आत्म-केंद्रित भाव पर विजय प्राप्त करना और प्रेम का विकास: इस्लाम

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परिचय

परम पावन चौदहवें दलाई लामा इस बात पर बल देते हैं कि धार्मिक समरसता शिक्षा और एक-दूसरे की परम्पराओं की जानकारी पर आधारित होनी चाहिए | इस गहन ज्ञान से युक्त होकर, हम अपने सार्वजनिक ध्येय समझते हुए, अपनी विविधताओं का आदर कर पाएँगे | वस्तुतः यह हो सकता है कि इन विविधताओं को समझकर हम कुछ ऐसे आयामों के विषय में जानें जिससे हमारी अपनी परम्पराएँ समृद्ध हो सकें | इसलिए, यद्यपि विभिन्न धर्मों के बीच की समानताओं को दर्शाना और मिलजुलकर प्रार्थना करना अच्छा है तथापि हमें उनके बीच की असमानताओं को भी जाँचना चाहिए ताकि हम गहनतर समझ और आदर विकसित कर पाएँ | गहनतर समझ और आदर विश्व के धर्मों के बीच दीर्घजीवी समरसता और सहयोग का स्थायी आधार प्रदान करते हैं |

सभी धर्म सिखाते हैं कि आत्म-केंद्रित मनोदृष्टि, जिसके अधीन हम केवल अपने विषय में सोचते हैं, सभी नकारात्मक मनोभावों का स्त्रोत है, जैसे क्रोध, ईर्ष्या, अविश्वास, लोभ, दम्भ, आदि | आत्म-केन्द्रित मनोदृष्टि हत्या, चोरी, दादागिरी, छल, झूठ, भ्रष्टाचार, और शोषण जैसे नकारात्मक आचरण को जन्म देती है - केवल अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए | संक्षेप में, चरम कोटि के स्वार्थी मनोभाव सभी समस्याओं का स्त्रोत हैं | इसका खण्डन करने के लिए प्रत्येक धर्म आत्म-केन्द्रीकरण घटाने और प्रेम, करुणा, सहनशीलता, और क्षमाशीलता जैसे गुणों में वृद्धि करने की विधियाँ सिखाता है |

आइए, इस ओर दृष्टि डालें कि इस्लाम और बौद्ध धर्म इन विषयों के बारे में क्या सिखाते हैं | इस्लाम और बौद्ध धर्म, दोनों की ही अनेक भिन्न-भिन्न शाखाएँ और परम्पराएँ हैं, जिनकी अपनी-अपनी निर्दिष्ट व्याख्याएँ हैं | परन्तु यहाँ हम प्रमुखतः इस्लाम और बौद्ध धर्म की भारतीय-तिब्बती परम्पराओं में पाए जाने वाले सबसे प्रख्यात अभिमतों पर दृष्टि डालेंगे | चूँकि इस निबन्ध का उद्देश्य बौद्ध मत के लोगों को इस्लाम के मूल सिद्धांतों और मतों के विषय में शिक्षित करना, और वैसे ही मुस्लिमों को बौद्ध धर्म के विषय में शिक्षित करना है, अतः प्रस्तुतियों में, अनिवार्य रूप से, सरलीकरण और सामान्यीकरण होंगे | किसी भी प्रकार की भ्रान्त व्याख्या अनभिप्रेत है | कुरान का पूर्ण अर्थ केवल ख़ुदा ही जानते हैं और केवल एक बुद्ध ही धर्म शिक्षण का पूर्ण अर्थ जानते हैं |

आध्यात्मिक मार्ग सम्बन्धी सामान्य अभिकथन

सामान्यतः, इस्लाम में आत्म-केन्द्रीकरण से अभिप्राय है, ख़ुदा  की इच्छा का अनुकरण करने के स्थान पर स्वेच्छाचार (अरबी: अल-इरादत अल-ज़ात ) का अनुसरण करना, जिस पर अहमन्यता, स्वार्थ, और नकारात्मक भावनाएँ हावी होती हैं | आत्म-केन्द्रीकरण से ऊपर उठने का मार्ग है ख़ुदा  की आराधना करना (अरबी: अल-इबादह) | आराधना का अर्थ है इस्लाम धर्म के तीन आयामों को सिद्ध करना (अरबी: अल-दीन ) | इसमें वह सब समाहित है जो खुदा को प्रिय है और जिससे वे प्रसन्न होते हैं:  

  • खुदा के प्रति आत्म-समर्पण (अरबी: अल-इस्लाम )
  • श्रद्धा (अरबी: अल-ईमान )
  • चरित्र और ख़ुदा  की सृष्टि के जीवों के प्रति सेवा कृत्यों में उत्कृष्टता (अरबी: अल-इहसान )

विभिन्न इस्लामी परम्पराएँ पूर्ण समर्पण, श्रद्धा, और उत्कृष्टता की अवस्था तक पहुँचने के लिए अलग-अलग मार्ग सिखाती हैं | इन मार्गों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:

  • जैसा ऐतिहासिक रूप से बताया गया है, पैग़म्बर मुहम्मद द्वारा प्रकट की गई पद्धतियाँ जो शास्त्रसम्मत सुन्नी और शिया परम्पराओं में सिखाई जाती हैं 
  • जैसा प्रमुखतः सूफ़ी परम्पराओं में सिखाया जाता है, वे पद्धतियाँ जो ख़ुदा  के व्यक्तिगत, आतंरिक अनुभव पर आधारित हैं

दोनों मार्ग सृष्टि एवं आत्मा के मुस्लिम कथनों का अनुगमन करते हैं | 

सृष्टि एवं प्राण

ख़ुदा  ने मिट्टी में प्राण फूँककर (अरबी: अल-रूह ) आदम की सृष्टि की | इसके पश्चात ख़ुदा प्रत्येक स्त्री और पुरुष के साथ सृष्टि का यह कृत्य दोहराते हैं | वे एक देवदूत भेजते हैं जो माँ के गर्भ में पल रहे प्रत्येक शिशु के शरीर में उनके प्राण  फूँकता है | केवल ख़ुदा  के पास ही प्राण  का सम्पूर्ण ज्ञान है; मानव-जाति को इस ज्ञान का केवल एक छोटा-सा अंश ही दिया गया है |

ख़ुदा  ने रोशनी से देवदूतों की सृष्टि की | इनमें से कुछ ख़ुदा  के व्यक्तिगत सेवक हैं, जैसे वे जो उनका सिंहासन उठाते हैं | दूसरे वे, जो संसार में मध्यस्थ का कार्य करते हैं और ख़ुदा  की इच्छा को कार्यान्वित करते हैं, जैसे देवदूत जिब्रील, जिन्होंने कुरान (अरबी: अल- कुर'आन ) का ज्ञान ख़ुदा  से पैग़म्बर मुहम्मद तक पहुँचाया | ख़ुदा  ने, बिना धुएँ की अग्नि से अदृश्य जिन्न (अरबी: अल-जिन्न ) और पशु भी बनाए | यद्यपि क़ुरान  यह नहीं कहती कि ख़ुदा  ने इन मनुष्येतर प्राणियों की सृष्टि प्राण फूँककर की है, तथापि यह इस अभिमत का खण्डन नहीं है कि ख़ुदा  की सारी सृष्टि प्राण से रची गई है |  

आत्मा, मेधा, हृदय, तथा मानवता की अन्तर्जात अन्तरतम प्रकृति

जब प्राण मानव शरीर धारण कर लेते हैं, तो उन्हें आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स ) कहते हैं | परन्तु अल-ग़ज़ाली जैसे कई सूफ़ी सन्तों का मत है कि प्राण और आत्मा दो अलग इकाइयाँ हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान हैं | हम इस निबन्ध में आगे इन सूफ़ी धारणाओं की चर्चा करेंगे | इस सामान्य प्रस्तुति में, हम मानव में मूर्तिमंत आत्मा एवं अंतर्मन को, मुख्य धारा में यथाप्रयुक्त, पर्याय के रूप में ही इस्तेमाल करेंगे |

मनुष्यों और अदृश्य जिन्नों की आत्माएँ अपनी स्वच्छंद इच्छा (अरबी:अल-इरादत अल-हुराह ) प्रयोग में ला सकती हैं | स्वेच्छा, या अन्य शब्दों में स्वतंत्र चुनाव, बुद्धि (अरबी:अल-अक़्ल ) की विशेषता है, जो ईश्वर ने मनुष्यों को प्रदान की | बुद्धि में विचार-शक्ति की क्षमता है, विशेषतः युक्तिसंगत विचार और तर्क शक्ति |

ईश्वर ने मनुष्य को हृदय भी दिया ( अरबी:अल क़ल्ब ) | क़ुरान  में हृदय के कई पर्याय हैं, जैसे अल-फु'अद | यद्यपि कुछ सूफ़ी गुरु इन शब्दों के बीच हृदय के स्तरों अथवा पहलुओं के आधार पर भेद करते हैं, किन्तु इस सामान्य प्रस्तुति में हम साधारण रूप में हृदय की बात करेंगे |

हृदय में मनोभावों (अरबी:अल-अतिफाह ) का अनुभव करने की क्षमता है, चाहे वे सकारात्मक हों अथवा नकारात्मक, अन्यथा सुख हो या दुःख | वह ईश्वर पर अविश्वास करके अंधा हो सकता है, अथवा आस्था से सशक्त बन सकता है | वह उस सत्य (अरबी:अल-हक़्क़ ) तक सीमित हो सकता है, जो ईश्वर और उनके पैग़म्बर मुहम्मद हैं, या उसको उन्मुक्त किया जा सकता है |

मनुष्य की अन्तर्जात, अंतरंग प्रकृति सामान्यतः निर्मल होती है | यह अन्तर्जात निर्मल प्रकृति एक अपरिवर्ती अंतरंग प्रवृत्ति (अरबी: अल-फ़ितरह ) है - विशेष रूप से, ईश्वर में आस्था रखने और उनके प्रति समर्पण एवं ईश्वरेच्छा का अनुसरण करने की एक अन्तर्जात प्रवृत्ति | यह एक जन्मजात क्षमता के समान है जो मनुष्य को साक्ष्य-कथन (अरबी: अल-शहूद ) में आस्था रखने में सहायक होती है: "ख़ुदा  के अतिरिक्त कोई भगवान नहीं है; और हज़रत मुहम्मद ख़ुदा  के पैग़म्बर हैं |"

अतः, ईश्वर का एकत्व (अरबी: अल-तौहीद) सब मनुष्यों की मूल निर्मल प्रकृति का अविभाज्य अंग है | किन्तु, इसे गहनता से समझकर अपने अन्तस् (अरबी: अल-लब्ब ) में इसकी पुष्टि करने की आवश्यकता है | हमें इस प्रकृति की याद दिलाने के लिए हज़रत मुहम्मद ख़ुदा  के पैग़म्बर बनकर आए | वे मनुष्य जो अपनी निर्मल प्रकृति के प्रति गहनता से सजग हैं, उन्हें क़ुरान "अंतरतम मर्म के मनुष्य" (अरबी: उलुल-अलबाब ) कहती है |

यदि, बुद्धि की स्वच्छंद इच्छा के आधार पर, भावी जीवन में हमारा हृदय ईश्वरेच्छा की अवज्ञा से उत्पन्न नकारात्मक भावनाओं से ग्रस्त हो जाता है, तो हमारी आत्मा भी इनकी दास बन जाती है | इसके प्रभाव में फिर आत्मा वर्जित आचरण करती है - वह आचरण जो ईश्वर द्वारा वर्जित किया गया है | इसके परिणामस्वरुप हृदय कलुषित हो जाता है | ईश्वर के प्रति हमारी सहजात प्रवृत्ति अंधकार में डूब जाती है | हज़रत मुहम्मद के पैग़ाम और हमारे हृदय के बीच एक पर्दा पड़ जाता है, और ईश्वर के सत्य के प्रति हमारा हृदय प्रतिहत हो जाता है |

क्योंकि आत्मा स्वेच्छा से कार्य करती है, इसलिए आत्मा को बुद्धि की स्वतंत्र इच्छा का उपयोग करके हृदय के कलंक हटाने चाहिए | हृदय को खोलने के इस प्रयास को संघर्ष (अरबी: जिहाद ) कहा गया है | वास्तव में हज़रत मुहम्मद ने आत्मा के विरुद्ध संघर्ष (अरबी: जिहाद अल-नफ़्स ) को प्रमुख जिहाद कहा है | यह संघर्ष ख़ुदा  की अवज्ञा, आस्था की कमी, तथा वासना और क्रोध के विरुद्ध है |

इस संघर्ष के मार्ग पर आत्मा इन तीन अवस्थाओं के बीच डोलायमान रह सकती है: 

(1) उकसाने वाली आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-अमराह ) आत्मा की वह अवस्था है जिसमें वह हमें वासना, क्रोध, और ख़ुदा  की इच्छा और नियमों की अवज्ञा करने के लिए उकसाती है | 

(2) स्वयं को धिक्कारने वाली आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-लुव्वामाः ) वह आत्मा है जो जाँच करती है और अपनेआप पर उकसाने वाली आत्मा की बात सुनने का आरोप लगाती है | ऐसे व्यवहार पर पछताते हुए वह ख़ुदा  से क्षमा माँगती है | फिर यह स्वयं को धिक्कारने वाली आत्मा आत्म-निग्रह की क्षमता का प्रयोग करती है, जो बुद्धि का एक और गुण है |

आत्म-निग्रह के लिए अरबी शब्दावली, "अल-तक़वा " का अर्थ है हानि से बचने के लिए स्वयं को सुदृढ़ बनाना, और धर्मनिष्ठ होना | अरबी पद "ख़ुदा  से डर", "इत्तक़ूल्लाह ", में क्रिया "इत्तक़ू " (डर) शब्द संरचना विज्ञान के अनुसार अल-तक़वा  से सम्बंधित है | अतः आत्म-निग्रह ख़ुदा  के डर का एक रूप है जो एक ऐसी आड़ बनाता है जिससे हम स्वयं को वह करने से बचाते हैं जिससे ख़ुदा  कुपित हों |


  • ध्यान रहे कि बौद्ध धर्म में संस्कृत शब्द “धर्म” का अर्थ है निवारक उपाय, जो हमें स्वयं को हानि पहुँचाने से रोकता है |

(3) शांत आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-मुतमईन ) वह आत्मा है जो दृढ़ता से ख़ुदा  की इच्छा का पालन करती है, और इसलिए वह पूर्णतः तृप्त है |

प्रेम

क़ुरान  में शब्द संरचना विज्ञान के अनुसार सम्बंधित दो शब्द समूहों में से प्रेम के लिए कई अलग-अलग अरबी शब्द हैं | एक समूह की उत्पत्ति तीन अक्षरों की धातु हबब  से हुई है, उदाहरणार्थ अल-हुब्ब, और जो श्रेष्ठता के प्रति निकटता के अनुभव का संकेत करता है | दूसरे समूह की उत्पत्ति तीन अक्षरों की धातु वदद  से हुई है, उदाहरणार्थ अल-वदूद, और यह अपने आचार और दूसरों के प्रति व्यवहार में झलकती आत्मीयता के अनुभव का संकेत करता है | यद्यपि इन दोनों समूहों में प्रत्येक शब्द का थोड़ा-सा भिन्न अर्थ है, फिर भी केवल क़ुरान  के आधार पर इनमें भेद कर पाना कठिन है | अतः यहाँ हम केवल प्रेम की सबसे साधारण विशेषताओं की चर्चा करेंगे जैसा उन्हें क़ुरान  में बतलाया गया है |

ख़ुदा  की बात की जाए तो, ख़ुदा  पूरी दुनिया के सृष्टा हैं और उन्होंने उसमें सब जीवों की सृष्टि की | वह उन्हें उत्तम बनाते हैं (अरबी: अल-इहसान ) और उनका प्रेम इस उत्तमता के प्रति एक निकटता की अनुभूति है, जिसकी उन्होंने सृष्टि की है | पर ख़ुदा  ने सभी जीवों, फरिश्तों से भी अधिक, मनुष्य को महत्त्व दिया | इसलिए ख़ुदा  ने अपने प्राणों से मनुष्य बनाया, उनकी उत्तम रचना, पवित्रता की आदिम अवस्था में, और अपने विश्वास से उन्हें धरती पर उप-प्रतिनिधि नियुक्त किया | एक वरदान के तौर पर, ख़ुदा  विशिष्ट लोगों को प्रेम जैसे विभिन्न अच्छे गुण भी देते हैं |

ख़ुदा  ने मानव जाति की सृष्टि की, और अदृश्य जिन्नों की भी, ताकि वे ख़ुदा  से प्रेम और उनकी आराधना करें | किन्तु उन्होंने उन्हें स्वतंत्र इच्छा भी दी, ताकि वे चयन कर सकें कि वे उन्हें प्रेम और उनकी आराधना करना चाहते हैं या नहीं | ख़ुदा  ने अन्तर्जात प्रकृति के रूप में ख़ुदा  के निकट जाने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, परन्तु कुछ लोग अपनी अंधी स्वेच्छा का अनुसरण करते हैं | अतः, स्वतंत्र इच्छा के कारण, मनुष्य अपना प्रेम, अपनी निकटता की भावना, उत्तमता की दिशा में उन्मुख कर सकते हैं ख़ुदा  की मर्ज़ी के अनुरूप, या उसे उस दिशा में उन्मुख कर सकते हैं जिसे वे मूलवश उत्तम मानते हैं, जो ख़ुदा  की इच्छा के विरुद्ध है और उसका विरोध करती है जो वास्तव में उत्तम है | मानवीय प्रेम भी दूसरों की ओर, और ख़ुदा  के सभी जीवों की ओर उन्मुख किया जा सकता है |

ख़ुदा  को मानवता से प्रेम इसलिए है क्योंकि उन्हें चरित्र तथा सेवा कार्यों में उत्कृष्टता के प्रति आत्मीयता की अनुभूति होती है | चरित्र तथा सेवा कार्यों में उत्कृष्टता एक व्यक्ति के निःस्वार्थ समर्पण तथा विश्वास की अभिव्यक्ति है | दूसरे शब्दों में, वे ईश्वर-भक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं | क़ुरान  की आयतों में ख़ुदा  के उत्कृष्ट प्रेम का वर्णन है जहाँ उन लोगों की विस्तृत चर्चा है जिन से ख़ुदा  प्यार करते हैं | इस सूची में वर्णित है कि ख़ुदा  से प्रेम करने वाले किस प्रकार ख़ुदा  की भक्ति करते हैं :

  • नेक और अच्छा काम करने वाले (अरबी: अल-मुहसनिन )
  • जो अपनेआप को शुद्ध और उज्ज्वल रखते हैं (अरबी: अल-मुतातहरिन )
  • जो धर्म-भीरु  होने के कारण सही ढंग से काम करते हैं, जैसे वादा निभाना तथा प्रतिबद्धता के अनुरूप काम करना (अरबी: अल-मुत्तक़ीन )
  • जो निष्पक्ष और न्यायप्रिय हों (अरबी: मक़ासितिन )
  • जो ख़ुदा  पर भरोसा और विश्वास करते हैं (अरबी: अल-मुतवकीलिन
  • जो दृढ़ता, स्थिरमति, एवं सहिष्णुता से ख़ुदा  की मर्ज़ी को पूरा करते हैं (अरबी: अल-सबरीन )
  • जो ख़ुदा, पैग़म्बर मुहम्मद, तथा उनके परिवार के सदस्यों से प्यार करते हैं 
  • जो ख़ुदा  के कार्य के लिए संघर्ष करते हैं 
  • जो पश्चाताप करते हैं (अरबी: अल-तव्वाबीन

पैग़म्बर मुहम्मद के परिवार के सदस्य (अरबी: अहल अल-बायत ) कौन-कौन से हैं, इसपर अलग-अलग विचार हैं | सभी मुस्लिम पैग़म्बर मुहम्मद के परिजनों को शामिल करते हैं, जिनमें उनकी पुत्री फ़ातिमा, फ़ातिमा के पति अली, जो पैग़म्बर मुहम्मद के चचेरे भाई भी थे, तथा उनके दो बच्चे हसन और हुसैन सम्मिलित हैं | शिया (अरबी: शि'आह ) संप्रदाय के लोग इमामों के ख़ानदान को भी सम्मिलित करते हैं, जो  दैवी इच्छा से नियुक्त पैग़म्बर मुहम्मद के वंशज हैं और पैग़म्बर के परिजनों की भाँति निष्पाप एवं भ्रमातीत हैं |

क़ुरान  की विभिन्न आयतों में उनको भी सूचीबद्ध किया गया है जिन्हें ख़ुदा  प्यार नहीं करते, जैसे वे जो उन्हें अस्वीकार करते हैं | ऐसा नहीं कि ख़ुदा  नास्तिकों से प्रेम नहीं करते, परन्तु बात यह है कि जो स्वतंत्र रूप से ख़ुदा और ख़ुदा  की इच्छा का विरोध करते हैं वे ख़ुदा  के प्रेम और उनकी कृपा को ठुकराते हैं | अतः, यद्यपि ख़ुदा  अपनी सारी सृष्टि से प्यार करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे अपनी सारी सृष्टि के साथ समान रूप से कोमल व्यवहार करते हैं, जैसे:

  • वे जो दैवी विधान (अरबी: अल-मुआ'तदिन ) की सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं 
  • वे जो भ्रष्ट हैं (अरबी: अल-मुफ़सिदिन )
  • नास्तिक (अरबी: अल-काफिरिन ), जो सत्य को ठुकराते हैं 
  • पापी और अत्याचारी (अरबी अल-ज़ालिमिन )
  • वे जो अपव्ययी हैं (अरबी: अल-मुसारिफ़िन )
  • शेख़ी बघारने वाले, जो अपने सत्कर्मों की डींग मारते हैं ( अरबी: कुल मुखतल फ़खुर )
  • वे जो दम्भी हैं (अरबी: अल-मुस्तक्बिरिन ), जो अपने अवगुणों को छुपाते हैं और सद्गुण होने का ढोंग करते हैं 
  • वे जो अमीर हैं और दूसरों को हेय दृष्टि से देखते हैं (अरबी: अल- फ़रहीन )
  • वे जो बेईमान हैं (अरबी: अल-'इनिन )
  • वे जो विश्वासघाती (अरबी: खव्वानन ) और अनैतिक हैं (अरबी: अथिमन )

मानवीय प्रेम उस दिशा में जाता है जिसे हम अत्युत्तम समझते हैं, जिसकी हमारे भीतर कमी होती है और जिसकी हम कामना करते हैं | अतः ईश्वर के प्रति मनुष्य का प्रेम उस उत्कृष्टता की सिद्धि की कामना है जिसकी उसमें कमी है और जिसकी उसे आवश्यकता है | दूसरी ओर, अपनी रचनाओं के प्रति ख़ुदा  का प्रेम कोई अपूर्णता या कामना नहीं है | ख़ुदा  को कोई कमी नहीं है और इसलिए उन्हें मनुष्य के प्रेम और उसकी आराधना की आवश्यकता नहीं है | फिर भी, मानवजाति को अपनी ओर आकर्षित करने में ख़ुदा  का मानवजाति के प्रति प्रेम झलकता है | अतः, मनुष्य के हृदय में बोया गया प्रेम एक बीज के समान है जो उनमें फलता-फूलता है जिनमें ख़ुदा  चाहते हैं और वे उत्तरोत्तर ईश्वर की ओर आकर्षित होते जाते हैं |

जब मनुष्य ब्रह्माण्ड और मानवता के प्रति निर्मलतम प्रेम का विकास करते हैं तो उनका यह प्रेम ब्रह्माण्ड अथवा मानवता के प्रति न होकर उस ख़ुदा  के प्रति होता है जिसने उनमें उत्कृष्टता का संचार किया | फिर भी, मनुष्यों का पारस्परिक प्रेम उनसे उन लोगों की सेवा करवाता है जो उन्हीं की भाँति इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं | उन मनुष्यों की देखभाल वे अपने स्रष्टा ख़ुदा  की आराधना के रूप में करते हैं | 

सच्ची आराधना

हमारी रचना, हमारे पछतावे पर उनका क्षमादान, हमारी ज़रूरतों और प्रार्थनाओं की सुनवाई, उनका सामीप्य और अनुकम्पा, तथा उनकी अनुभूति-क्षमता और अपने दासों के प्रति उनकी दया के लिए हम ख़ुदा  के प्रति हार्दिक आभार-जन्य प्रेम का विकास करते हैं (अरबी: अल-’अब्द ) |

ख़ुदा  का दास (अरबी: अब्दुल्लाह ) वह होता है जो पूरी तरह ख़ुदा  की इच्छा का पालन करे और ख़ुदा  की सृष्टि के प्रति उत्कृष्ट सेवा के काम करके ख़ुदा  की आराधना और ख़ुदा  से प्रेम करता हो | ख़ुदा  के प्रति उनके दासों के प्रेम की निष्कपटता, चरण-बद्ध रूप में चार गुणों के विकास पर निर्भर करती है:

  • श्रेष्ठतम निष्ठावान अनुयायियों के प्रति अत्यधिक विनम्र होना (अरबी: ’अज़ीलाह ) | इसका अर्थ है जो निष्ठावान हैं, उनकी तुलना में स्वयं को अधम समझना, उन्हें स्वयं से अधिक महत्त्व देना, और उनके प्रति उदार और सदय होना | इससे सहविश्वासियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण एवं कृपालु होना, तथा इसके साथ-साथ उनके सहित ख़ुदा  की आराधना करना |
  • काफ़िरों के प्रति कठोर होना (अरबी: अशीदा ) | इससे अभिप्रेत है उनके प्रति निर्मम होना जो ख़ुदा  का विरोध करते हैं अथवा ख़ुदा  में जिनका विश्वास एक छल है, और उनके प्रभाव का विरोध करना |
  • ख़ुदा  के वास्ते संघर्षरत रहना (अरबी: युजाहिदुना ) | उकसाने वाले हृदय के नकारात्मक निर्देशों के प्रति निरंतर संघर्ष ही श्रेष्ठतम संघर्ष है | कमतर संघर्ष उन अविश्वासियों के विरुद्ध है जो समय-समय पर मुस्लिमों को हानि पहुँचाते हैं |
  • अविश्वासियों के दावों के प्रति निश्शंक रहना (अरबी: ला यहफुना ) | इसका अर्थ है ख़ुदा  के प्रति अपनी आस्था में इतनी सच्चाई होना कि हम ख़ुदा और ख़ुदा  की इच्छा के अतिरिक्त और किसी बात पर ध्यान न दें |

ख़ुदा  की सच्ची आराधना मुख्यतः तीन प्रयोजनों से की जाती है:

  • मरणोपरांत ख़ुदा  के दंड का डर (अरबी: ख़ौफ़न ), जिससे श्रद्धायुक्त विस्मय एवं भय उत्पन्न होता है | 
  • ख़ुदा  की अनुकम्पा की प्रबल इच्छा (अरबी: तमा 'अन ) रखना, जिससे अपने प्राप्तव्य के प्रति प्रेम की उत्कंठा उत्पन्न होती है |
  • ख़ुदा  के अस्तित्व में पूर्ण विश्वास अथवा आस्था होना (अरबी: ईमान ), इस दृढ़ ज्ञान (अरबी: अल-मा'रीफाह ) के साथ कि ख़ुदा  ही ख़ुदा  है, दूसरे शब्दों में, यह अटल ज्ञान कि ख़ुदा  ही सर्वोपरि है और, तुलना में, मानवजाति बहुत छोटी | अतः ख़ुदा  की रचनाओं को देखकर विनम्रता (अरबी: तदर्रू'अन ) से और उस विश्वास को अपने हृदय के भीतर छुपाकर गोपन (अरबी: खुफ्यतन ) से आस्था उत्पन्न होती है | इसलिए, ख़ुदा  के दण्ड का भय और उसकी अनुकम्पा की आशा से पूर्व ख़ुदा  के माहात्म्य का ज्ञान होना चाहिए |

मरणोपरान्त जीवन

मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों को लिखने वाले दो देवदूत होते हैं, जिन्हें सम्मान्य लिपिक (अरबी: किरमान कातिबान ) कहा जाता है, जो उनके सारे कर्मों को उनकी व्यक्तिगत "कर्म पुस्तिका" में अंकित करते हैं, जहाँ एक देवदूत अच्छे कर्म लिखता है और दूसरा बुरे | मनुष्यों के मरणोपरांत यमदूत उनकी आत्मा उनके शरीर से लेकर उच्चतम स्वर्ग में ख़ुदा  के सामने लाता है, जहाँ उनकी कर्मपुस्तिका पढ़ी जाती है | फिर, जो आत्माएँ स्वर्ग जाएँगी उनके अच्छे कर्मों को सदाचारियों के बहीखाते में लिखा जाता है और उन्हें उच्चतम स्वर्ग में रखा जाता है, तथा जो आत्माएँ नरक जाएँगी उनके बुरे कर्मों को पापियों के बहीखाते में लिखा जाता है और उन्हें अधम नरक में रखा जाता है |

इसके पश्चात दो देवदूत मृत लोगों की आत्माओं को उनकी कब्र में वापस उनके शरीर में लौटा देते हैं, और फिर, वे अल्लाह, इस्लाम, हज़रत मुहम्मद, और क़ुरान  में उनके विश्वास के विषय में उनसे प्रश्न पूछते हैं | उनके उत्तरों के आधार पर इन मृत लोगों की आत्माओं के लिए स्वर्ग अथवा नरक का द्वार खोला जाता है | पूरी मध्यवर्ती अवस्था (अरबी: अल-बरज़ख़ ) के समय, जो वस्तुतः मृत्यु और अंतिम निर्णय के बीच की "रुकावट" है, मृत लोग इन द्वारों से स्वर्ग के सुख अथवा नरक की यातनाओं का आस्वादन करते हैं | वे इसका अनुभव अभौतिक प्रतिकृत शरीर से करते हैं |

समय के अंत में, क़यामत अर्थात् विचार के दिन, सब मनुष्य कब्र से पुनः प्रकट होते हैं, उनके गले हुए शरीर का पुनरुद्धार किया जाता है, और उन्हें नग्न अवस्था में ख़ुदा  के सामने एकत्रित किया जाता है | सदाचारियों अथवा पापियों के बहीखाते से उनके कर्म पढ़े जाते हैं तथा उन्हें ख़ुदा  का अंतिम निर्णय प्राप्त होता है | जिन्होंने स्वयं को ख़ुदा  को समर्पित कर दिया है और अपनी स्वेच्छाचारी आत्मकेंद्रिकता पर विजय प्राप्त कर ली है, और पूरी सच्चाई और प्रेम से ख़ुदा  की भक्ति की है, वे स्वर्ग में शुद्ध, निर्मल शरीर धारण करके अनंतकाल तक सुख भोगेंगे | जिन्होंने अपने अहम् के स्वार्थ में लिप्त होकर ख़ुदा  से मुँह मोड़ा है और उनकी अवज्ञा की है, वे अनंतकाल तक नरक की यातनाएँ झेलेंगे |

प्रलय के दिन मृत पशु भी ख़ुदा  के समक्ष एकत्रित किए जाते हैं | परन्तु, क्योंकि उनमें स्वेच्छा नहीं थी, इसलिए ख़ुदा  की इच्छा के अनुसार उन्हें दी गई सहज प्रवृत्ति की अवज्ञा करने में वे सक्षम नहीं थे और इसलिए उन्हें आँका नहीं जा सकता | क़ुरान  में यह नहीं लिखा गया कि ख़ुदा  के समक्ष एकत्रित किए जाने के बाद उनके साथ क्या होता है | कुछ बाद के टीकाकारों का कहना है कि स्वर्ग या नरक में प्रवेश किए बिना वे मिट्टी में मिल जाते हैं | कुछ और लोग कहते हैं कि स्वर्ग में भव्य घोड़े और ऊँट पाए जाते हैं | देवदूत भी स्वेच्छा से रहित होते हैं और दुराचार करने में असमर्थ होते हैं | ख़ुदा  के दास एवं दूत होने के कारण वे अमर होते हैं और क़यामत के बाद भी ख़ुदा  की सेवा करते रहते हैं |

अतः, समय का अंत होने पर केवल मनुष्य और अदृश्य जिन्न ही निर्णय का सामना करते हैं | परन्तु प्राण रहते मनुष्यों में यह क्षमता है कि वे ख़ुदा  के प्रति अपने अन्तर्जात स्वभाव को लेकर सचेत हो जाएँ | अतः, मनुष्यों में यह क्षमता है कि वे अपने जीवनकाल में अपनी आत्मा को एक संतुष्ट आत्मा के रूप में विकसित करें | अपने जीवन में हज़रत मुहम्मद के चरित्र और उनके कर्मों के उत्तम उदाहरण (अरबी: अल-उसवाह हसनाह ) का अनुसरण करके तथा ख़ुदा और ख़ुदा  के दूत हज़रत मुहम्मद के प्रति प्रेम के द्वारा हम यह शांत अवस्था प्राप्त कर सकते हैं | इसके बाद है इस्लाम धर्म के उपर्युक्त तीन आयामों को परिपूर्ण करना: शरणागति, आस्था, और सेवा के अत्युत्तम कृत्य | फिर इन तीनों का सच्चा अभ्यास निर्णय के दिन स्वर्ग के चिरकालिक परवर्ती जीवन की ओर ले जाता है |

स्वार्थ पर विजय पाने एवं प्रेम का विकास करने के लिए ऐतिहासिक रूप से ईश्वरादिष्ट विधियाँ

शरणागति

"इस्लाम के पाँच स्तम्भ" शरणागति का वह मार्ग बतलाते हैं जिनपर चलकर स्वर्ग में प्रवेश किया जा सकता है: 

  • शरणागति इस साक्ष्य और स्वीकृति से प्राप्त होती है कि जो हम साक्ष्य-सूत्र के साथ उच्चरित करते हैं वही परम सत्य है, यथा, ख़ुदा  के अतिरिक्त और कोई ईश्वर नहीं है, और हज़रत मुहम्मद ख़ुदा  के दूत हैं |

अगले चार स्तम्भ बताते हैं कि शरणागति की अवस्था का अर्थ क्या है:

  • मक्का की ओर मुँह करके दिन में पाँच बार प्रार्थना करना, पहले प्रक्षालन करना, नतमस्तक होना, और साक्ष्य-सूत्र का उच्चार करना
  • ख़ुदा  की इच्छा का पालन करते हुए अपनी संपत्ति दान करने के रूप में दीन-दुखियों की सहायता के लिए कर देना (अरबी: अल-ज़कह )
  • रमदान के महीने में व्रत रखना, वह महीना जब हज़रत मुहम्मद को क़ुरान  के 114 अध्यायों (अरबी: अल- सूराह ) में से पहले अध्याय का इल्हाम प्राप्त हुआ था | व्रत के इस महीने में भोजन और मनोरंजन के सुखों से वंचित रहकर, हम ख़ुदा  के प्रति अपनी शरणागति और आज्ञाकारिता दर्शाते हैं |
  • तीर्थ के लिए मक्का में काब: (अरबी: का'बाह ) जाना, जिस अवधि में सबको केवल सफ़ेद रंग के अनसिले दो कपड़े एवं खड़ाऊँ पहननी चाहिए, जो पूरी मनुष्य जाति की समानता का प्रतीक है |

शरणागति का अर्थ ख़ुदा  के नियमों, शरिया (अरबी: शरि'याह ), को जानना और उनका पालन करना भी है | शरिया  का आधार है क़ुरान, जो हज़रत मुहम्मद ने प्रकट की, और सुन्नाह, उन धार्मिक प्रथाओं के लिखित प्रमाण जो हज़रत मुहम्मद ने अपने साथियों के बीच स्थापित किए | शरिया, जिसका शाब्दिक अर्थ है "मार्ग", जीवन के हर पहलू के विषय में बतलाती है | इसे कुछ कृत्यों में बाँटा गया है, जो हैं

  • बाध्यकारी, जैसे दिन में पाँच बार प्रार्थना करना 
  • संस्तुत, जैसे दान करना 
  • अनाविष्ट, जैसे कौन-सी सब्ज़ी खाई जाए 
  • असम्मत, जैसे विवाह विच्छेद 
  • निषिद्ध, जैसे हत्या, चोरी, शूकर मांस खाना, मदिरापान, इत्यादि

यदि हम शरिया  के नियम याद करके उनकी शरण में जाकर उनका पालन करें, तो उकसाने वाली आत्मा की हठ पर विजय प्राप्त कर सकते हैं जो हमें स्वार्थी होने और ख़ुदा  की इच्छा की अह्वेलना करने के लिए उकसाती है |

निष्ठा

इसके अतिरिक्त, जब हम, साक्ष्य-वहन द्वारा, ख़ुदा  के शरणागत होते हैं, तो हम छह दृढ़ विश्वासों को स्वीकार करते हैं: 

  • एकेश्वरवाद 
  • पैग़म्बर मुहम्मद ख़ुदा  के अंतिम, निर्णायक पैग़म्बर; तथा सभी पैग़म्बरों की निर्भ्रान्तता
  • देवदूतों में आस्था 
  • क़ुरान  तथा बाइबिल के कुछ भागों जैसी अन्य पैग़म्बरी पुस्तकों की निर्भ्रान्तता
  • निर्णय के दिन में आस्था 
  • इस बात की स्वीकृति कि सांसारिक प्रपंच ख़ुदा  के द्वारा पूर्वनिर्धारित (अरबी:अल-क़दर ) किए गए हैं जिनका आधार है सभी भूत एवं भविष्य-कालीन घटनाओं के विषय में ख़ुदा  की सर्वज्ञता, जिनमें सबके स्वेच्छा द्वारा किए गए चयन भी सम्मिलित हैं | 

ख़ुदा  की सृष्टियों की उत्कृष्ट सेवा

ख़ुदा  की इच्छा के प्रति शरणागति और आस्था से उत्पन्न ख़ुदा  से प्रेम हमें दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा देता है जो उस प्रेम और शरणागति का प्रतीक है, उदाहरणार्थ दीनदुखियों की सहायता के लिए कर देना | ख़ुदा  की कृतियों के प्रति यह उत्कृष्ट सेवा ख़ैरात नहीं मानी जाती | अपितु, यह सभी मुस्लिमों का स्वैच्छिक कर्त्तव्य है कि वे अपनी संपत्ति और जमा-पूँजी पर संपत्ति कर दें क्योंकि यह धनवानों पर दीनदुखियों का न्यायसम्मत अधिकार है | अतः यह कर देना अपनी संपत्ति पर अपने स्वार्थी स्वत्व को त्यागकर ख़ुदा  के प्रति शरणागति का एक कृत्य है | क्योंकि धन-संपत्ति को दूषित माना जाता है, इसलिए निर्धनों के हित में कर देना स्वयं को उसके कलंक से शुद्ध करने का एक मार्ग है, और यह सम्पूर्ण मनुष्यजाति की समानता की सम्पुष्टि करता है | मानवजाति का प्रत्येक सदस्य ख़ुदा  की समान कृति है, जो उसकी शक्ति से अनुप्राणित है, और जिसके पास अन्तर्जात प्रवृत्ति से भरा वह हृदय है जो उसे ख़ुदा  के प्रति आकर्षित कर सकता है |

यद्यपि ख़ुदा  सबको समान दृष्टि से आँकते हैं, तथापि वे केवल उनसे प्रेम करते हैं जो ख़ुदा  की इच्छा को स्वीकार करते हैं और इस प्रकार शरिया  के अनुसार एक नैतिक जीवन जीते हैं | सम्पूर्ण समाज के कल्याण के हित में ख़ुदा  उन लोगों से नफ़रत करते हैं और दण्डित करते हैं जो उनकी अवज्ञा करते हैं और दूसरों को हानि पहुँचाते हैं | अतः, ख़ुदा  की सेवा और प्रेम के प्रतीक के रूप में मानवजाति को शरिया  के नियमों को लागू करने की आवश्यकता है | इसलिए मुस्लिम समाज में सामाजिक सौहार्द्र के लिए नियम और न्याय (अरबी: अल-अद्ल ) बनाए रखने की निर्णायक भूमिका है | इस्लामी परम्पराओं में अनेक अंतर शरिया  के नियमों की किंचित भिन्न व्याख्याओं से उत्पन्न हुए हैं |

क्षमा

यद्यपि कुकृत्यों के लिए दंड है, फिर भी इस्लाम में, उन लोगों के लिए जो ख़ुदा  की शरणागति में हैं परन्तु जिन्होंने, नकारात्मक भावनाओं और हठ के प्रभाव में शरिया  के कुछ नियमों को भंग किया है, क्षमा (अरबी: अल-खुफरान ) का बहुत बड़ा स्थान है | ख़ुदा  सदा क्षमा करते हैं यदि हम सच्चे मन से पछताएँ और ख़ुदा  के सम्मुख हों | परन्तु उन लोगों के लिए कोई क्षमा नहीं है जो इस्लाम को अस्वीकार करते हैं अथवा जो अल्लाह, हज़रत मुहम्मद, या क़ुरान  की निंदा करते हैं |

ख़ुदा  के दो अत्युत्तम नाम (अरबी: अल-'अस्मा' अल-हुस्ना ) - पूर्णतः दयावान (अरबी: अल-रहमन ) और विशेषतः दयावान (अरबी: अल-रहीम ) - दैवी क्षमा के इस पहलू को मानवजाति के प्रति ख़ुदा  के प्रेम के रूप में उजागर करते हैं | इन दो पहलुओं के बीच के अंतर की तीन प्रमुख व्याख्याएँ हैं: 

  • ख़ुदा अपनी प्रकृति के अनुसार सदैव पूर्णतः दयावान हैं और उन्हें किसी पात्र की आवश्यकता नहीं; जबकि ख़ुदा  उनके प्रति विशेषतः दयावान हैं जो पछताते हैं | 
  • ख़ुदा  पूर्णतः दयावान हैं; जबकि ख़ुदा  के कृत्य विशेषतः दयावान हैं | 
  • केवल ख़ुदा  अपनी प्रकृति के अनुसार पूर्णतः दयावान हैं; जबकि ख़ुदा और अन्य, जैसे हज़रत मुहम्मद उनके प्रति विशेषतः दयावान हैं जो पछताते हैं |

उन दुराचारियों के हृदय में प्रवेश करके, जो पछतावा करना चाहते हैं, ख़ुदा  पहले उनकी पछताने में सहायता करते हैं, और फिर उन्हें क्षमादान देते हैं | पछतावे (अरबी: अल-तौबा ) में सम्मिलित हैं:

  • पछतावे की अनुभूति होना
  • ख़ुदा  से क्षमा माँगकर पछताना
  • किसी नेक कार्य से अपने कुकर्म की क्षतिपूर्ति करना 
  • दुराचार को दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करना |

परन्तु यदि कोई बिना पछतावे के मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तो उसे निर्णय के दिन चिरकालिक नरकदंड का सामना करना पड़ता है |

इस्लामी न्यायालयों में न्याय-शास्त्र की प्रथा में क्षमा भी सम्मिलित हो सकती है | किसी अपराध के पीड़ित अथवा पीड़ित के परिवार को यह चयन करने की छूट है कि वे अपराधी के लिए कठिन दण्ड की मांग कर सकता है, अथवा उससे आर्थिक क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है, अथवा उसे क्षमादान दे सकता है | इस क़ानूनी सन्दर्भ में क्षमादान की प्रथा भी ख़ुदा  के प्रति एक अत्युत्तम सेवा कृत्य है |

स्वार्थ पर विजय पाने और प्रेम विकसित करने की विधियाँ जो ख़ुदा  के व्यक्तिगत, अंतरंग अनुभव पर निर्भर करती हैं

ख़ुदा  का सौन्दर्य और प्रेम

कुछ सूफी संत कहते हैं कि यद्यपि ख़ुदा  ने मनुष्य को इस प्रकार बनाया है कि उनका अंतःकरण ख़ुदा  के प्रति एक शुद्ध, अपरिवर्तनीय, अंतरतम उन्मुख भाव से ओतप्रोत है,  फिर भी असावधानी (अरबी: अल-कहाफलाह ) ने इसकी अभिज्ञता को धुँधला कर दिया है | ऐसा प्रतीत होता है कि मानवजाति ख़ुदा  को भूल गई है | इसके परिणामस्वरूप लोग स्वार्थी हो गए हैं और अपनी स्वेच्छा की स्वार्थी आज्ञाओं का पालन करते हैं | फलस्वरूप, वे लोभ और क्रोध के प्रभाव में कार्य करते हैं |

इस असावधानी में भूलसुधार करने का एक उपाय जो सूफ़ीवाद  सिखाता है, वह है ख़ुदा  के प्रति प्रेम जिसके माध्यम से हम स्वार्थ पर विजय पाकर ख़ुदा  के यथासंभव निकट जा सकते हैं | क़ुरान  में वर्णित प्रेम उत्तमता के सामीप्य की अनुभूति है | जो वस्तुएँ उत्तम होती हैं उनका वर्णन क़ुरान  कुछ आकारकीय रूप से सम्बंधित शब्दों से करती है जो त्रिअक्षर धातु हसन  से उद्भूत हुए हैं | कुछ आयतों में उत्तमता से अभिप्राय है अल्लाह, उनके नाम अथवा स्वर्ग | अन्य आयतों में उनसे अभिप्राय है मनुष्य के चरित्र की उत्तमता और ख़ुदा  की आराधना के रूप में उसकी कृतियों के प्रति मनुष्य के सेवा कार्य | इसके अतिरिक्त क़ुरान  के अनुसार ख़ुदा  उन्हें प्रेम करते हैं जो उत्तम कार्य करते हैं |

इस त्रिअक्षर धातु का एक अन्य पाठ-भेद है हसना'  जो क़ुरान  में नहीं आता और उसका अर्थ है "सौन्दर्य" | इस भाषा-विज्ञान के संबंध के कारण सूफ़ी इस पर बल देते हैं कि प्रेम का अर्थ है सौन्दर्य और जो सुन्दर है उसके प्रति निकटता की अनुभूति | इसलिए वे चरित्र की उत्तमता और ईश्वर की कृतियों के प्रति उत्तम सेवा कार्यों की व्याख्या "चरित्र की सुंदरता" और "सुन्दर सेवा कार्यों" के रूप में करते हैं | वे इसकी पुष्टि एक हदीस  उद्धरण से करते हैं जो सुन्नी और शिया दोनों सार-संग्रहों में पाया जाता है: "ख़ुदा  सुन्दर है; ख़ुदा  को सुंदरता प्रिय है" |

  • हदीस  हज़रत मुहम्मद के विषय में उक्तियों या कहानियों के विवरण हैं, जो पैग़म्बर के साथियों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी बताए गए हैं | विभिन्न सार-संग्रहों में अलग-अलग हदीस  के संकलन संरक्षित हैं | सुन्नी और शिया परम्पराएँ भिन्न सार-संग्रह मानती हैं और कभी-कभी एक दूसरे के संकलन में किसी विशिष्ट हदीस  की प्रामाणिकता को चुनौती देती हैं |

इस उद्धरण में "सौन्दर्य " का अरबी शब्द, जमील, क़ुरान  में धैर्य और क्षमा के लिए एक विशेषण के रूप में दयालु और निष्पक्ष के रूप में अभिप्रेत प्रतीत होता है | इसके अतिरिक्त क़ुरान  केवल मवेशियों के सन्दर्भ में "सौन्दर्य ", अल-जमाल, शब्द का प्रयोग करती है | अरबी भाषा में अल-जमाल  का प्रयोग "ऊँट" के लिए भी किया जाता है | किन्तु, सौन्दर्य  को उत्तमता के सभी आयामों में अभिव्यक्त करने के लिए सूफ़ी इन दोनों शब्दों को एक विस्तृत रूप में व्याख्यायित करते हैं | 

जैसा कि सूफ़ी धर्म में बतलाया गया है, ख़ुदा  के लिए प्रेम उत्तमता और सौन्दर्य  का एक अंतरंग, व्यक्तिगत अनुभव है और इसे कई प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है | उदाहरण के लिए, ख़ुदा  की एक अनन्य रूप से सुन्दर, पर निराकार प्रेमिका के रूप में कल्पना करके, सूफ़ी मत के लोग ख़ुदा  के प्रेम के लिए कविता और संगीत के द्वारा अपनी तड़प को व्यक्त करते हैं | कविता और संगीत, प्रार्थना और आराधना के वे माध्यम हैं जो ख़ुदा  के प्रति हृदय की सहज प्रवृत्ति को जाग्रत तथा पोषित करते हैं |

सूफ़ी कविता में इस प्रकार के प्रेम के लिए अरबी शब्द 'अश्क़  का प्रायः प्रयोग किया जाता है, विशेषतः फ़ारसी और उर्दू रचनाओं में | वह भावाविष्ट, उत्कट, यौन-इतर प्रकार के प्रेम को अभिव्यक्त करता है | यद्यपि यह शब्द क़ुरान  में नहीं आता, सूफ़ी इन्हें इस प्रकार के वाक्यांशों में प्रयुक्त करते हैं, जैसे, "सच्चा प्रेम" (फ़ारसी: 'इश्क़- हक़ीक़ी ), "पैग़म्बर का प्रेम" (फ़ारसी: 'इश्क़- रसूल ), और "हज़रत मुहम्मद का प्रेम" (फ़ारसी: इश्क़- मुहम्मदी ) | "सच्चे" प्रेम से अभिप्राय है सत्य का प्रेम (अरबी: अल-हक़्क़ ), जो ख़ुदा  के कई नामों में से एक है |

फ़ारसी शब्द 'इश्क़ " लाक्षणिक प्रेम" (फारसी: 'इश्क़-ए मजाज़ी ) वाक्यांश में भी आता है, जिससे अभिप्राय है अपनी प्रेयसी के लिए एक प्रियतम का भावाविष्ट प्रेम जो ख़ुदा  के प्रेम का रूपक अथवा उपमा है | कुछ फ़ारसी गुरु यह सिखाते हैं कि लाक्षणिक प्रेम हमें ख़ुदा  के सच्चे प्रेम की ओर ले जा सकता है; अन्य कहते हैं कि यह नहीं हो सकता |

सूफ़ी साधकों के लिए कविता और संगीत की दुनिया अन्तर्रात्मा की ध्वनि बन जाती है जो अपने प्रिय से वियोग की पीड़ा व्यक्त करती है और ख़ुदा  से पुनर्मिलन के लिए वापस बुलाती है | इसलिए कविता पाठ करना और संगीत बजाना, अथवा इन दोनों में से किसी को भी सुनना, ख़ुदा  के प्रति भावाविष्ट, उत्कट प्रेम का गहन अनुभव होता है | इस प्रेम में पूर्णतः डूबकर हम पूरी तरह आत्म की अनुभूति और उससे जुड़े स्वार्थ को भूल जाते हैं | ऐसा प्रेम व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया जाना चाहिए और इसे बौद्धिक रूप से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता |

आत्मा के विकास के सात चरण

आतंरिक स्तर पर, समग्र स्वार्थी सांसारिक चिंताओं को त्यागकर, सूफ़ी साधक उन आवरणों को - एक हदीस  के अनुसार 70,000 - जो ख़ुदा  को हमारे हृदय से छुपाकर रखते हैं, परत दर परत खोलने की प्रक्रिया से होकर जाता है (अरबी: कश्फ़ ) | इस प्रक्रिया में हम अपने अंतरतम,ख़ुदा  के प्रति हमारी अपरिवर्तनीय, अन्तर्जात प्रकृति, को प्रकट करते हैं और अल्लाह, हमारे प्रेमपात्र, के और निकट आते हैं  |

आवरण की परतों को खोलने की प्रक्रिया में हमारी आत्मा सात चरणों से होकर विकसित होती हुई, स्वार्थ से नि:स्वार्थ तक जाती है | ख़ुदा  तक पहुँचने के ऐतिहासिक रूप से प्रकट किए गए मार्ग की प्रस्तुति में वर्णित तीन अवस्थाओं का विस्तार इन सात चरणों में किया गया है | परन्तु, सातों चरण क़ुरान  से उद्भूत हैं |

  • उकसाने वाली आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-'अम्माराह ) उस अवस्था की आत्मा है जो हमें काम-वासना, क्रोध, और ख़ुदा  की इच्छा तथा उनके नियमों की अवज्ञा करने के लिए उकसाती है |
  • आत्म-भर्त्सनाकारी आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-लुव्वामाह ) वह आत्मा है जो आकलन करके स्वयं पर उकसाने वाली आत्मा की बात सुनने का आरोप लगाती है | इस व्यवहार पर पछताते हुए वह ख़ुदा  से क्षमा-याचना करती है |
  • उत्प्रेरित आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-मुल्हामह ) वह आत्मा है जो पछतावे के बाद, संतोष और विनम्रता सहित, ख़ुदा  की सृष्टियों के प्रति सुन्दर सेवा कार्यों में लग जाने के लिए उत्साहित होती है |
  • प्रशांत आत्मा (अरबी: अल-मुत्म' इन्ना ) वह आत्मा है जो ख़ुदा  की इच्छा के प्रति दृढ़ रूप से आज्ञाकारी है, और इसलिए पूर्ण रूप से शांत है |
  • सुखी आत्मा (अरबी: अल-नफ़्स अल-रदिययाह ) वह आत्मा है जो अपनी स्वार्थी इच्छाओं को त्याग देती है और, एक साधारण, तपस्वी जीवन जीती हुई, ख़ुदा  की इच्छा में सुख अनुभव करती है |
  •  सुख पहुँचाने वाली आत्मा (अल-नफ़्स अल-मरदिययाह ) वह आत्मा है जो ख़ुदा  को सुख देती है - वह आत्मा जो ख़ुदा और ख़ुदा  की कृतियों के प्रति सेवा के अतिरिक्त सब कुछ त्याग देती है |
  • पूर्ण, आदर्श आत्मा (अल-नफ़्स कामिला ) वह आत्मा है जो पूर्णतया ख़ुदा  में लीन रहती है और ख़ुदा  का निष्काम सेवक बन जाती है |

शुद्धिकरण के चार चरण

शुद्धिकरण की विधियाँ भी चार चरणों में प्रस्तुत की जा सकती हैं:

  • आत्मानुशासन के द्वारा शरिया  के नियमों का पालन करना | हर प्रकार के भावी आध्यात्मिक विकास का अनिवार्य आधार है अपने बाह्य व्यवहार को ख़ुदा  की इच्छा के अनुसार शुद्ध करना | अतः, सामान्यतया सूफ़ी ऐतिहासिक रूप से प्रकट की गईं शरणागति, आस्था, एवं ख़ुदा  की कृतियों के प्रति "सुन्दर" सेवा की विधियों का अनुसरण करते हैं | ख़ुदा  की कृतियों के प्रति सुन्दर सेवा लाक्षणिक प्रेम का एक प्रकार है | हम ख़ुदा  के द्वारा बनाई गई उनकी सभी कृतियों में सौन्दर्य  देखते हैं, और उन सुन्दर कृतियों से प्रेम और उनकी सेवा द्वारा हम ख़ुदा  से प्रेम करते हैं |
  • किसी एक सूफ़ी पंथ ( अरबी: तरीकाः ) का अनुसरण करना | साधक संन्यासी बनकर अन्य साधकों के साथ एक धार्मिक गुरु (अरबी: शेख़ ) के अधीन ख़ुदा  का मनन (अरबी: ज़िक्र ) एवं चिंतन (अरबी: फ़िक्र ) करना सीखते हैं तथा उनका अभ्यास करते हैं | ख़ुदा  का चिंतन अथवा स्मृति ख़ुदा  का आह्वान करने के वाक्यांशों, अथवा हदीस में संग्रहीत ख़ुदा  के निन्यानवे नामों को बार-बार दोहराकर किया जाता है | साधक इन वाक्यांशों एवं नामों का जाप प्रायः 33 अथवा 99 बीजों की माला (अरबी: अल-मसबाहा ) फेरकर करते हैं | ख़ुदा  के विचार ख़ुदा  अथवा पैग़म्बर मुहम्मद के किसी एक स्वरुप पर केंद्रित होते हैं | कुछ पंथों की प्रथाओं में तेज़ी से घूमकर किए जाने वाला नृत्य भी पाया जाता है | मठ की भाँति सूफ़ी संप्रदाय समाज से अलग नहीं हैं; अपितु, वे व्यापक समाज की सेवा करते हैं - भोजन, आश्रय, आध्यात्मिक मार्गदर्शन, एवं शिक्षा |
  • ख़ुदा  के वास्तविक यथार्थ के दर्शन का व्यक्तिगत अनुभव (अरबी: अल-हक़ीक़ह ) | जैसा सूफ़ी पंथों में सिखाया जाता है, दीर्घकालीन, गहन रूप से किए गए अभ्यास के परिणामस्वरुप हमें हमारी आत्मा ख़ुदा  में लीन होने का व्यक्तिगत अंतरंग अनुभव होता है (अरबी: फ़ना' फिल्लाह ) | आत्मा की इस लीन होने की अवस्था से आगे चलकर (अरबी: फ़ना ' 'अन अल-फ़ना') हम उस अवस्था में पहुँचते हैं जहाँ हम सदा के लिए ख़ुदा  में लीन हो जाते हैं (अरबी: बक़ा ' बिल्लाह ) | इस अवस्था में हमें ख़ुदा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान मिलता है | ख़ुदा  के निन्यानवे नामों में से एक है सत्य (अरबी: अल-हक़्क़ ) |
  • ईश्वर सम्बन्धी भावातिरेक जागृत करने वाले ज्ञान से प्राप्त परमानंद का अनुभव (अरबी: अल-मा ' रिफ़त ) | हर्षोन्माद से प्राप्त ख़ुदा  का ज्ञान हर प्रकार के तर्कसंगत, वैज्ञानिक ज्ञान (अरबी: अल-'इल्म ) जो अध्ययन एवं अन्वय से प्राप्त किया गया हो, तथा ख़ुदा  के वास्तविक सत्य के दर्शन से प्रकट समग्र ज्ञान से परे है |
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