीं। और आप जो भोजन अर्पण करते हैं, उसे बाद में उपभोग करना बिल्कुल ठीक है, परन्तु कूड़ेदान में कदापि न फेंकें। और स्पष्टतः यदि आप पुष्प इत्यादि अर्पण करते हैं, निर्मल पुष्प, तो उन्हें सड़ने न दें।

स्पष्ट है कि  विस्तृत चढ़ावे चढ़ाना बहुत अच्छा है यदि आपके पास ऐसा करने की सामर्थ्य है, परन्तु उसके अधीन न हो जाएँ; यह न सोचें कि आप तब तक ध्यान-साधना नहीं कर सकते जब तक आपके पास इन सब की व्यवस्था न हो। आपको ध्यान-साधना एवं दैनिक अभ्यास के साथ बहुत लचीला होना पड़ेगा। अर्थात, यदि आप यात्रा कर रहे हों, चाहे आप रेलगाड़ी में हों, रातभर रेलगाड़ी में हों, या रातभर विमान में हों, या रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डे पर हों, इत्यादि, आप अपना दैनिक अभ्यास कर सकते हैं। जो महत्त्वपूर्ण है वह है आपकी चित्तावस्था तथा आपके कर्मों के लिए आपके मन में सम्मान, और कम-से-कम अपने आस-पास एक स्वच्छ, सम्मानजनक स्थान की कल्पना कर लें।

हमारे लिए यह कदाचित कुछ कठिन है क्योंकि हम में से अधिकतर लोग ध्यान-साधना करते समय शान्ति चाहते हैं। आप में से कोई भी यदि तिब्बती मठ में - या फिर भारत में ही सही - रहे हों तो आप जानते होंगे कि वहाँ प्रायः कभी भी, या फिर लगभग कभी भी, शान्ति नहीं होती। छोटे बाल नवसाधक अपने पाठ को चीख-चीखकर कंठस्थ करते हैं, और वह भी देर रात को। फिर लोग भोर सवेरे जाग जाते हैं और घंटियाँ और तुरही इत्यादि बजाते हैं। सभी अपने-अपने अभ्यास ऊँचे स्वर में करते हैं। और यदि आप कभी किसी तिब्बती मठ की शास्त्रार्थ भूमि गए हों, तो वहाँ लगभग एक-सौ शास्त्रार्थकर्त्ता दिखाई देंगे - जोड़े में, दो या तीन एक साथ - जो एक दूसरे के निकट बैठे हुए भी बहुत ऊँचे स्वर में शास्त्रार्थ कर रहे होते हैं। यह एकाग्रता के लिए अविश्वसनीय प्रशिक्षण है। आप संभवतः तिब्बती मठ में रहकर शास्त्रार्थ प्रशिक्षण में उत्तीर्ण नहीं हो पाएँगे जब तक आपकी एकाग्रता वास्तव में अत्यंत उन्नत न हो।

यदि आप कभी भी परम पावन दलाई लामा के साथ इन दीक्षा समारोहों या आयोजनों में गए हों, तो वह असाधारण है, क्योंकि जब परम पावन स्वयं अनुष्ठान इत्यादि कर रहे होते हैं, तो लाउडस्पीकर पर जप की अगुआई करने वाले बिलकुल अलग ही कुछ राग अलाप रहे होते हैं, और परम पावन इससे बिलकुल विचलित नहीं होते। और इसका शोर कुछ कम नहीं होता; यह एक सभागार में रखे विशाल लाउडस्पीकर से निकलती आवाज़ है, विशेष रूप से पश्चिम में। तो यह इस प्रकार के प्रशिक्षण का एक उदाहरण है।

हमें भी अपने अभ्यास आदि करने में सक्षम होना चाहिए, भले ही हमारे आसपास ध्वनि हो रही हो। यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो सकता है। मान लीजिए कि आप एक कमरे में रहते हैं, और टेलीविज़न चल रहा है क्योंकि वहाँ अन्य लोग भी हैं जिनके साथ आप रह रहे हैं। तब अपना अभ्यास कर पाना, जब आपके या आपके पड़ोस के घर में टेलीविज़न चल रहा हो, यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही कारण है कि वहाँ बैठकर पड़ोस में ऊँचे स्वर में टेलीविज़न के चलने को लेकर गुर्राने और कोसने के बजाए आप मानस-दर्शन करते हैं और यह कल्पना करते हैं कि यह एक निर्मल प्रदेश है जहाँ सब कुछ परिपूर्ण है एवं ध्यान-साधना के लिए अनुकूल है।

जल के आठ गुण

अब, जल ... यह बहुत रोचक है। मैत्रेय द्वारा रचित बुद्ध-धातु एवं शरणागति पर एक महान भारतीय संस्कृत ग्रन्थ, उत्तरतंत्र  - अर्थात दूरतम अक्षय प्रवाह  - में जल के आठ गुणों के बारे में लिखा है, और उसके प्रत्येक गुण से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं। यह अत्यंत रोचक सूची है। कहने का मतलब यह है कि आप सूचियों को केवल सूचियाँ न मानें और सोचें कि "ओह, यह कितना नीरस है", अपितु यह देखें कि उनसे हम क्या सीख सकते हैं।

  1. जल शीतल होना चाहिए - इसका लाभ यह है कि यह हमारे पवित्र नैतिक अनुशासन को बनाए रखने में सक्षम हो सकता है।

    अब, क्या यह ठीक बैठता है? शीतल। जब आप अशांतकारी मनोभावों की ऊष्मा से शांत हो जाते हैं, तब आप नैतिक अनुशासन बनाए रखने में सक्षम होते हैं। तो यह उसके लाभ के विषय में एक संकेत है। बात यह है कि प्रत्येक लक्षण, प्रत्येक आयाम में आप यह देखते हैं कि हमारा यह अभ्यास हमें क्या याद दिला सकता है ताकि हम सचेतन रहे सकें। "सचेतन" का अर्थ है "पकड़े रखना", "याद रखना।" यह मानसिक गोंद की तरह है। तो स्मरण करें। आप वस्तुओं को कैसे याद रख सकते हैं? प्रत्येक वस्तु किसी न किसी अन्य वस्तु का प्रतिनिधित्व करती है।
  2. और वे प्रतीक नहीं हैं। प्रतीक वह होता है जिसे आप देखते हैं और किसी भी संस्कृति का कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि वह क्या है। एक पीला वृत्त जिससे छोटी-छोटी पीली रेखाएँ निकलती हैं - सबको पता है कि यह सूर्य का प्रतीक है। परन्तु ये वस्तुएँ प्रतिरूप हैं, अर्थात आपको इसके बारे में सूचित करना होगा, आपको सिखाना होगा कि यह किसका प्रतिनिधित्व करता है; यह स्वतः स्पष्ट नहीं है। तो यदि आप किसी को अवलोकितेश्वर का चित्र दिखाते हैं, तो उन्हें कभी भी यह पता नहीं चलेगा कि वह करुणा का द्योतक है। यह कोई प्रतीक नहीं है; यह इसका प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए हमें इन बातों को सीखना होगा।
  1. फिर जल स्वादिष्ट होना चाहिए - इसका लाभ यह है कि हम अत्यंत स्वादिष्ट भोजन प्राप्त कर सकते हैं। यदि यह स्वादिष्ट है, तो हम यह भी सोच सकते हैं कि हम दूसरों को स्वादिष्ट वस्तुएँ भेंट करने में सक्षम हैं, ताकि वे प्रसन्न हो जाएँ।
  2. जल हल्का होना चाहिए - मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि भारी जल की तुलना में हल्के जल का क्या अर्थ है। परन्तु जो भी हो, हल्का। इसका लाभ यह है कि आपका चित्त एवं काया सेवा-योग्य हैं - तो यह हमें केवल इस बात का स्मरण कराता है - और यह भी कि वह अत्यंत हल्का, लचीला है। दूसरे शब्दों में, मुझे ऐसा लगता है कि वह जमा हुआ नहीं है जिससे यह भारी हो।
  3. प्रवाही - यह ऐसा होगा जैसे हमारी बोध सरणि प्रवाही होगी।
  4. निर्मल - तो हमारी मनःस्थिति निर्मल है।
  5. शुद्ध - अर्थात यह हमारे विचारों  के धुंधलेपन को साफ़ करता है; हमारा चित्त दूषित न रहे। 
  6. पेट के लिए हानिकारक नहीं - ताकि हम बीमार न पड़ें।
  7. गण्डमाला  उत्पन्न करने वाला, गले के लिए हानिकारक नहीं - मुझे लगता है कि वे पहले से ही जानते थे कि जल में आयोडीन की कमी से गण्डमाला हो सकती है। गण्डमाला आपकी गलग्रंथि की अपूर्णता, आयोडीन की कमी से होने वाली यह भारी सूजन है। इसका लाभ यह है कि आपका स्वर मधुर हो जाता है।

जो भी हो, जब हम शुद्ध, निर्मल जल अर्पण करते हैं - यदि आपके नल का जल हर प्रकार के रसायन आदि से युक्त है, तो मिनरल वॉटर, शुद्धतर जल, अर्पण करें - यह कुछ अधिक सम्मानजनक है, है न? अथवा यदि आपके पास कोई जल शोधक है, तो उसमें कम व्यय होगा। दूसरे शब्दों में, आप जो कुछ भी अर्पण करते हैं, आप चाहते हैं कि वह आपके पास उपलब्ध वस्तुओं में निर्मलतम और स्वच्छतम और शुद्धतम हो। और यह हमारे, तथा हमारे चित्त आदि के, निर्मल और शुद्ध होने के कारणों की वृद्धि करता है। और अर्पण-स्वरुप भी, यह सम्मानसूचक है।

पाखंड रहित अर्पण-सामग्री प्राप्त करना

यदि हम अर्पण-सामग्री प्राप्त कर रहे हैं, तो ग्रंथ यह कहते हैं कि उसे बिना पाखंड के प्राप्त करें। अब, यह अत्यंत रोचक हो जाता है। वे ग्रंथ गृहस्थ और मठवासी (भिक्षुओं और भिक्षुणियों) के बीच अंतर करते हैं। गृहस्थों के लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाएँ। तो, यदि आप अपनी आजीविका से अर्पण-सामग्री प्राप्त करते हैं, तो आप वह बिना धोखा-धड़ी के, बिना अनुपयुक्त दाम वसूल करे, इस प्रकार के कपट के बिना प्राप्त करें। यद्यपि अन्य शिक्षाओं में हमें यह सुनने को मिलेगा कि कुछ ऐसे व्यवसाय होते हैं जिनसे हमें दूर रहना चाहिए, जैसे हथियार बनाना और बेचना, इत्यादि - मदिरा बनाना, बेचना और परोसना, मदिरा प्रस्तुत करने वाला अनुचर, (यह एक व्यवसाय के रूप में अच्छा नहीं है क्योंकि यह दूसरों को केवल नशे में धुत होने  के लिए प्रोत्साहित करने वाला और सहायक है) - परन्तु यहाँ जिसपर मुख्य बल दिया जा रहा है, और प्रायः जो अधिक महत्त्वपूर्ण है, वह है ईमानदारी ।

तिब्बत और मंगोलिया में बड़ी संख्या में चरवाहे हैं, और वे इनमें से कुछ जानवरों को केवल दुग्ध उत्पादों के लिए ही नहीं, अपितु माँस के लिए भी बेचते हैं। एक बार मैं ऑस्ट्रेलिया में केनसुर ओग्येन त्सेतेन के साथ था, जो एक महान लामा थे - वे एक तांत्रिक महाविद्यालय के सेवानिवृत्त मठाधीश और गेशे न्गवाँग धारग्ये के शिक्षक थे - जब लोगों ने उनसे पूछा: "मैं ऑस्ट्रेलिया के एक सुदूरवर्ती क्षेत्र में रहता हूँ। वहाँ का एकमात्र उद्योग, एकमात्र उद्यम है भेड़ पालना है, जिन्हें निस्संदेह वध के लिए भेजा जाएगा। ऐसे में हम क्या करें?" तब उन्होंने कहा, "यदि जीविकोपार्जन का कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं है, तो फिर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भेड़ों के प्रति दया दिखाएँ, जितना हो सके उन्हें दया और करुणा के साथ पालें, और अपने लेन-देन में ईमानदार रहें।" परन्तु मुझे लगता है कि यह हथियार बेचने वालों की स्थिति से कुछ भिन्न है।

परन्तु भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए, यहाँ प्रायः अनुचित कहलाए जाने वाले पाँच उद्यमों की शिक्षाओं की बात आती है। तो हमें इसे उस संदर्भ में समझना होगा। तब यह वास्तव में अत्यंत रोचक हो जाता है, क्योंकि यह प्रसंग फिर वस्तुतः धर्म केंद्र के लिए आयोजित अनुदान संचयन के विषय की ओर मुड़ जाता है। यह मठ के लिए आयोजित अनुदान संचयन के समान है। आप आश्रयदाताओं से अर्पण-सामग्री अथवा दान कैसे प्राप्त करते हैं? इसके लिए आपको इन सबसे बचना होगा:

  1. चापलूसी - "आप बहुत अद्भुत हैं," इत्यादि। तो आप उस व्यक्ति की चापलूसी करते हैं ताकि वह दान दे।
  2. अप्रत्यक्ष रूप से संकेत देना कि हमें कुछ चाहिए - "ओह, धर्म केंद्र को वास्तव में इसकी या उसकी आवश्यकता है।" आप उनसे सीधे नहीं पूछते हैं, परन्तु आप एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से संकेत देते हैं - उन्हें एक प्रकार से मूर्ख बनाने की चेष्टा करते हैं। या “आपका पिछला दान कितना उपयोगी था। आप बहुत दयालु हैं। आप बहुत उपकारी हैं।" तो ये सब इस बात की ओर संकेत हैं: "और दें!"
  3. डरा-धमकाकर दान वसूली - "यदि आप नहीं देते हैं, तो आपको हानि होगी और आप निर्धन हो जाएँगे।" तो यह सुरक्षा राशि है: "हमें दान दें और हम आपके लिए कुछ पूजा करेंगे और उससे आप हानि से बच जाएँगे।" तो यह अपराधी गिरोह की तरह है, है न, सुरक्षा राशि। और लोग ऐसा करते हैं; यही तो समस्या है।
  4. प्रलोभन - किसी बृहत् प्रतिदान की आशा में कोई छोटी-सी वस्तु देना। इस आशा से आप उन्हें कोई छोटी-सी माला देते हैं, या कोई सस्ती छोटी वस्तु, जैसे चेनरेज़िग का कोई छोटा चित्र इत्यादि, कि वे बदले में कुछ बड़ा देंगे। जैसे विज्ञापन हेतु बृहत् संख्या में चिट्ठियाँ भेजना। आप दान के लिए चिट्ठियाँ भेजते हैं, और उनमें एक छोटा-सा उपहार डाल देते हैं। इस प्रकार की बात। “और यदि आप दस हज़ार रूबल देते हैं तो हम आपको एक विशेष उपहार के रूप में यह चेनरेज़िग की टी-शर्ट भेज देंगे। और यदि आप एक लाख देते हैं, तो हम आपको एक टोस्टर अवन भेज देंगे", इत्यादि।
  5. दिखावे का आचरण - जब आश्रयदाता आते हैं तो आप पवित्र होने का दिखावा करते हैं - और आप आदर्श रूप से स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, और सब कुछ अति शालीन होता है - ताकि उन्हें प्रभावित कर सकें कि हम कितने पवित्र हैं।

यह हमारे चिंतन के लिए अत्यधिक सारगर्भित सामग्री प्रदान करता है, विशेष रूप से यदि हम धर्म केंद्र के लिए अनुदान संचयन के काम में लगे हुए हों तो।

अब भिक्षु-गण की पारम्परिक विधि तो यह है कि जब वे भिक्षा माँगने जाते हैं, तो वे भिक्षा का कटोरा लेकर घूमा करते हैं, परन्तु वे कुछ माँगते नहीं। किन्तु यह ऐसे समाज में होता है जहाँ गृहस्थियों में भिक्षुओं और भिक्षुणियों को भिक्षा देने की प्रथा है। लेकिन हमारे समाजों में जहाँ सामान्य जनता में यह प्रथा नहीं है, यह अत्यधिक कठिन है। तो जैसे मैं कहता हूँ, यह कठिन है क्योंकि विज्ञापन इत्यादि का सारा उद्यम लोगों को कई प्रकार से छलने के लिए बनाया गया है कि वे कुछ खरीदें। और इसलिए जब आप अनुदान संचयन का प्रयास कर रहे हों, तो आपको अपनी रणनीति पर गहन विचार करना होगा और यह प्रयास करना होगा कि इन अनुचित तरीकों का उपयोग न करें या विज्ञापन इकाइयों की तरह न बनें, कि लोगों पर छलबल का प्रयोग कर लिया और उन्होंने हथकंडों इत्यादि के अधीन होकर दान दे दिया। 

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